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सभी को राम राम ।

आज अपने वर्डप्रेस ब्लोग्स के बारे में एक बड़ी शॉकिंग बात पता चली ।

वह यह के मेरे वर्डप्रेस के दोनों ब्लोग्स पर कोई akismet स्पैम डिटेक्टर एक्टिव है – जो खुद ही कमेंट्स को स्पैम कर रहा है । वहां तक तो कोई बात नहीं – लेकिन स्पैम करने के साथ ही यह इन कमेंट्स को अपने आप डिलीट भी कर रहा है ।

कहीं आपके वर्डप्रेस ब्लॉग पर भी ऐसा तो नहीं हो रहा है ?

स्पेसिफिकली —————————————–

1. आराधना – (http://shilpamehta3.wordpress.com/)

* स्पैम कमेंट्स – 176 (सब औटोमेटीकली डीलिट हो चुके हैं – मैं जानती भी नहीं वे कब आये, किसने किये :( , शायद वे स्पैम नहीं थे, जेनविन थे ? किसे पता ?

* पब्लिश्ड कमेंट्स – 11 – सिर्फ ये ही मेरे पास अप्रूवल के लिए पहुंचे थे, सब ही अप्रूव हुए। एक भी स्पैम नहीं था इनमे से ।

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2. गणित और विज्ञान – (http://shilpamehta5.wordpress.com/)

* स्पैम कमेंट्स – 265 (सब औटोमेटीकली डीलिट हो चुके हैं – मैं जानती भी नहीं वे कब आये, किसने किये :( , शायद वे स्पैम नहीं थे, जेनविन थे ? किसे पता ?

* पब्लिश्ड कमेंट्स – 3 – सिर्फ ये ही मेरे पास अप्रूवल के लिए पहुंचे थे, सब ही अप्रूव हुए। एक भी स्पैम नहीं था इनमे से ।

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अभी हेल्प ढूंढ कर सेटिंग्स चेंज तो की हैं – कि

1. कोई “स्पैम” माने गए कमेंट्स डीलिट न हों, बल्कि मोडरेशन क्यों में रहे जिन्हें मैं बाद में देख सकूं ।

2. लेकिन क्या आप में से कोई मित्र (specially wordpress bloggers ) कोई ऐसी कोई विधि जानते है जिससे यह सोफ्टवेयर ही डिसेबल कर सकूं ? मीनिंग की ऑटो स्पैम डिटेक्शन न हो ?

3. क्या इन डिलीट हो चुके कमेंट्स को वापस पाने का कोई तरीका है ?

4. जिन भी मित्रों ने वहां कमेंट्स किये थे और उनके कमेन्ट नहीं छपे – उनसे करबद्ध क्षमाप्रार्थी हूँ । अब आगे कम से कम डिलीट तो नहीं हों – सेटिंग्स चेंज कर दी हैं ।

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कहीं आपके वर्डप्रेस ब्लॉग पर भी ऐसा तो नहीं हो रहा है ?

चेक करने के लिए -

1. वर्डप्रेस के डैश्बोर्ड में जाइये,

2. बायीं तरफ के साइडबार लिंक्स में ये हैं : 1. home 2. comments i have made 3. site stats 4. akismet stats हैं ।

3. akismet stats को क्लिक कीजिये – और all time में देखिये की क्या स्थिति है ?

4. यदि बदलाव करना चाहें तो 1. settings 2. discussion 3. Comment Moderation 4. Don’t discard spam on old posts के बॉक्स को टिक कीजिये (वह डिफौल्ट से अन्टिक्ड है)

शायद यह पोस्ट आपके किसी काम आ सके ?

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cryptography steganography

 

जब से मानव ने दूरियों पर सन्देशों का आदान प्रदान शुरू किया, तो इसके साथ ही प्रश्न उठा सन्देश की सुरक्षा का । इसमें कुछेक बातें ये भी हैं :

1. सन्देश गलत व्यक्तियों को न मिलें (जैसे कोइ सैन्य संदेश) – authentication

2. बीच राह में कोई सन्देश को रोक या पढ या समझ न पाए (जैसे कोई प्रेमपत्र)। – confidentiality

3. सन्देश लेखक के सन्देश लिखने के बाद कोई और उसे न तो बदल पाए, न ही काट छांट पाए (जैसे आपने किसी के लिए 100 रुपये का चेक भेज – उसे वह 1000 न बना पाए)। – message integrity

4. सन्देश भेजने वाला भी बाद में अपने लिखे से मुकर न पाए (जैसे किसी काम के लिए कोई वस्तु किसी ने किसी को देने का वादा किया, और अपना काम निकल जाने पर वह कहे कि , मैंने ऐसा कोई वादा नहीं किया था )। – non-repudiation

 

इन में से पहले दो काम स्टेग्नोग्राफी और क्रिप्टोग्राफी से होते हैं ।

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क्रिप्टोग्राफी

इसमें सन्देश को किसी तरह के गोपनीय कोड से “एनक्रिप्ट” कर के भेजा जाता है । फिर उसे पढने की गोपनीय जानकारी हुए बिना दूसरा पक्ष उसे देख भी सके तो भी पढ़ नहीं सकता । इसमें दो मुख्य पद्धतियाँ हैं : secret key और public key ।

 

Secret key : इसमें भेजने वाले और पढने वाले दो ही लोग अपनी आपसी शेअर्ड चाबी  जानते हैं । पूरी दुनिया यह तो जानती है की एनक्रिप्शन कैसे होता है, किन्तु चाबी न होने से उसे पढ़ने के लिए ताला खोल नहीं सकती  ( प्रयास कर कर के खोल भी पाए – तो तब तक इतनी देर हो चुकी हो कि उससे कोई नुक्सान न कर पाए) । हर अलग मूल सन्देश (plaintext) को एक ही चाबी से या (एक ही सन्देश को अलग चाबी से ) एनक्रिप्ट करने पर अलग अलग सन्देश बनते हैं – जिन्हें ciphertext कहा जाता है । उसे पढ़ वही सकता है जो चाबी जानता हो  । हम सब  ने ही शायद बचपन के खेलों आदि में ऐसी कूटभाषा प्रयुक्त की होगी । जासूसी में , सेना में, और प्रेमपत्रों में यह सब खूब प्रयोग होता है ।

 

हिटलर साइफर बड़ा प्रसिद्ध उदाहरण है ।

इस तकनीक का एक उदाहरण :

Message : my name is shilpa

Technique : substitution

Key : gap = +2

 

Original        : a b c d e f g h  j k  l m n o p q r s t u  v w x y z  1 2 3 4 5 6 7 8 9

Substituted   : c d e f  g  i j k l m n o p q r s  t u v w x y z  0 1 2 3 4 5 6 7 8 9 a b

 

तो माय नाम इस शिल्पा का उत्तर बना :

my name is shilpa

= o0 pcog ku ujknrc

 

यही सन्देश ” my name is shilpa” एक दूसरी “की” से एनक्रिप्ट करने पर सन्देश बनेगा :

o|$sgtm)s~, vx|s

 

इस तरह हर अलग की से एक ही सन्देश के अलग अलग रूप बनेंगे, जिन्हें तोड़ कर मूल सन्देश पाने के लिए की जानना आवश्यक है । हर प्रेषक हर एक मित्र के साथ अलग अलग की इस्तेमाल कर सकता है, जो एक दुसरे की की नहीं जानते तो वे सिर्फ अपने सन्देश पढ़ सकते हैं ।

 

इसे तोडना बड़ा आसान है : क्योंकि सारी दुनिया जानती है कि substitution हुआ है , तो वे एक एक कर के सब चाबियां try कर सकते हैं । लेकिन चाबी की लम्बाई इतनी अधिक हो कि  trials में इतना समय लग जाए कि वह सन्देश अपना महत्व खो दे – तो यह तकनीक सफल होगी । इसी तरह की और भी कई अल्गोरिदम हैं । जितनी बड़ी चाबी हो, उतना मजबूत ताला होता है । साधारण पत्रों के लिए अलग तरह की सुरक्षा, बैंक आदि के लिए अलग, और सेना के लिया और अधिक कड़े सुरक्षा इंतज़ाम (longer keys ) होते हैं ।

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स्टेगनोग्राफी :

यहाँ सन्देश को छुपा कर भेजा जाता है । जैसे व्यक्ति x , किसी और व्यक्ति y  को एक चित्र भेजे और उसमे छुपा कर एक सन्देश भी । अब दुनिया अक्सर यह जान ही नहीं पाती की इस चित्र / गीत / विडिओ आदि में कोई छुपा सन्देश मौजूद भी है । जान भी जाए, तो चित्र में इतने अधिक 1 और 0 के सेट्स हैं, की उसमे से सन्देश खोज निकालना करीब करीब असंभव सा है ।

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पहला चित्र :

 

 

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सन्देश : my name is shilpa

सन्देश छुपा कर बना चित्र :

 

 

 

 

अब देखने में दोनों चित्रों में कोई फर्क नहीं है, किन्तु दुसरे चित्र में यह मेसेज छुपी है – जो कोई अनजान व्यक्ति जान भी न सकेगा, खोज पाना तो खैर बहुत दूर की बात है :) - ढूँढने की कोशिश न कीजियेगा , समय व्यर्थ होगा, क्योंकि इसे आँख से देख कर तो नहीं ही खोजा जा सकता है ।

 

यह स्टेग्नोग्राफी कई रूपों में प्रयुक्त होती रही है । जैसे नीम्बू के रस से लिखना, जो सूखे कागज़ पर न दिखे, किन्तु ख़ास माध्यम में दिखे । इसी तरह से युद्ध के समय सर मुंडा कर उस पर सन्देश टैटू कर दिए जाते थे, जो बाद में बाल उग आने से छुप जाते थे । एक और तरीका था – साधारण लैटर टाइप किया जाए, औरुसका चित्र लिया जाए । फिर हर “i” के ऊपर का dot  हटा कर उसकी जगह जो डॉक्यूमेंट भेजना हो, उसका चित्र माइक्रो डॉट बना कर चिपका दिया जाए । सन्देश पाने वाली पार्टी इस “i ” को फिर से बड़ा कर ले, और वह डॉक्यूमेंट पहुँच जाए ।

 

फिलहाल तो रिसर्च के सिलसिले में इससे सम्बंधित कुछ काम कर रही थी – सोचा शेयर किया जाए आप सब के साथ :)

neural learning algorithms error correction

 

यह पोस्ट समझने के लिए पुरानी कड़ियाँ पढ़ी हुई होनी आवश्यक हैं । 

सब कड़ियाँ न भी पढ़ी हों तो भाग “तीन” अवश्य पढ़ लीजिये इस भाग से पहले ।

 

(अनुवाद सहायता के लिए आदरणीय गिरिजेश राव जी को आभार)

 

 

पुराने भाग 1234  


यह नीला भाग पिछले भागों की पुनरावृत्ति है । चाहें तो इसे पढ़ें या न पढना चाहें तो छोड़ कर आगे 

बढ़ जाएँ । 


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पिछले भाग में हमने देखा की सीखने के प्रकार और सीखने की विधियाँ अलग अलग  हैं ।

 

सीखने के प्रकार (paradigms) उन तरीकों को कहते हैं , जिनसे न्यूरल नेटवर्क अपने आस पास के माहौल से उसके बारे में जानकारी / संज्ञान हासिल करता है : ये थे 

1. Learning with a teacher (गुरु की मदद से सीखना)
2. Learning without teacher with supervision (with critic ) (आलोचक / समीक्षक की सहायता से गुरु के बिना सीखना )
3. Unsupervised learning (स्वयं सीखना)


सीखने की विधि (algorithms) उन तरीकों को कहते हैं जिन्हें न्यूरल नेटवर्क बाहर से जानी हुई बातों को अपने भीतर कैसे समझता / सीखता / याद रखता है । जैसे हम मनुष्य भी – 

** स्कूल में टीचर ने सिखा दिया कि ” 5×8 = 40, or 2^4=2.2.2.2 = 16″ तो : 

** कोई इसे समझेगा कि संख्या 5 को अपने आप से 8 बार जोड़ा जाए तो परिणाम 40 आएगा । 

** या समझेगा कि, 2 को अपने आप से 4 बार गुणा किया जाए तो परिणाम 16 आयेगा। 

** कोई इसे समझने का प्रयास नहीं करेगा – याद कर लेगा / रट्टा मार लेगा । 

हर किसी के सीखने की प्रक्रिया अलग हो सकती है, या एक भी हो सकती है । 

 

न्यूरोन की बनावट और काम करनेके तरीके पर मैंने तीसरे भाग (लिंक) में विस्तृत चर्चा की थी । जो इसे जानना चाहते हैं उनके लिए यहाँ बहुत ही संक्षेप में फिर से लिख रही हूँ । जिन्हें याद ही है वे इस नीले अक्षरों वाले भाग को छोड़ कर आगे बढ़ जाएँ । जो इससे अधिक जानना चाहें वे तीसरे भाग को फिर एक बार पढ़ लें ।

:

[

artificial neuron कुछ ऐसा होता है । यह natural वाले से बहुत ही कमतर है - किन्तु working की नक़ल करता है ।

Artificial  Neuron 

 

१.ये जो inputs दीख रहे हैं - ये असल inputs हैं । इनमे से जो इनपुट अभी मौजूद हो वह "1" से और जो मौजूद न हो वह "0" से दर्शाया जाता है । Bias वाला इनपुट (पूर्वाग्रह - श्रंखला की पहली तीन पोस्ट्स देखें) हमेशा ही "1" से दर्शाया जाता है ।

२.इस एक नयूरोन का सिर्फ एक ही output है - निर्णय, कि "हाँ" यह करना है /या फिर / "नहीं" - यह नहीं करना है)।

३.हर इनपुट को कितना और कैसा (+ या -) महत्व (वजन, weight ) दिया जाएगा - नयूरोन हर उदाहरण से सीखता है ।

४.यह सीखना अब तक के अनुभव की आधार पर होता है - यह वजन अनुभव के साथ बदलता है ।

५.जो इनपुट इस neuron के output के साथ में सकारात्मक रूप से काम करें, उन inputs का इस neuron में + दिशा में महत्व बढ़ता जाता है, और जो इस output के साथ न हों / विरुद्ध हों, उनका वजन - दिशा में बढ़ता है ।

६.हर इनपुट को अभी तक के वजन से गुना कर के, ये सारी चीज़ें (असर) SUMMING NODE (योग ग्रंथि ) पर जोड़ी जाती हैं ।

७.activation function का काम है इस जोड़ को (जो + या - , एक से कम या एक से अधिक, हो सकता है ) {+ या -१} तक लिमिट (सीमित) करना। (अर्थात (+ = हाँ) या (- = ना) में उत्तर बनाना ) यदि योग/ जोड़ शून्य या उससे अधिक हो तो उत्तर होगा "हाँ" (=+1), और यदि योग शून्य से कम हो तो उत्तर होगा नहीं (= -1)

 

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इसे तीसरे भाग में एक घुटने चलने वाले बच्चे के माँ के साथ रोजमर्रा के सीखने के तरीकों से समझाया था । आप वहां देख सकते हैं ।

]

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अब आगे : 

न्यूरल नेटवर्क्स मानवीय सीखने की प्रक्रियाओं को ही फोलो करते हैं । ये मुख्यतः 5 तरीके हैं :

 

1. Error correction learning (गलतियों से उन्हें सुधारने के प्रयास कर के सीखना)

2. Hebbian learning ( हेब एक biologist थे – उन्होंने मानव सीखने की प्रक्रियाओं पर रीसर्च की थी

                               – उनकी बताई विधि)

3. Memory based learning (रट कर याददाश्त से काम करना, बिना समझे  )

4. Stochastic learning (works on probabilitie theory  – यह संभावनाओं के सिद्धांतों पर काम करती है)

5. Competetive learning (प्रतियोगिता में जीतने के प्रयासों से सीखना)

 

इस भाग में सिर्फ error correction learning देखेंगे ।

कृपया इसे कठिन या गणितात्मक मान कर सरसरी तौर पर न पढ़ें, तब यह कठिन लगेगा । एक बार धीरे धीरे पढ़ें, मुझे विश्वास है समझ में आ जायेगी यह प्रक्रिया । 

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Error correction learning : यह चित्र देखिये (कोई भी चित्र क्लिक से बड़ा कर के देखा जा सकता है )

इसे सरल रखने के लिए , फिर से वही पुराना वाला ही उदाहरण ले रही हूँ । और सिर्फ दो ही इनपुट रख रही हूँ – एक खिलौना, और दूसरा गर्म कुकर ।  

1. न्यूरल नेटवर्क है एक घुटने चलने वाला बालक – जो परिवेश के बारे में सीख रहा है । उसे निर्णय लेना सीखना है कि “इस वस्तु को मुझे छूना है, या नहीं छूना है ?” (हाँ = +1, ना = -1)

2. desired response वह है जो असल में होना चाहिए, जो परिवेश को पहले से जानने वाला व्यक्ति उस इनपुट के साथ निर्णय लेता ।

3. Input 1 = एक खिलौना – (वातावरण को जानने वाला कहेगा कि हाँ बच्चे को यह छूना चाहिए )

4. Input 2 = गर्म कुकर – जिससे बच्चे का हाथ जल सकता है ।(वातावरण को जानने वाला कहेगा कि नहीं - बच्चे को यह नहीं छूना चाहिए )

बच्चे (जैसा हम सब जानते ही हैं) हर चीज़ को छूना / पकड़ना चाहते हैं । तो present weight हर इनपुट (आवक) के लिए +1 ही है , ऐसा हम मान लेते हैं ।

5. जो इनपुट अभी मौजूद है , वह एक (1) है, बाकी सब इनपुट 0 (शून्य) हैं । अर्थात बच्चा एक समय में एक ही इनपुट के बारे में अपने अनुभव से सीखेगा , कि उस चीज़ को छूना है या नहीं छूना है । 


अब एक एक कर के अलग अलग तीन परिस्थितयां देखते हैं :

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पहली स्थिति में – खिलौना मौजूद है, कुकर नहीं है , अभी कुछ सीखा नहीं है ।

सामने खिलौना है ।

 

input 1: खिलौना मौजूद है (1)

input 2: कुकर नहीं है (0) ।

शाखाओं के weights : सीखने से पहले – बच्चे सामने दिखती हुई हर चीज़ छूना चाहते हैं – तो सभी weight अभी “+1″ हैं ।

Desired Output “+1″ है – हाँ – बच्चे को खिलौना लेना चाहिए ।

 

तो चित्र कुछ ऐसा है : (चित्र को बड़ा करना चाहें तो उसे क्लिक करें )

 

* ऊपर की शाखा से (खिलौने से) योग ग्रंथि पर आगत है (इनपुट)x (वजन) = (1) x (+1) = 1

* नीचे की शाखा से (कुकर से ) योग ग्रंथि पर आगत है (इनपुट)x (वजन) = (0) x (+1) = 0

 

* तो योग बना 1+0 = 1

* योग शून्य से अधिक है । तो एक्टिवेशन फंक्शन से आउटपुट होगा +1 , अर्थात “हाँ” ।

 

* इच्छित आउटपुट (निर्गम / परिणाम ) भी “हाँ” ही था । सो दोनों में कोई फर्क नहीं है

त्रुटी =  एरर = शून्य ।

* एरर को हर एक इनपुट के वजन को सुधारने / बदलने के लिए प्रयुक्त किया जाता है

 

* शोधन = करेक्शन= (इनपुट)x(एरर) द्वारा तय होता है

* जब एरर शून्य है तो वजन या भार में सुधार होगा (0)x (इनपुट) = 0 , अर्थात

जब एरर (गलती) शून्य होगी तो चाहे वह इनपुट उस वक्त कार्यरत (present ) था, या नहीं था – किसी भी इनपुट शाखा के वजन में में कोई भी बदलाव नहीं आएगा ।

 

तो इस पूरी प्रक्रिया के बाद, खिलौने के लिए बच्चे के मन में कोई बदलाव नहीं आएगा । वह पहले भी इसे छूना चाहता था, छूता भी था – और अब भी वही जारी रहेगा ।

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दूसरी स्थिति : गर्म कुकर मौजूद है,  खिलौना नहीं है, अभी कुछ सीखा नहीं है 

input 1: खिलौना नहीं है (0)

input 2: गर्म कुकर मौजूद है (1)

weights :

 

शाखाओं के weights : सीखने से पहले – बच्चे सामने दिखती हुई हर चीज़ छूना चाहते हैं – तो सभी weight अभी “+1″ ही हैं ।

Desired output (इच्छित परिणाम / निर्गम ) है “-1″ अर्थात बच्चे को कुकर नहीं छूना चाहिए ।

चित्र अब ऐसा बनेगा :

 

 

* ऊपर की शाखा से (खिलौने से) योग ग्रंथि पर आगत है (इनपुट)x (वजन) = (0) x (+1) = 0

* नीचे की शाखा से (कुकर से ) योग ग्रंथि पर आगत है (इनपुट)x (वजन) = (1) x (+1) = 1

 

* तो योग बना 1+0 = 1

* योग शून्य से अधिक है । तो एक्टिवेशन फंक्शन से आउटपुट होगा +1 – अर्थात “हाँ” । तो बच्चा कुकर को छुएगा ।

 

*  इच्छित आउटपुट “नहीं” (= -1) था ।

सो इच्छित (desired ) और actual (वास्तविक) आउटपुट, दोनों में फर्क है

(यह एरर बच्चे को हाथ की जलन से आएगा , कृपया इसे अन्यथा न लें, मैं किसे बच्चे को जलाने की बात नहीं कर रही, सिर्फ सीखने की प्रक्रिया समझा रही हूँ)

* एरर = त्रुटी = इच्छित आउटपुट – वास्तविक आउटपुट

* तो एरर हुआ (-1) – (+1) = -2

 

* एरर को हर एक इनपुट के वजन को सुधारने / बदलने / संशोधित करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है

* सुधार = करेक्शन= (इनपुट)x(एरर) द्वारा

* ऊपरी शाखा में

सुधार = करेक्शन = (इनपुट)x (एरर) = (0 खिलौना मौजूद नहीं है)x (-2) = 0

अर्थात जो इनपुट मौजूद नहीं है, उसके वजन में कोई बदलाव नहीं आएगा ।

* नीचे वाली शाखा में

सुधार = करेक्शन = (इनपुट)x (एरर) = (1 कुकर मौजूद है )x (-2) = -2

****** तो कुकर का नया वजन बना

पुराना वजन +सुधार = (+1) + (-2) = -1

* तो इस पूरी प्रक्रिया के बाद, खिलौने के लिए बच्चे के मन में कोई बदलाव नहीं आएगा, बच्चा पहले भी खिलौने को छूना चाहता था, छूता भी था – और अब भी वही जारी रहेगा । लेकिन कुकर के विषय में वजन +1 से बदल कर -1 हो गया – जिससे अगली बार बच्चा इसे नहीं छूना चाहेगा । 

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तीसरी स्थिति : गर्म कुकर – एक बार जलने के कारण सीख चुकने के बाद 

input 1: खिलौना नहीं है (0)

input 2: गर्म कुकर मौजूद है (1)

weights : अब सीख चुकने के बाद वजन हैं खिलौने के लिए +1 और कुकर के लिए -1

Desired output (इच्छित उत्तर) है -1 अर्थात बच्चे को कुकर नहीं छुना चाहिए ।

चित्र अब भी ऐसा ही बनेगा , किन्तु वजन अलग हैं :

 

 

 

* ऊपर की शाखा से (खिलौने से) योग ग्रंथि पर आगत है (इनपुट)x (वजन) = (0) x (+1) = 0

* नीचे की शाखा से (कुकर से ) योग ग्रंथि पर आगत है (इनपुट)x (वजन) = (1) x (-1) = -1

 

* तो योग बना 0+(-1) = -1

* योग शून्य से कम है । तो एक्टिवेशन फंक्शन से आउटपुट होगा -1 – अर्थात “नहीं ” । तो बच्चा कुकर को नहीं छुएगा 

 

* इच्छित आउटपुट भी “नहीं” (= -1) था । सो इच्छित और एक्चुअल आउटपुट, दोनों में फर्क नहीं है(बच्चे को जलन महसूस नहीं करनी पड़ेगी क्योंकि उसने कुकर को नहीं छुआ है )

* एरर = इच्छित आउटपुट – एक्चुअल आउटपुट = (-1) – (-1) = 0

 

* एरर को हर एक इनपुट के वजन को सुधारने / बदलने के लिए प्रयुक्त किया जाता है

* सुधार = करेक्शन= (इनपुट)x(एरर) द्वारा , एरर शून्य होने से आगे सुधार शून्य ही रहेगा, और वजन नहीं बदलेंगे

* तो इस पूरी प्रक्रिया के बाद, खिलौने के लिए बच्चे के मन में कोई बदलाव नहीं आएगा, बच्चा पहले भी खिलौने को छूना चाहता था, छूता भी था – और अब भी वही जारी रहेगा ।  कुकर को नहीं छूना चाहता था, वहां भी वैसा ही वजन बना रहेगा ।

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सीखने की इस प्रक्रिया को एरर करेक्शन लर्निंग कहते हैं । 

 

आशा है आप लोग इसे समझ पाए होंगे । मुझे यह विषय बहुत रोचक लगता है सो शेयर कर रही हूँ ।

 

जारी …

neural networks 4 learning paradigms

पुराने भाग 123

यह श्रंखला artificial intelligence या neural networks से सम्बंधित है । कमोबेश यह उसी प्रकार होता है, जैसे प्राणियों में सीखना होता है ।

इससे पहले के भागों में हमने देखा कि पूर्वाग्रह क्या होता है, पहचान और निर्णय कैसे होते हैं, और “सीखना” कैसे होता है । इस भाग में हम -

1. सीखने  के प्रकार (learning paradigms ) पर बात करते हैं , और


2. सीखने की विधियों ( learning algorithms ) के नाम देखेंगे (इनकी विस्तृत चर्चा अगले भाग में करूंगी, यह पोस्ट अधिक लम्बी हो जायेगी )।

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Learning paradigms : यह वे तरीके हैं, जिनसे न्यूरल नेटवर्क अपने आस पास की बाहरी दुनिया के बारे में जानकारी प्राप्त करता है । यह बाहर की दुनिया के साथ interaction करने के प्रकार हैं, भीतर से सीखने के नहीं ।   इनमे तीन मुख्य प्रकार हैं -

1. Learning with a teacher (गुरु की मदद से सीखना)

2. Learning without teacher with supervision (with critic ) (आलोचक / समीक्षक की सहायता से गुरु के बिना सीखना )

3. Unsupervised learning (स्वयं सीखना)

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1. Learning With Teacher

Learning With Teacher

इस प्रकार की प्रक्रिया इस तरह से काम करती है कि , “शिष्य” और “गुरु” दोनों ही नेटवर्क्स को बाहरी परिवेश से एक ही इनपुट वेक्टर मिलता है, और दोनों अपना अपना निर्णय लेते हैं । फिर दोनों के निर्णय के तुलना की  जाती है  । शिष्य और गुरु नेटवर्क में फर्क क्या है ?? कुछ भी नहीं, सिवाय इसके की , गुरु नेटवर्क पहले बना है, और वह परिवेश के बारे में पहले से सीख चुका है । यही बात इस तरह से देखिये – जीवन में मैं “teacher” के रूप में कार्य कर रही हूँ, और “शिष्यों” को पढ़ाती हूँ । क्या फर्क है मुझमे और उनमे ? सिर्फ – the accident of the date of birth  :) । यदि वे मुझसे 20 साल पहले जन्म लेकर पढ़ आये होते, तो आज वे मुझे पढ़ा रहे होते, मैं उनकी शिष्य होती ।

तो – “गुरु” नेटवर्क परिवेश के बारे में पहले ही सीख चुका है । वह इनपुट के सम्बन्ध में जो भी निर्णय ले वह “सही “निर्णय या desired output माना जाएगा । और शिष्य का निर्णय इसके साथ जांचा जाएगा । यदि तो शिष्य का उत्तर गुरु के उत्तर के साथ मिल रहा हो,. तो शिष्य को कुछ नहीं करना है । किन्तु यदि उत्तर आपस में न मिलें, तब ? तब बदलाव गुरु में नहीं, सिर्फ शिष्य में आने वाला है इस परिस्थिति में, क्योंकि गुरु feedback loop में नहीं है । सोचिये की एक शिक्षक नन्हे बच्चों को

अ – अनार का,

आ – आम का,

       इ – इमली का आदि सिखाता है ।

अब परिवेश से इनपुट आता है यह चित्र —

* यह इनपुट परीक्षा के लिए प्रधानाध्यापक जी ने दिया है -

* यह प्रश्न ” teacher” और “student ” दोनों को मिला है ।

* Teacher (जो पहले से सीख चुका है, वह “इसके आगे “” (आम का)  अक्षर होना चाहिए” ही कहेगा ।

* यदि

शिष्य भी “” (आम का)  लिखे – तो उसे कोई बदलाव करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि “error “सिग्नल शून्य है

* लेकिन

यदि शिष्य “आ ” न लिख कर कोई और अक्षर लिखे – तो उसे और सीखना होगा ।

ध्यान दीजिये – इसमें – सारी प्रक्रिया गुरु के सही होने पर निर्भर है  यदि गुरु स्वयं ही गलत जानकारी रखता हो, तो वह शिष्य को सही नहीं सिखाएगा, बल्कि उल्टा, शिष्य यदि पहले से थोडा बहुत जानता हो और इसे “आ” कहना चाहे लेकिन गुरु गलती से इसे “अ” मान रहा है – तो शिष्य को जबरदस्ती यह सीखना होगा कि  यह “अ” ही है । ऊपर चित्र में देखिये – गुरु फीडबैक लूप में है ही नहीं – वह नहीं बदलेगा ।

शिष्य तब तक पास नहीं हो सकेगा – जब तक गुरु उसे “सीख चुका” घोषित न करे । { मज़ाक नहीं है यह – हम कर्नाटक में रहते हैं – मेरे बेटे को कई साल पहले यहाँ के एक सर हिंदी पढ़ाते थे जो हिंदी नहीं जानते थे । तो उन्हें मुहावरों के अर्थ सिखाते हुए ऐसे बड़े मज़ेदार (?) किस्से होते रहे । मैं यदि बेटे को सही अर्थ सिखा भेजती भी थी तो वहां लिखने पर उसके अंक कट जाते थे ) कल परसों ही सुज्ञ जी की एक पोस्ट पर यह लिखा मैंने टिप्पणी  में कि आजकल बोर्ड परीक्षाओं में कई शिक्षक खुद नक़ल कराते हैं – तो शिष्यों के यह कैसे सिखाया जाए कि नक़ल करना बुरा है ?

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2. Learning without a teacher, in the presence of a critic :

Learning without a teacher, in the presence of a critic 

यह प्रक्रिया ऊपर वाली प्रक्रिया से भिन्न है । पहली बात तो यह है कि शिष्य का उत्तर “गुरु” जांच नहीं रहा है – गुरु तो कोई है ही नहीं । शिष्य को जानने वाले “एक्सपर्ट” से “सलाह” मिल रही है की ऐसा होना चाहिए, ऐसा नहीं । किन्तु वह बाध्य नहीं है इसे मानने के लिए । शिष्य का आउट पुट वापस वातावरण को प्रभावित करता है । और वातावरण क्रिटिक को । तो समय के साथ वातावरण भी बदल सकता है, क्रिटिक भी बदल सकता है, शिष्य भी, और यह भी हो सकता है की दोनों ही न बदलें । जो “reinforcement ” है, वह शिक्षण नहीं है । वह सिर्फ एक माहौल है, जो उस समय उन परिस्थितियों में “सही” माना जा रहा है । स्टुडेंट नेटवर्क 100 में से 95 स्थतियों में इसे मान भी लेगा , लेकिन शत प्रतिशत ऐसा नहीं होगा । तो नेटवर्क खुद तो सीखेगा ही, किन्तु सीखते हुए जब वह क्रिटिक से सहमत न होगा, तब नेटवर्क के साथ ही परिवेश भी धीरे धीरे बदलता रहेगा ।

इसके उदाहरण मानवीय सन्दर्भों में । हम जब स्कूल में थे, तब रंग को अंग्रेजी में colour लिखा जाता था । यदि color  लिखा, तो अंक कट जाते थे । लेकिन आज word processors, colour लिखने पर उसे गलत और color को सही बताते हैं । इसी तरह से schedule  को शेड्यूल न पढ़ कर स्केड्यूल पढ़ा जाता है । programme शब्द अब program  बन चुका है । हिंदी फिल्मों की हिरोइन साडी की जगह सलवार कमीज़ पहनने लगी, फिर अब वेस्टर्न ड्रेसेज में ही दिखती है । पिता बूढ़े, थके, सफ़ेद बालों वाले, और धोती कुरते में नहीं, सूटेड बूटेड और कनपटी पर हलकी सफेदी लिए नज़र आते हैं ।

ध्यान दीजिये – विज्ञापनों की माएं भी बदली हैं, परन्तु उतनी नहीं जितनी फिल्मों की । क्योंकि दोनों के टार्गेट औडीएन्स अलग हैं । विज्ञापन अधिकतर गृहिणियों के अपना उत्पाद बेचने के लिए हैं, परिवेश अलग है, क्रिटिक अलग है । तो विज्ञापनों की बेटियां और माएं यदि अधिक ग्लैमरस हुईं, तो अपने दर्शको (उपभोक्ताओं) को दूर कर देंगी । सो वहां परिवेश कम बदला है । वे अब भी थोड़ी मोडर्न तो हैं , लेकिन अल्ट्रा मोडर्न नहीं हैं । लेकिन फिल्म की हिरोइन दर्शकों को टिकट खिड़की पर लाने के लिए है । तो वहां का परिवेश अधिक तेज़ी से बदला, क्योंकि ज्यादा तादाद में “स्टुडेंट” नेटवर्क्स ने परिवेश को समझने वाले  क्रिटिक के विरुद्ध जाने का रिस्क लिया, तो लर्निंग रेट तेज़ रहा 

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3. Unsupervised Learning

Unsupervised Learning 

इसमें कोई किसीको नहीं सिखाता । स्टुडेंट सीखना चाहे और सीख पाए – तो सीखेगा । नहीं, तो नहीं सीखेगा । लेकिन परिवेश कभी नहीं बदलेगा, feedback है ही नहीं । यदि नहीं सीखे, तो survival कठिन है । इसके उदाहरण हैं, जैसा की हमने कहानी सुनी है, मोगली / टार्ज़न की । एक बालक कुछ सीखने समझने की उम्र से पहले ही जंगल में खो जाता है । उसे सिखाने को न वहां गुरु है, न ही क्रिटिक । उसे अपने आप ही सीखना है  ।वह सीखे या न सीखे, परिवेश नहीं बदलने वाला  । कोई उसे बताने वाला भी नहीं की उसने जो सीखा वह सही है, गलत है या कुछ और । वह सीख लेगा, तो जीवित रहेगा, नहीं सीखेगा तो पता नही क्या होगा । यह है अन्सुपर्वाइज्ड लर्निंग ।

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अगले भाग में हम learning algorithms देखेंगे ।

इनमे प्रमुख हैं -

1. error correction learning,

2. hebbian learning,

3. competetive learning and

4. memory based learning

यदि यह श्रंखला बहुत टेक्नीकल हो रही हो, तो मुझे बताइये । प्रयास तो कर रही हूँ इसे सिम्पल रखने का, पर नहीं जानती की यह कैसा हो पा रहा है  ।

अगले भाग तक तक – विदा ।

japan quake 4 – how volcanoes are formed

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इस श्रुंखला का यह आखरी भाग है । इसके पहले के भागों में हमने () भूकंप आने की प्रक्रिया () और सुनामी आने की प्रक्रिया (  ) देखी, संतोरिणी द्वीप के भयंकर विस्फोट (  ) , और न्यूक्लियर मेल्ट डाउन पर ( 3 ) बात की । इस आखरी भाग में हम ज्वालामुखियों (volcanoes) पर बात करते हैं ।

 

इस पोस्ट में तीन मुख्य भाग हैं – ज्वालमुखी बनने / फूटने की प्रक्रिया; विस्फोट के प्रभाव; और ज्वालामुखियों के प्रकार ।

सभी चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।————————-

ज्वालामुखी की प्रक्रिया :

 

ज्वालामुखी मूल रूप में धरती की ऊपरी सतह crust में टेक्टोनिक प्लेटों तक गहरे उतारे हुए क्रेक्स होते हैं , (देखिये पहला भाग) जिसमे से भीतर का उबलता हुआ मेग्मा अपने अत्यधिक दबाव की वजह से बाहर आ जाता है । यह मैंने पहले भाग मे दूध की मलाई का उदहारण लेकर बताया था ।

[

 चाहें तो इस नीले भाग को छोड़ कर आगे बढ़ जाएँ - यह पहले भाग का संक्षिप्त सार है (सिर्फ ज्वालामुखी के सन्दर्भ में ):

 

चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।

 

धरती के भीतर अत्यधिक गर्मी और दबाव है, जिसकी वजह से सब कुछ पिघला हुआ है । पिघले हुए द्रव्य को धरती के हज़ारों वर्षों तक लगातार घूमने से ठंडा होने का मौका मिला , और ऊपर की सतह ठंडी हो कर मलाई की तरह जम गयी । परन्तु मलाई ही की तरह - यह एक टुकड़े में नहीं जमी बल्कि इस के अलग अलग सात मुख्य टुकड़े हैं - जिन्हें हम टेक्टोनिक प्लेट्स कहते हैं। ये टेक्टोनिक प्लेटें सख्त पत्थर जैसी थीं, जो हजारों वर्षों धूप की गर्मी से फैलने और सिकुड़ने की प्रक्रिया से पहले क्रैक हुई, फिर टूट कर छोटे (?) आकार में परिवर्तित हुई । हवा, धूप, बारिश आदि के लगातार प्रभाव से धीरे धीरे रेत और मिटटी आदि बने । परन्तु हम जो भी ऊपर देखते हैं, यह सिर्फ कुछ ही किलो मीटर गहरा है । नीचे सब कुछ इन टेक्टोनिक प्लेटों पर ही "रखा" हुआ है । सारे समुद्रों के सागरतल भी, और सारे महाद्वीपों के भूतल भी - इन्ही टेक्टोनिक प्लेटों पर टिके हैं । और ये टेक्टोनिक प्लेटें तैर रही हैं भीतर के पिघले मेग्मा पर । जब ये टेक्टोनिक प्लेटें एक दूसरे से आगे/ पीछे आदि खिसकना चाहती हैं, तो अत्यधिक भार (ऊपर महाद्वीप और समुद्रों का भार है ) के कारण अत्यधिक फ्रिक्शन होता है - और ये सरक नहीं पातीं । जब कई सौ साल गुज़रते हुए दबाव बहुत बढ़ जाए - तो कमज़ोर पड़ जाने वाले जोड़ पर पत्थर टूट जाते हैं और प्लेटें अचानक सरक जाती हैं । इसी से भूकंप आते हैं ।

]

 

कहीं कही इन टेक्टोनिक प्लेटों के बीच में क्रेक्स भी हैं, जहां से नीचे का माग्मा कभी कभी बाहर उबल आता है । यही ज्वालामुखी का रूप लेता है । परन्तु यह तीन तरह के कॉम्बिनेशन हो सकते हैं

 

1, सिर्फ भूकंप – कहाँ ? जहां टेक्टोनिक प्लेटें खिसकें, परन्तु मेग्मा बाहर न आये ।

 

2. सिर्फ ज्वालामुखी – जहां मेग्मा बाहर आने योग्य क्रैक तो हो, परन्तु दबाव इतना न हो की प्लेट खिसक सके। यहाँ, या तो एक प्लेट दूसरी के नीचे को खिसकती है ( और नीचे के मैंटल की गर्मी से पत्थर पिघल कर मेग्मा बनने लगते हैं ) या फिर प्लेटें एक दुसरे से दूर खिसकती हैं, जिससे क्रैक बनते हैं और चौड़े हो जाते हैं – जिनसे नीचे का लावा बाहर आने का रास्ता पा जाता है ।

 

3. सबसे डेंजरस है वह कोम्बिनेशन जहां ये दोनों एक साथ होने की संभावना बने – इन्हें “thermal plume” कहा जाता है । शायद ये क्रैक इतने मोटे हैं / इनकी झिर्रियाँ किसी कुँए की झिर्रियों की ही तरह आस पास फ़ैली हुई है, जिससे पिघला हुआ मेग्मा इधर उधर फ़ैल कर टेक्टोनिक प्लेटों के जोड़ों को लुब्रिकेट कर रहा है । इससे टेक्टोनिक प्लेटों के बीच फ्रिक्शन कम होता है । तो ज्वालामुखी और भूकम्प दोनों ही आते है ऐसी जगहों पर । भाग दो मे हमने जिस सेंटोरिनी के बारे में बात के – ऐसा ही “thermal plume” है ।

 

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ज्वालामुखियों के प्रभाव :

आम तौर पर ऐसा लगता है की ज्वालामुखी उतने विनाशकारी न होते होंगे जितने भूकंप – क्योंकि उनका असर सिर्फ उस भूभाग तक होता होगा- जितने में लावा बह कर जाए । परन्तु ऐसा है नहीं ।

 

1.

ज्वालामुखी से सिर्फ लावा ही नहीं निकलता, साथ ही भीतर की जहरीली गैस, एसिड (जिससे काफी बड़े क्षेत्र में एसिड रेन का भय होता है ), राख और धुआं आदि भी वातावरण में बड़े ही उच्च चाप से फिंकते हैं (poisonous gases, acid, ash and smoke)। यह सब वातावरण में फ़ैल जाता है । जो पिघले पत्थर हैं – वे एक नदी की तरह बह निकलते हैं । साथ ही (- जैसे दूध उबल कर गिरे तो सिर्फ दूध बहता ही नहीं, बल्कि दूध की नन्ही नन्ही महीन सी बूँदें भी उछलती हैं हवा में, जो इतनी छोटी होती हैं की दिखती नहीं – किन्तु होती तो हैं, और पूरे प्लेटफोर्म पर दूध के छीटें दिखने लगते हैं ) पिघले माग्मा (magma) की महीन बूंदे भी बड़े वेग से आसमान में फिंक जाती हैं । ये इतनी छोटी हैं कि बड़ी जल्दी जम जाती हैं और हवा में ही धूल बन जाती हैं ।

 

 

 

 

 

 

चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।

 

2.

जो कुछ मोटी हों – वे धूल / मिटटी (dust) के मोटे कण बनाती हैं – जो अपने वजन की वजह से धीरे धीरे नीचे बैठ जाती हैं । परन्तु अत्यधिक छोटे धूल के कण बैठते नहीं – वातावरण में ही रहते हैं । ये इतने महीन हैं – की ये हवाई जहाज़ों के air conditioning filters के पार निकल जाते हैं । इससे हवाई जहाज़ों के संयंत्र फेल हो कर क्रैश हो सकता है । इसके अलावा यह फैली हुई धूल कई महीनों तक आस पास के बहुत बड़े क्षेत्र में लोगों को सांस की तकलीफ (दमा आदि) और किडनी की भी – क्योंकि यह धुल हमारी साँसों से फेफड़ों से होकर खून तक पहुँच सकती है । 2010 में आइसलैंड में जो ज्वालामुखी फूटा था - उसकी वजह से महीने से ज्यादा वक़्त ता यूरोप पर से हवाई उड़ानें डिस्टर्ब हो गयी थीं । indoneshia में विस्फोट के बाद बरसों तक इस धूल ने दुनिया को रंग बिरंगे सूर्योदय और सूर्यास्त दिखाए ।

 

3.

कई बार ज्वालामुखी फटने से भीतर का मेग्मा बाहर निकलने से भीतर खोखलापन आ जाता है – और उस पहाड़ की (या आस पास की ) धरती धंस (volcanic collapse )जाती है । इसे caledra कहते हैं । कई बार इस गड्ढे में लावा भर जाता है और जम जाता है ।

 

4.

यदि पहाड़ ऊंचा था और उस पर बर्फ जमी थी – तो पिघले गर्म पत्थर जब टनों बर्फ से मिलते हैं – तो क्षण भर में बर्फ पिघल जाती है, और लावा ठोस मिटटी में बदल जाता है । इससे लावा की छोटी नदी के बजाये सारे ही पिघली बर्फ की कीचड भरी गर्म नदी बाढ़ की तरह अचानक ही आ जाती है – और रास्ते में आये हर गाँव और शहर को नेस्तनाबूत कर देती है । इसे mud slide कहते हैं ।

 

 

 

चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।

 

5.

लावा का बहाव तो खैर सब जानते ही हैं की विनाशकारी है ही ।

 

 

 

चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।

 

ये सभी वजहें इतिहास में महाविनाश का कारण बनी हैं ।

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ज्वालामुखियों के प्रकार :

 

चार मुख्य तरह के ज्वालामुखी होते हैं – cinder cones, composite volcanoes, shield volcanoes, और lava domes. ज्वालामुखियों को active (जो लगातार फूटते रहते हैं ) , intermitent (जो फूटता रहता है परन्तु लगातार नहीं ) dormant (जो काफी समय से नहीं फूटा, लेकिन फूटने की अपेक्षा है ) और extinct (मृत – जो जबसे इतिहास की जानकारी है तब से अब तक कभी नहीं फूटा, इसलिए मान लिया गया कि अब न फूटेगा ) मानते हैं – लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें “मृत” घोषित किया जा चुका था – परन्तु ये फिर से फट पड़े!!

 

समुद्र के तल में कई जगह ऐसे क्रैक हैं जो भूभाग के ज्वालामुखी की तरह अचानक नहीं फटते , बल्कि लगातार थोडा थोडा रिसते रहते हैं । इनसे निकला लावा जमता रहता है और नए सागरतल का निर्माण होता रहता है । कई द्वीप भी ऐसे बने हैं ।

 

यहाँ एक सारिणी है – इतिहास के सबसे विनाशकारी ज्वालामुखी विस्फोटों की । कुछ विशेषज्ञ मानते हैं की अटलेटिस सभ्यता का सर्वनाश वोल्कनिक इरप्शन से हुआ । ऊंचे बर्फ से दबे ज्वालामुखी में विस्फोट से टनों बर्फ पिघली और कीचड की बहती नदी (बाढ़) ने पूरे शहरों को ढँक दिया । जो जहां जैसे था – जम गया उस कीचड के नीचे । परन्तु यह सच है या नहीं इसका कोई प्रमाण नहीं है । इंडोनेशिया के krakatoa ज्वालामुखी के भयंकर विस्फोट से वह पूरा द्वीप धंस गया और समुद्र में डूब गया – यहाँ के निवासी तो खैर समुद्र की भेंट चढ़ ही गए, साथ ही इससे उठी सुनामी ने और भी कई द्वीपों पर भयंकर तबाही की ।

जापान का भूकंप – ३ : न्यूक्लियर मेल्ट डाउन – क्या और कैसे

जापान का भूकंप ३ : ज्वालामुखी

पिछले भागों ( ) में हमने भूकंप आने की प्रक्रिया ()  और सुनामी आने की प्रक्रिया (  ) देखी, संतोरिणी द्वीप के भयंकर विस्फोट की बात की  (  ) , अब इस भाग में न्यूक्लियर मेल्ट डाउन पर बात करते हैं | अगले (आखरी ) भाग में ज्वालामुखियों पर बात करेंगे ।

मार्च २०११ में आये जापानी भूकंप के समय वहां के फुकुशिमा न्यूक्लियर पावर प्लांट में कुछ हिस्सों में धमाके हो रहे थे और यह आशंका थी की कही न्यूक्लियर मेल्ट डाउन न हो जाए , कहीं चर्नोबिल जैसी त्रासदी न देखने में आये । यह होता क्या है ? इस पोस्ट में समझने का प्रयास करते हैं ।

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बिजली बनाने की प्रक्रिया वही होती है जो आमतौर पर बाज़ार में generator में होती है । जैसा मैंने पहले मेटर एंटी मेटर वाली पोस्ट में कहा था – ऊर्जा में principle of coservation of energy काम करता है – अर्थात ऊर्जा दूसरी तरह की ऊर्जा में बदल सकती है परन्तु विनष्ट नहीं हो सकती । जैसे कोयले में भरी रासायनिक ऊर्जा उसके जलने से गर्मी में बदलती है – जिससे पानी उबाला जाता है – इस उबलते पानी की शक्ति से विशाल dynamo घूमते हैं – जिससे बिजली बनती है (thermal power)। या फिर किसी बाँध में ऊँचाई से गिरते पानी से – hydal power । जनरेटर में पेट्रोल जलने से । हवा से चकरी घूमे – तो wind power आदि ।

अब जो nuclear power प्लांट होते हैं - वहां भी विशालकाय केतलियों में पानी उबाला जाता है – लेकिन यह गर्मी कोयले आदि को जला कर नहीं, बल्कि आणविक विखंडन से आती है । उसी पोस्ट में हमने यह भी चर्चा की थी की पदार्थ में भी  principle of coservation of matter काम करता है – तो पदार्थ एक से दूसरे जोड़ और गठबन्धनों में तो जा सकता है (2H +1O = 1H2O ) किन्तु न तो बन सकता है न ही विनष्ट हो सकता है । जब ये गठबंधन बनते बदलते हैं (chemical reactions ) तब या तो ऊर्जा भीतर को सोखी जाती है, या बाहर निकलती है ।

किन्ही विशिष्ट परिस्थितियों में कुछ पदार्थ ऊर्जा में बदल सकते हैं । एक ग्राम पदार्थ से ४५,०००,०००,०००,०००,००० जूल ऊर्जा मिल सकती है , आणविक अभिक्रियाओं से !!!

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Background information (इसमें रूचि न हो तो इस नीले हिस्से को छोड़ कर आगे पढ़ें )

साधारण तौर पर पदार्थ मिश्रण (mixtures ) हैं – जैसे समुद्र का पानी । इन मिश्रणों को (उदहारण पानी और नमक ) को भौतिक प्रक्रियाओं (physical processes ) द्वारा अलग अलग किया जाए तो सत्व (pure substance ) मिलते हैं – जो या तो शुद्ध तत्व (elements ) हैं, या उनके संयोजन (compounds ) । नमकीन पानी को अलग किया जाए distillation द्वार तो पानी (H2O ) और नमक (NaCl ) मिलेगा । संयोजनों को आगे तोडना हो, तो भौतिक (physical ) नहीं, बल्कि रासायनिक (chemical ) प्रोसेस चाहिए । शुद्ध तत्त्व परमाणुओं (atoms ) से और संयोजन अणुओं (molecules ) से बने हैं (जैसे पानी के एक molecule में दो हाईड्रोजन और एक ओक्सिजन atom होते हैं , नमक में एक सोडियम और एक क्लोरिन ) ।


इन परमाणुओं के भीतर न्यूक्लियस में भारी कण प्रोटोंस और न्यूट्रोंस हैं, और बाहर हलके इलेक्ट्रोंस घूम रहे हैं । 


साधारण रासायनिक प्रतिक्रियाओं में न्यूक्लियस बिना किसी बदलाव के वैसा ही बना रहता है – जबकि बाहरी इलेक्ट्रोन एक से दूसरे परमाणु में जुड़ सकते हैं । इससे भिन्न तत्त्व एक दूसरे से जुड़ कर नए संयोजन बनाते हैं (जैसे Na + Cl = NaCl अर्थात सोडियम और क्लोरिन का एक एक परमाणु जुड़ कर नमक का एक अणु बनता है ) यह प्रक्रिया मैंने यहाँ समझाई थी ।


किन्तु आणविक अभिक्रियाओं में (nuclear reactions में ) न्यूक्लियस का ही या तो विखंडन (fission ) या संयोजन (fusion ) होता है । इससे वह तत्त्व या तो दूसरे तत्त्व में बदलता है (यहाँ देखें ), या फिर अपने ही दूसरे आयसोटोप में (यहाँ देखें)। जब यह होता है – तो अत्यधिक ऊर्जा बनती है । यही ऊर्जा (गर्मी के रूप में ) बाहर निकलती है – जिसे अलग अलग रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है ।

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Nuclear Power Plant Working in simple language :


सभी चित्र गूगल इमेजेस से साभार : किसी भी चित्र को बड़ा देखने / लेबल पढने को, उस पर क्लीक करें )

१. न्यूक्लियर प्रतिक्रिया :

न्यूक्लियर पावर प्लांट में परमाणु के fission विखंडन ( fusion या संलयन का इस्तेमाल अक्सर नहीं किया जाता ) से प्राप्त ऊर्जा इस्तेमाल की जाती है । अधिकतर प्लांट्स में ईंधन के रूप में युरेनियम २३५ का इस्तेमाल होता है । प्रतिक्रिया से बहुत तेज़ गति पर न्यूट्रोन निकलते हैं – जो इस प्रक्रिया को लगातार आगे बढाते हैं । इसके अलावा गर्मी के रूप में ऊर्जा निकलती है । इस प्रक्रिया की गति को कम ज्यादा करने के लिए लेड या कैडमियम के रोड्स कण्ट्रोल करने के लिए होतेहैं । यह चित्र देखिये :

२. कोर, fuel रोड व् कण्ट्रोल रोड :


यह प्लांट का कोर (core ) या रिएक्टर वेसेल है जिसमे हरे रोड्स लेड या कैडमियम जैसे पदार्थों के कण्ट्रोल रोड (control rod ) हैं जो न्यूट्रोन को सोख कर आणविक प्रतिक्रिया को धीमा करते है । कोर वेसेल मेटल की है, और यह पूरा अरेंजमेंट concrete tower के भीतर है (ऊपर चित्र देखिये)। लाल रोड युरेनियम के (ईंधन या fuel rod ) हैं जो विखंडित हो रहा है और ऊर्जा और न्युत्रोंस को जन्म दे रहा है । प्रक्रिया की गति बढानी हो तो ईंधन के रोड अधिक और कण्ट्रोल रोड कम पेवस्त किये जाते हैं, और घटानी हो तो इसका उल्टा । आकस्मित स्थिति (emergency ) में कण्ट्रोल रोड पूरी तरह भीतर गिर जाते हैं, जिससे प्रतिक्रिया पूरी तरह रोकी जा सके । इससे एक fuel rod से दुसरे तक न्यूट्रोन का प्रवाह रुक जाता है – जिससे जो भी विखंडन हो रहा हो, वह हर एक रोड के भीतर ही सीमित हो जाता है – एक से दूसरे fuel rod तक न्यूट्रोन नहीं पहुँच पाते और क्रिटिकल मास से कम होने से एक रोड इस प्रक्रिया को बनाये नहीं रख पाता  ।

३. पानी :

यह सब कुछ पूरी तरह से पानी में डूबा हुआ है (हेवी वाटर) । यहाँ पानी के दो मुख्य काम हैं । एक तो यह न्युत्रोनों की अत्यधिक गति को कुछ धीमा करता है । यदि ऐसा न किया जाए – तो न्यूट्रोन जितनी तेज गति से चले हैं – वे अगले रोड के युरेनियम एटम के न्यूक्लियस से सीधे ही निकल जायेंगे , उसमे फ़िजन की शुरुआत किये बिना ही । इससे प्रतिक्रिया एक तो आगे नहीं बढ़ेगी, दूसरे ये रेडियो एक्टिविटी को बाहरी पर्यावरण तक पहुंचा देगा ।

पानी का दूसरा काम यह है कि यह प्रतिक्रिया से निकलती हुई गर्मी को सोखता है । और इसे ट्रान्सफर करता है । यह गर्मी आगे भाप बनाने में काम आती है । ध्यान दीजिये यह कोर का पानी बाहर नहीं निकल रहा है । यही पानी गर्मी को काम में लेने के बाद फिर से ठंडा कर के भीतर पहुंचाया जाता है । यानी यह इसी closed loop में recirculate होता रहता है – बाहर नहीं जाता ।

इन तेज़ गति के न्युत्रोंस को सोख लेने से पानी के हाइड्रोजन परमाणु अपने भारी आयसोटोप ड्युटेरियम और ट्रीटियम (लिंक देखिये ) में परिवर्तित हो जाते हैं – जिससे पानी हेवी और सुपर हेवी पानी में परिवर्तित हो जाता है । यह भी रेडिओ एक्टिव है क्योंकि ये दोनों ही आयसोटोप स्टेबल नहीं हैं । इस पानी का डिस्पोसल बड़ी सावधानी से करना होता है।

ऊपर चित्र में देखिये । हलके नीले रंग के पाइप में जो पानी बह रहा है , वह कोर में से हो कर गुज़र रहा है। कोर में यह गर्म हो जाता है । फिर हीट एक्सचेंजर में यह गर्मी गाढे नीले पाइप में घूमते ठन्डे पानी को दे दी जाती है । यह पानी कूलिंग टावर में फिर ठंडा कर के रेसर्कुलेट होता है ।

दो तरह के रिएक्टर होते हैं – प्रेशराइज़्ड वाटर रिएक्टर, और बोइलिंग वाटर रिएक्टर ।

४. प्रेषराइज्ड वाटर रिएक्टर :

कोर का भारी (हेवी ) पानी (जो रेडिओ एक्टिव है) अत्यधिक प्रेशर पर रखा जाते है । तो यह १०० डिग्री पर भी उबल कर भाप (gas ) नहीं बनता , बल्कि तरल (liquid ) ही बना रहता है ।  इस पानी की गर्मी हीट एक्सचेंजर में नॉन रेडिओ एक्टिव पानी को जाती है । वह पानी उबल कर “सुपर हीटेड स्टीम ” (super heated steam ) बनाता है – जिससे विशाल turbine (टर्बाइन) घूमती हैं और बिजली बनती है । यह चित्र देखिये :

ध्यान दीजिये कि टर्बाइन गाढे नीले पानी के पाइप पर है, कोर वाले हलके नीले पाइप पर नहीं है ।

५. बोइलिंग वाटर रिएक्टर :

अब यह चित्र देखिये :

जैसा कि चित्र में साफ़ दिख ही रहा है – टर्बाइन इस बार कोर वाले पानी से ही चल रही है । कोर का पानी खुद ही वहां की गर्मी से उबल कर स्टीम बन रहा हा और टर्बाइन को घुमा रहा है । इसके बाद इसे हीट एक्सचेंजर में ठंडा कर के वापस भेजा जा रहा है ।

इस तरह के प्लांट में फायदा यह है कि कोर के पानी को प्रेशराइज़ करने का खर्चा बच जाता है । लेकिन बहुत बड़ा नुकसान भी है कि रेडिओ एक्टिव पानी ही स्टीम बन रहा है, जिससे टर्बाइन भी contaminate हो जाती है ।इस कंटामिनेशन के कारण जब प्लांट को dismantle  किया जाएगा – तब रेडिओ एक्टिव कॉम्पोनेन्ट ज्यादा होने से अधिक खतरा और खर्चा होगा ।

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अब आते हैं न्यूक्लियर मेल्ट डाउन के होने की प्रक्रिया पर ।

१.

इमरजेंसी की स्थिति में कण्ट्रोल रोड्स पूरी तरह अन्दर गिर जाते हैं, और न्यूट्रोन एक से दूसरे ईंधन रोड तक नहीं पहुँच पाते । इससे आणविक विखंडन की प्रक्रिया तकरीबन बंद सी हो जाती है । हर एक रोड क्रिटिकल मास (critical mass ) से कम है – तो विखंडन बंद सा हो जाता है । तो आणविक विस्फोट का भय बिलकुल नहीं रहता । जापान में भी यही हुआ था ।

२.

किन्तु, भीतर जो युरेनियम रोड्स हैं - वे अपने आप में अत्यधिक गर्म हैं । इन्हें लगातार सर्कुलेट होते पानी से ठंडा रखना आवश्यक है । इसके लिए पानी के पम्प लगातार काम करते रहने चाहिए ।

३.

यदि पानी सर्कुलेट न हो, या पम्प काम न करें, तो कोर के भीतर का हेवी वाटर उबलने लगेगा और पानी कम होता जाएगा, स्टीम प्रेशर बढ़ता जाएगा । इस पानी की भाप से टावर में विस्फोट हो सकता है (आणविक नहीं – भाप के प्रेशर का विस्फोट ) । इसलिए ये पम्प न सिर्फ बिजली के में सप्लाई से जुड़े होते हैं, बल्कि इनका अपना एक जनरेटर भी होता है । यदि मुख्य बिजली बंद हो भी जाए – तो भी इस जनरेटर की बिजली से यह पानी के पम्प काम करते हैं और कोर में पानी का बहाव होता रहता है ।

४. 

इस तरह पानी कम होने से युरेनियम रोड हवा से एक्सपोज़ होंगी, और ठंडी नहीं हो पाएंगी । अब अपनी ही गर्मी से यह पिघलने लगेंगी । गर्मी अत्यधिक बढ़ जाए तो ये पिघल कर कोर वेसेल को भी पिघला सकती है, और पिघली हुई धातु एक दूसरे के साथ बह आने से फिर से क्रिटिकल मास तक पहुँच कर फिर से विखंडन शुरू हो सकता है ।

{ fukushima japan (फुकुशीमा जापान ) में एक तो भूकंप और दूसरे सुनामी के चलते यही हुआ कि दोनों ही supply बंद हो गयीं और pump ने काम करना बंद कर दिया था । वहां के कई वर्कर्स ने अपनी जान की परवाह न करते हुए (रेडिओ एक्टिव एक्सपोज़र ) वहां से बाहर आने से इंकार कर दिया था और भीतर ही रह कर अपनी क़ुरबानी दे कर प्रयास किये कि डिजास्टर को ताला जाए । बाद में समुद्र में जहाजो से समुद्र का पानी pump कर के कोर को ठंडा किया गया । }

५. 

यदि इस गर्मी से वेसेल भी पिघल जाए - तो भीतर का रेडिओ एक्टिव पिघला पदार्थ बाहरी पर्यावरण तक पहुँच जाएगा और पर्यावरण में रेडिओ एक्टिव प्रदूषण बुरी तरह से फ़ैल जाएगा । इसे ही nuclear meltdown कहते हैं ।

जापान का भूकंप -२ :सुनामी की प्रक्रिया , संतोरिणी द्वीप के ज्वालामुखी

जापान में आये भयंकर भूकंप और सुनामी के प्रकोप को एक साल बीत चुका है । इस के सन्दर्भ में मैंने यह श्रंखला शुरू की है जिसमे पिछले भाग में हमने देखा की भूकंप कैसे आते हैं  । “टेक्टोनिक” प्लेटें एक दूसरे से जुडी होती हैं , और इस जोड़ पर काफी लम्बे अरसे तक अलग दिशा में/ अलग गति से  हिलने के प्रयास करती रहती हैं । किन्तु अत्यंत शक्तिशाली और महाविशालकाय पत्थरों पर अत्यधिक भार है ।(सातों महाद्वीपों और महासागरों के समुद्रतल इन्ही टेक्टोनिक प्लेटों पर “रखे” हुए है, उन सब का भार इन्ही प्लेटों पर टिका है) । इस अत्यधिक भार के कारण फ्रिक्शन बहुत अधिक है । फ्रिक्शन के कारण हिल पाने में असफल होती प्लेटों पर समयावधि में दबाव इतने अधिक बढ़ जाते हैं कि इस फौल्ट लाइन पर जहां भी पत्थर कुछ कमज़ोर पड़ जाएँ , वहां अचानक टूट जटी हैं, और प्लेटें या तो सरक जाती हैं , या एक दुसरे के ऊपर या नीचे खिसक जाती हैं । इसी से भूकंप आते हैं ।

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इस भाग में हम सुनामी के आने की प्रक्रिया , और संतोरिणी द्वीप के भयंकर ज्वालामुखी को जानने का प्रयास करते हैं । माना जाता है कि यहाँ आया भयंकर विस्फोट तब की Atlantis सभ्यता का विनाशक साबित हुआ था । यहाँ आज भी डर है कि किसी दिन बड़ा भूकंप / ज्वालामुखी विस्फोट हुआ , तो यहाँ से उठी सुनामियां अमेरिका के तटीय शहरों का विनाश कर देंगी । लाखों की संख्या में लोग मारे जायेंगे, क्योंकि ये सुनामी की लहरें ध्वनी तरंगों से बहुत तेज़ गति से सिर्फ छः घंटे में ही अमेरिका पहुँच जायेंगी, इसलिए तटीय क्षेत्रों को खाली करने का समय नहीं होगा  ।

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सुनामी (१)सागर तल में आये भूकंप से, (२)या ज्वालामुखी विस्फोट से, (३)या समुद्र के नीचे हुए अत्यधिक शक्तिशाली परमाणु विस्फोट से , (४)या समुद्र में किसी उल्कापिंड के गिरने से, (५)या फिर या समुद्र के किसी तट पर हुए भूस्खलन से (जिससे भूमि का एक बड़ा हिस्सा समुद्र में गिर गया हो ) शुरू हो सकती है । अधिकतर ये भूकंप से शुरू होती हैं, जैसा कि पिछले साल जापान में हुआ था ।

जब भूकंप का फोकस भूभाग के नीचे हो, तो ऊपर के भूतल पर भूचाल आता है, और वहां के भवन आदि गिर जाते हैं । लेकिन यह फोकस यदि समुद्रतल के नीचे हो, तब उसके ऊपर कोई भवन तो होते नहीं, परन्तु पानी की बहुत बड़ी मात्रा कम्पित हो जाती है ( सिर्फ सागर की उस जगह की गहराई जितना ही आयतन नहीं, बल्कि जितना शक्तिशाली भूकंपन हुआ हो, उतने ही फैले हुए क्षेत्र के जल भाग का सागर तल हिल उठता है , और उसके ऊपर का पानी भी ) । इसके अलावा, समुद्र तल में टनों पानी से दबे हुए sedimentary rocks अत्यधिक दबाव से कभी कभी अचानक ही बदल कर metamorphic में बदलते हैं, जिनका आयतन पहले से बहुत ही कम होता है  ।अचानक आयी इस परिमाण के कमी के कारण भी सागर तल में भूचाल आ सकते हैं ।

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अब सोचिये - जैसे हम पानी में कंकर / या बड़े पत्थर फेंकते हैं, तो वहां से उठती तरंगे गोलाकार में सब दिशाओं को बढती हैं । जितना बड़ा पत्थर - उतनी शक्ति शाली तरंगे, क्योंकि पानी की इलास्टिसिटी हलके पत्थर की छोटी सी ऊर्जा को जल्द ही सोख लेती है । ठीक इसी तरह की तरंगे भूकंप से भी उठती हैं, किन्तु फर्क यह है कि ये तरंगे ऊपर से कंकर गिरने से नहीं , बल्कि नीचे से तले के हिलने से आई हैं, तो इन की शक्ति एक छोटे कंकर के गिरने से बहुत अधिक है । (चित्र विकिपीडिया से साभार )

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सागर तल की टेक्टोनिक प्लेट -१
नीचे पत्थर टूटने से जल का कम्पन, लहर की शुरुआत
लहरों का दोनों ओर बढ़ना

अब ये तरंगे सब दिशाओं में गोल आकर में बढती हैं, जैसे किसी झील में फिंके पत्थर से झील की सतह पर उठी  लहरें हों । लेकिन ये लहरें सिर्फ सतही नहीं हैं, बल्कि पानी का पूरा गहरा कॉलम (स्तम्भ) ही कम्पित है । (एक ऊपर तक भरी बाल्टी को तले से हिला कर देखिये, और दूसरी वैसे ही बाल्टी में ऊपर से कंकर फेंक कर देखिये – किस में से ज्यादा पानी गिरता है ?) ये उठती हुई लहरें कहाँ जायेंगी ? जाहिर है सागर के किनारों की ओर । और कितनी शक्ति के साथ किनारे को चोट पहुंचाएंगी ? जितना वह क्षेत्र भूकंपन के फोकस के नज़दीक होगा ।

ये लहरें गहरे समुद्र में बहुत ऊंची नहीं होतीं , बल्कि इनकी ऊंचाई इतनी कम होती है , कि [आपको आश्चर्य होगा,] एक छोटी सी नाव भी इनके ऊपर आसानी से ride कर सकेगी । उस नाव का कुछ नहीं बिगड़ेगा । लेकिन जैसे जैसे ये किनारे के उथले पानी की ओर आती हैं, तो इतनी बड़ी गहराई की पानी की अत्याधिक मात्रा की जितनी ऊर्जा है, वह अब कम गहरे में कम मात्रा को धकेल रही है । किनारे तक आते हुए तरंग दैर्ध्य (wavelength ) कम होती जाती है और ऊंचाई (amplitude ) बढ़ता है) तो किनारे के उथले पानी पर इनकी उग्रता बहुत बढ़ जाती है, और एक tide (ज्वार भाटा ) की तरह पानी ऊंचा हो जाता है , और ये ऊंची लहरें भूभाग में बहुत भीतर तक , बड़ी ऊंची होकर, और बड़े वेग से घुस आती हैं । इसीलिए इन्हें tsunami या tidal waves भी कहा जाता है ।

एक बड़ी परेशानी यह है की लहर के बढ़ने के सिद्धांत के अनुसार, तट पर पहले लहर का निचला भाग पहुँचता है । इसे “drawback ” कहते हैं – पानी जैसे तट से दूर खिंच जाता है, और तल काफी दूर तक दिखने लगता है । जो लोग यह नहीं जानते की यह क्यों हुआ, वे कौतूहल के कारण वहीँ खड़े रहते हैं, और जब पीछे से ऊंची लहर आती है, तब किसी को भागने का स्थान / समय नहीं मिलता । सुनामी की मार दोहरी होती है – एक तो इतने वेग से पानी की जो लहर अति है उसकी मार, ऊपर से यह ऊंचा पानी शहरों के शहर काफी समय के लिए डुबा देता है । यह चित्र देखिये (विकिपीडिया से साभार) ।

यूरोप और अफ्रीका के बीच के सागर में “santorini ” नाम की जगह है (ग्रीस में )। यह जगह न ही सिर्फ fault line पर है , बल्कि यहाँ सक्रिय शक्तिशाली ज्वालामुखी भी हैं । सदियों पहले यहाँ हुए ज्वालामुखी विस्फोटों के तब की सभ्यता को अचानक समाप्त कर देने का जिम्मेदार भी माना जाता है । कई लोग इसे “Atlantis ” की सभ्यता का विनाशक मानते हैं, की इस महान ज्वालामुखी के विस्फोट से पहाड़ जो ऊपर उठा हुआ था, वह धंस गया, और उस खाली caldera में समुद्र का पानी भर गया । ये जो द्वीप के भीतर घुसा हुआ पानी दिख रहा है – यह ज्वालामुखी का भीतरी भाग है – जिसे caldera कहते हैं । अलग अलग गहराई पर अलग अलग तरह के पत्थर हैं (लावा से बने igneous पत्थर) । माना जाता है की इस land failure और समुद्र में इतनी अधिक मात्रा में भूमि के गिरने से उठी भयंकर सुनामी ने ही atlantis सभ्यता को नष्ट किया । [परन्तु वैज्ञानिकों का मानना है के यह दोनों तारीखें आपस में मेल नहीं खातीं !] यह तस्वीर (विकिपीडिया से साभार) देखिये इस द्वीप की -

यह माना जाता है, कि यह एक oval द्वीप था, जो आज से करीब ३६०० साल पहले आये (धरती के इतिहास के  भयानकतम) ज्वालामुखी विस्फोट से ऐसा हो गया जैसा इस तस्वीर में दिखता है । लिन्क   ३  ४ देखिये

यहाँ कई ज्वालामुखी आज भी सक्रिय हैं, ऊपर से यह एक टेक्टोनिक फॉल्ट लाइन पर भी है । [ हर वह जगह जहां ज्वालामुखी आयें, आवश्यक नहीं की वह भूकंप का केंद्र भी हो ही ]। किन्तु दुर्भाग्य से यह द्वीप ऐसी जगह है कि दोनों ही प्राकृतिक आपदाएं इसके लिए अनपेक्षित नहीं हैं । अभी भी यहाँ इस तरह के घटनाएं चल ही रही हैं – २६ जनवरी को यहाँ ५.३ स्केल का भूकंप आया । यह लिंक देखिये  । ऊपर से बड़ी परेशानी यह है, कि यदि कोई बड़ा हादसा हो, तो चट्टान का एक बड़ा भाग भूस्खलन हो कर सागर में गिर जाएगा । इस इतनी बड़ी चट्टान के समुद्र में गिरने से जो लहरें उठेंगी, उनकी शुरूआती peak to peak ऊंचाई होगी २ किलोमीटर !!!! ये लहरें १००० किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से दौड़ेंगी और एक घंटे में अफ्रीका, साढ़े तीन घंटे में इंग्लैंड, और छः घंटे में अमेरिका के पूर्वी तट पर पहुंचेंगी । तब तक ये “छोटी” हो कर करीब ६० मीटर की हो गयी होंगी । (एक एक-मंजिले घर की ऊंचाई करीब ६ मीटर होती है – तो सोचिये – ६० मीटर ऊंची सुनामी !!!) ये बोस्टन आदि शहरों को तबाह कर सकती हैं । यह लिंक देखिये । माना जाता है की ये करीब २५ किलोमीटर तक भूभाग के भीतर घुस सकती हैं । ऐसा डर है कि अमेरिका के बोस्टन आदि (पूर्वी तटीय) शहरों में शायद करोडो लोग इस त्रासदी में हताहत हो जाएँ,  ।

जहां अमेरिकिय महाद्वीप का पूर्वी तट इस santorini से कारण सुनामी के खतरे को देखता है, वहीँ दूसरी तरह पश्चिमी तट जापान के साथ दूसरी फौल्ट लाइन पर है, तो सुनामी का खतरा वहां भी बना रहता है ।

अगले भाग में हम ज्वालामुखियों पर बात करेंगे ।

जापान का भूकंप – १ : भूकंप आने की प्रक्रिया

जापान के भयंकर भूकंप को एक साल पूरा हो रहा है । यह दुनिया में अब तक का सबसे शक्तिशाली भूकंप के रूप में दर्ज है, जबसे हम भूकम्पों की तीव्रता का आकलन कर के उसे दर्ज करने लगे हैं । न सिर्फ भूकंप, किन्तु उसके कारण आई सुनामी ने जापान को बुरी तरह से प्रभावित किया , और फिर न्यूक्लियर पावर रिएक्टर में भी कण्ट्रोल फेल हुए – जिससे स्थिति और भी बिगड़ गयी । भूकंप आते क्यों हैं ? इनके पीछे कौन से प्राकृतिक तंत्र काम करते हैं ? सुनामी कैसे आती है ? “न्यूक्लियर मेल्ट डाउन ” क्या होता है ? इन सब पर एक नज़र डालते हैं ।

सबसे पहले ( इस भाग में ) भूकंप आने की प्रक्रिया देखते हैं ।

हम सब जानते हैं  कि धरती के भीतर इतनी गर्मी है की वहां कुछ भी ठोस नहीं है । पिघला हुआ शैल्भूत (magma ) हमेशा उबलता रहता है । विज्ञान की theories के अनुसार माना जाता है  कि पहले धरती शायद सूर्य से फिंका हुआ एक जलता पुंज थी जो किसी तरह एक कक्षा में स्थापित हो कर सूर्य की परिक्रमा करने लगी और करोड़ों वर्षो तक घूमते हुए ठंडी होती होती तरल रूप में आई । {आप जानते होंगे कि satellites कैसे भेजे जाते हैं – कि पहले rocket  धरती से “फेंका” जाता है । उसकी शुरूआती गति के अनुसार वह उतने radius (त्रिज्या) की कक्षा में स्थापित हो जाताहै । }फिर जिस तरह उबले दूध पर ऊपरी सतह पर ठंडी होने से मलाई पड़ने लगती है, उसी तरह इस पिघले शैल्भूत पर भी ऊपर “मलाई” सी पड़ने लगी, अर्थात ऊपर की सतह ठोस होने लगी । परन्तु यदि आपने कभी दूध उबाला है, तो आप जानते होंगे कि यह मलाई एक अभंग इकाई (unbroken entity ) नहीं होती, बल्कि अलग अलग मलाई के भाग होते हैं, जिनके बीच में दरारें होती हैं । ( नहीं देखा, तो आज देखिएगा – चाय या दूध उबलने के बाद उसे दो मिनट ठंडा होने दीजियेगा, फिर ध्यान से मलाई को देखिएगा ।)

यह धरती के शैल्भूत की ऊपरी पथरीली सतह धीरे धीरे मोटी होती गयी । हमारी धरती की ४ मुख्य परतें हैं – inner core , outer core , mantle and crust । यह चित्र देखिये ।

layers of earth (courtesy :

धरती का जो crust  है, यह एक पतली खाल की तरह है, जो mantle का ऊपरी हिस्सा है । यह (दूध की मलाई ही की तरह) एक नहीं है, बल्कि अलग अलग टुकड़े हैं – जिन्हें tectonic plates कहते हैं । ये टेक्टोनिक प्लेट्स पिघले हुए magma के ऊपर तैरती हैं । (यदि आप यह सोच रहे हों कि ठोस तरल से भारी होता है तो इन्हें भीतर होना चाहिए – तो याद करें – आपकी car के tyres में high pressure air है, जो कार से “हलकी” होती है – परन्तु अत्यधिक दबाव की वजह से हवा भरे टायर्स कार का भार उठा सकते हैं । इसी तरह धरती के भीतर का पिघला भाग अत्यधिक दबाव वाला है, क्योंकि magma उबल रहा है लगातार । इससे धुआं और भाप (सिर्फ पानी ही की नहीं, बल्कि उबलते हुए कई पदार्थ जिनमे लोहा और कई दूसरे खनिज भी हैं, इन सभी के उबलने से बनता धुआं और भाप अत्यधिक दबाव लिए है ) बनती रहती है और उठने की कोशिश करती रहती है । लेकिन ऊपर जो ठोस परत बन चुकी है – यह उसे बाहर जाने का रास्ता नहीं देती । जब कहीं कोई कमज़ोर स्थान अपनी सहने की सीमा (breaking limit ) तक जा कर टूट जाता है – तो वहां से यह धुआं / भाप / पिघले पत्थर आदि बाहर फूट निकलते हैं – जिसे हम ज्वालामुखी का फूटना कहते हैं । यह magma ठंडा नहीं हो पाता क्योंकि ऊपर की पथरीली ठोस परत ताप (heat ) का bad conductor है । यह भी ध्यान देना होगा कि धरती यदि सच ही में सूर्य से फिंक गया कोई पुंज थी, तब तो भीतर कई तरह के विस्फोट शायद अब भी होते हों ? वैज्ञानिक भी ठीक से नहीं जानते कि भीतर क्या है, क्योंकि भीतर कोई जा तो पाया नहीं है, न ही उपकरण उस पत्थरों को पिघला देने वाली गर्मी में उतारे जा सकते हैं ) इन टेक्टोनिक प्लेट्स के ऊपर ही सारे समुद्रों के तल (sea beds ) और महाद्वीपों (continents ) के भूतल हैं । ये टेक्टोनिक प्लेट्स कुल सात हैं, और जिन दरारों पर ये आपस में जुडी हैं, उन्हें “line of fault ” कहा जाता है । ये प्लेट्स कितनी बड़ी और कितनी भारी होंगी, आप अंदाजा कर सकते हैं, क्योंकि ये सारी धरती के surface area के base हैं, और इनके ऊपर ही सारे महादीप और सारे समुद्र स्थापित हैं । भौतिकी (physics ) के अनुसार friction रगड़ खाते हुई सतहों के बीच relative movement (चाल, गमनागमन ) का विरोध करने वाली शक्ति / force होती है । और यह friction उतना अधिक होता है , जितना द्रव्यमान (mass ) अधिक हो । तो इन टेक्टोनिक प्लेट्स के बीच आपस में बहुत अधिक friction है । 

जब धरती घूमती है (- अपनी धुरी पर भी और सूर्य के आस पास भी -) तो ये प्लेट्स भी घूमते हैं ( ज़रा दूध की भगोनी को संडसी से पकड़ कर घुमाइए ) इन प्लेट्स के घूमने से इनमे relative  motion का भी सतत प्रयास होता रहता है, क्योंकि अलग अलग भार और अलग अलग composition ( संयोजन या बनावट ) होने से इन पर अलग अलग magnetic और gravitational pulls काम करते हैं । अर्थात ये प्लेट्स एक दूसरे के साथ स्थिर नहीं रहना चाहतीं, बल्कि कोई प्लेट तेजी से आगे जाना चाहती है जबकि दूसरी प्लेट कुछ कम तेजी से । तो इनमे आपस में स्थिरता नहीं होनी चाहिए, एक प्लेट आगे बढ़नी चाहिए, जबकि दूसरी पीछे छूटनी चाहिए । परन्तु अत्यधिक friction के कारण ऐसा हो नहीं पाता । ये प्लेट्स आगे पीछे होना तो चाहती हैं, परन्तु हो नहीं पातीं । साल दर साल दर साल दर साल इनके बीच में pressure (दबाव) बढ़ता जाता है, बढ़ता जाता है । फिर एक स्थिति आती है जब , जहां इन प्लेट्स के बीच के जोड़ पर थोड़ी कमजोरी हो (line of fault ) वहां की दरार के बराबर बराबर के पत्थर (छोटे मोटे नहीं – बड़े ही विराट पत्थर) टूट जाते हैं – और ये टूटने से ये परतें अचानक सरक जाती हैं / एक परत दूसरी के ऊपर चढ़ जाती है / एक परत दूसरी के नीचे घुस जाती है । यह तस्वीर देखिये :

जहां पत्थर टूटे वह “focus ” होता है, और उसके ठीक ऊपर की धरती की सतह को “epicentre “कहते हैं । जितने force से यह movement हुई, उसका माप रिचर स्केल (ritcher scale ) पर नापा जाता है (अब यह बदल रहा है ) इस अचानक हुई चाल के कारण धरती काँप जाती है और भूकंप आता है ।

एक और बात – स्केल के बारे में । आप सोचते होंगे शायद कि “magnitude 4 ” (माप ४ ) का भूकंप बड़ा ही साधारण माना जाता है , लोगों को पता तक नहीं चलता कई बार , जबकि ७ का भयंकर – ऐसा क्यों ? तो इसका उत्तर यह है कि ritcher scale  एक logarithmic scale है, अर्थ १ = १०^१, २-१०^२ . इसी अनुपात में मान ७ का एक भूकंप है १०^७ और मानक ९ का अर्थ है १०^९ । इसका एक अंदाज़न अर्थ यह हुआ कि यह २०११ का जापान का ९ मानक वाला भूकंप लातूर के १९९३ के ६.४ मानक वाले भूकंप से करीब करीब ७०० गुना ज्यादा शक्तिशाली था !!!

अगले भाग में सुनामी की प्रक्रिया पर बात करेंगे ।

References :


पूर्वाग्रह ३ : सीखना

इस शृंखला के पुराने भाग  देखें  :-

आज के भाग के लिए इस नीले भाग से आगे पढ़ें । यह नीला भाग background information  और पुनरावृत्ति है – जो आगे की प्रक्रिया समझने में सहायक होगी ।

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पिछले दो भागों में हमने पढ़ा कि:


भाग १ -  पूर्वाग्रह का अर्थ है किसी वस्तु / व्यक्ति को देखने या जानने से पूर्व ही उसके बारे में एक धारणा बना लेना । यह पूर्वाग्रह भाषा ज्ञान से भी आता है, हमारे निजी अनुभव से भी बनता है । पूर्वाग्रह के बारे में अक्सर हमारे मन में एक पूर्वाग्रह है कि यह कोई “निंदनीय” चीज़ है, पूर्वाग्रह रखना कोई बुरी बात है । किन्तु यहाँ – इस शृंखला में मैं यह चाहूंगी कि आप इसके प्रति यह पूर्वाग्रह न रखें । यह हमारे पहचान और निर्णय की प्रक्रिया का एक भाग है । हमारे nervous system से ही प्रेरणा लेकर आजकल artificial intellegence के लिए सिस्टम्स बनाये जा रहे हैं – जो artificial neurons का उपयोग करते हैं । इन artificial electronic neurons को भी inputs और पूर्वाग्रह का उपयोग उसी प्रकार करना होता है जैसे हमारे मस्तिष्क की प्रक्रियाओं में होता है । मैंने दो तीन उदाहरण लिए पूर्वाग्रह के – जैसे, ….आम = मीठा पीला फल, …..हिंदी फिल्मों में ” माँ ” , …. सूर्य, ….चोट, ….दोस्त अदि ।


भाग २ - पूर्वाग्रह का पहचान और निर्णय की प्रक्रिया में क्या योगदान है । जैसे – यदि मैं मई के महीने में फल के बाज़ार में गयी और मुझे दूर से पीले फलों का ठेला दिखा – तो मैंने मान लिया कि यह आम हैं । यह तो पास जा कर ही जान पाऊंगी कि हैं , या नहीं हैं । तो मुझे एक तो यह पहचान करनी है कि यह फल आम है या नहीं, और दूसरा यह image मेरे मन में बने कि यह फल मुझे ख़ुशी की अनुभूति देगा (यदि मुझे आम पसंद हैं तो ) या नहीं (नापसंद हैं तो ) । निर्णय के दो आधार हैं – अभी क्या इनपुट आया और पहले से उस चीज़ के बारे में मेरा अनुभव कैसा रहा । neuron कैसे decide करे ? 

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यह दो चित्र आगे के लेख को समझने में सहायक होंगे – इन्हें याद रखने की आवश्यकता नहीं है – सिर्फ रेफेर करने में काम आयेंगे ।


हमारे शरीर के neuron  का एक उदाहरण यह है ।

natural neuron 


यह जो दोनों और, ऊपर और नीचे टहनियां और जडें सी दीखती हैं – ये हजारों की संख्या में हैं । ये neurons को एक दूसरे से जोडती हैं, और उनमे आपस में संकेत भेजने का भी काम करती हैं । जब दो neuron आपस में “बात” करते हैं – तो उनके बीच का सम्बन्ध और सुदृढ़ हो जाता है , और जो बारम्बार बात करते हैं, उनके सम्बन्ध उतने अधिक प्रगाढ़ होते चले जाते हैं । इसके विरुद्ध, जो connection use  नहीं होता, वह कमज़ोर होता जाता है । हर एक neuron दुसरे हज़ारों neurons से इनपुट भी लेता है, और हजारों को output भी देता है । ( आपको शायद आश्चर्य होगा – किन्तु आज इलेक्ट्रोनिक / इंस्ट्रुमेंटेशन इंजिनियर / डॉक्टर हमारी जीभ के neurons – जो हम स्वाद के अनुभव के लिए use करते हैं – उन्हें नेत्रहीन लोगों के देखने के लिए प्रयुक्त करने का प्रयास कर रहे हैं – और कुछ हलकी सफलताएं मिलने भी लगी हैं ।


 

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artificial neuron कुछ ऐसा होता है – (यह natural वाले से बहुत ही कमतर है – किन्तु basic working को copy करता है ।)

Artificial  Neuron 


१.ये जो inputs दीख रहे हैं – ये असल inputs हैं । 

२.इस एक नयूरोन का सिर्फ एक ही output है ।

३.हर इनपुट को कितना महत्व (वजन, weight ) दिया जाएगा – नयूरोन हर उदाहरण से सीखता है ।

४.यह सीखना अब तक के अनुभव की आधार पर होता है – यह वजन अनुभव के साथ बदलता है ।

५.जो इनपुट इस neuron के output के साथ में सकारात्मक रूप से काम करें – उन inputs का इस neuron में + महत्व बढ़ता जाता है, (+१ तक) , और जो इस output के साथ न हों / विरुद्ध हों, उनका घटता जाता है या – में बढ़ता है ( – १ तक)।

६.ये सारी चीज़ें (असर) जोड़ी जाती हैं ।

७.activation function का काम है इस जोड़ को (जो एक से अधिक हो सकता है – +-१ तक लिमिट करना। (अर्थात हाँ या ना में उत्तर बनाना )


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अब चलते हैं सीखने की प्रक्रिया की ओर – कि हर प्रविष्टि का वजन कैसे निर्धारित होता है और हर बार bias के वजन पर क्या असर होता है |

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एक रोज़मर्रा का उदहारण लेते हैं : सोचिये की यह न्यूरोन एक नन्हा १० ११ माह का बच्चा है जो घुटने चलता है । उसे कई तरह के अनुभव होते हैं – और अलग अलग स्थितयों के अनुसार सोचिये की उसे “हाँ” या “न” में चुनाव करना सीखना है ।

 

 

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इनमे से हर एक इनपुट को एक के बाद एक लेते और समझते हैं । हम में से अधिकतर लोगों को ये experience हुए ही हैं – तो समझना आसान होगा

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१.

किचन में गर्म कुकर है – जिसे छूने बच्चे बार बार आगे जाते हैं । माँ मना करती है - बेटा मत छू – हाथ जलेगा। माँ सामने हो तो बच्चे अक्सर मान भी जाते हैं, परन्तु उनमे वह उत्सुकता बनी रहती है – कि छूना है । फिर किसी दिन माँ की नज़र न हो – तो छूते ही हैं – और हाथ में जलन के दर्द का अनुभव उन्हें तुरंत हाथ खींचने पर मजबूर करता है – रोने पर भी । कुछ देर बाद – हाथ धुलने से / दवा देने से राहत हो जाती है । कुछ दिन बच्चे को वह दर्द याद रहता है – और वह कुकर नहीं छूता । फिर यह repeat होता है – शायद अबकी बार किसी गर्म कढाई / गर्म दूध की भगोनी आदि के साथ । तो अनुभव पक्का होता जाता है, याददाश्त प्रगाढ़ होती जाती है ।

 

अब बच्चे ने दो तरह की बात सीखी -

         (क) एक यह की किचन में गर्म चीज़ें जो प्लेटफोर्म पर / चूल्हे पर रखी हैं – उन्हें छूना दर्द देता है – तो उन्हें  नहीं छूना है । तो उस input के लिए वजन negative बन गया ।

         (ख) माँ जो कह रही थी – वह मेरे लिए सही था – तो माँ की बात मानने में भलाई है - नकारात्मकता (माँ ने मना किया था ) और नकारात्मकता (दर्द हुआ ) के गुणा होने से सकारात्मक परिणाम  (bias या माँ की बात का वजन बढ़ गया)

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(२)

दूसरा इनपुट एक बजता हुआ खिलौना है – माँ बच्चे को हंस हंस कर उससे खेलने को दे रही है । बच्चा उसे लेता है – खेलता है – और एन्जॉय करता है – फिर से दो बातें हिया हैं ।

       (क) खिलौने (input ) का वजन positive हो गया ।

       (ख) माँ की बात (bias ) का वजन भी बढ़ा – इस बार सकारात्मक (माँ ने खेलने दिया था) और सकारात्मक (मजा आया खेलने में )  के गुणा होने से + result आया है ।

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(३)

पिता की थाली में चटनी / अचार है – जबकि बच्चे को सिर्फ मीठी / फीकी /  हलकी नमकीन चीज़ें ही मिली हैं । बच्चे के ललचाने पर माँ कहती है – थोडा बड़ा हो जा – फिर मिलेगा । अभी मुह जलेगा । परन्तु बच्चा जिद करता है । फिर थोडा सा अचार चटाना ही पड़ा माता पिता को । उसे मिर्च लगी । अगली बार वह नहीं खाना चाहेगा (कुछ दिन तक ) । फिर से दो बातें हुईं

         (क) तीखा अचार मुंह में जलन देता है – तो नहीं खाना है – neagtive वजन ।

         (ख) माँ की बात मान लेता तो तकलीफ न होती – bias का वजन फिर बढ़ा ।

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अब – इनमे से हर एक इनपुट – हर experience (अनुभव ) के बाद अपने ही वजन को प्रभावित कर रहा है – उसे + या – दिशा में बढ़ा रहा है । किस दिशा में – यह इस पर निर्भर है की अनुभव सुखदायी था या दुखदायी ।

 

इसके अलावा – इनमे से हर एक इनपुट के लिए माँ (bias ) ने जो कहा – यदि अनुभव उसके अनुरूप रहा – तो  bias का वजन बढ़ता चला जायेगा । यदि माँ ने न कहा था – और अनुभव कटु हुआ – तो बच्चा सीखेगा की माँ की बात न मानने में मेरा नुकसान है (नकरात्मक और नकरात्मक = सकारात्मक )। इसके ठीक उलट – यदि माँ ने हाँ कहा था और अनुभव मीठा रहा – तो बच्चे यह सीखते हैं की अरे वाह – माँ की बात मानने में बड़ा फायदा है (सकारात्मक और सकारात्मक = सकारात्मक )। इन दोनों ही रूप में bias का वजन + की दिशा में बढ़ता है ।

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इस सीखे हुए अनुभव का उपयोग कैसे होगा? एक समय में अक्सर एक ही इनपुट होगा, या तो गर्म कुकर है, या फिर बजने वाला बाजा । तो एक input =+१ है, बाकी के इनपुट शून्य हैं । तो जोड़ जो बनेगा – वह उस एक ही इनपुट के असर से बनेगा । और उसी के हिसाब से परिणाम या तो +१ आएगा (अर्थात हाँ ) या फिर -१ आएगा (अर्थात ना )।

 

अगले भाग में हम यह देखने का प्रयास करेंगे की यह bias या इनपुट के वजन जो हमने इंसानी दिमाग में देखे समझे – ये artificial neuron में कैसे घटाए और बढाए जाते हैं ।

 

जारी ……..

पूर्वाग्रह २ : पहचान और निर्णय

पूर्वाग्रह भाग  देखें 


पिछले भाग में मैंने (लेख और टिप्पणियों के discussion में) कहने की कोशिश की – कि 


१. शब्द जो छवि बनाते हैं हमारे मन मस्तिष्क में – उसमे से कुछ भाषाज्ञान है, और कुछ पूर्वाग्रह | 


२, आम – फल है | किन्तु – कैसा है ? यह हर वह व्यक्ति बता सकता है – जिसने आम खाया है (समझाना तो मेरे बस का नहीं है) यह भाषाज्ञान है |


३.  मैंने यह भी कहा ( पोस्ट में भी और टिप्पणियों में भी ) कि यह पोस्ट मैं सिर्फ हमारी (मनुष्यों की) मानसिक प्रक्रियाओं पर concentrate कर के नहीं लिख रही हूँ, बल्कि ये मानसिक प्रक्रियाएं सिर्फ एक background हैं – आगे मैं natural neurons , artificial neurons और artificial neural networks पर बात करने वाली हूँ | 

अब – आगे ….

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पहली बात तो यह कि आम पीला है – यह हमारी सोच प्रक्रिया में बना हुआ एक पूर्वाग्रह है | कृपया यह न सोचें कि मैं पूर्वाग्रह की निंदा कर रही हूँ – नहीं तो आगे जो बातें होनी हैं – वे इस निंदा की image की ही वजह से निरर्थक हो जायेंगी | इस पोस्ट के सन्दर्भों में पूर्वाग्रह निंदनीय नहीं है - यह अक्सर सहायक है सही पहचान के लिए | यदि यह अड़चन बनने लगता है – तो धीरे धीरे यह ( हमारी मानसिक प्रक्रियाओं के द्वारा ) बदल भी जाता है | हर आम तो पीला नहीं होता ( दसहरी , लंगड़ा हरे आम हैं ) – फिर भी यह बात तो है ही कि आम सुन कर पीला फल ही मन में उभरता है | इससे उलट – यदि गर्मियों के मौसम में दूर से फल का ठेला दिखे – तो यदि उस पर पीले फल दिख रहे हों – तो आम ही लगते हैं |  


यह ऊपर – दो अलग बातें है – 


(अ) आम पीले होते हैं – यह छवि – “cognition ” कहलाती है हमारी इलेक्ट्रोनिक की इमेज प्रोसेसिंग की भाषा में | 


(ब) ठेले पर जब दूर से पीले फल दिख रहे हों – तो वह आम का ठेला है – यह “recognition “ कहलाता है | 


जब cognition होता है – तब हम मशीन को सिखाते हैं कि किस वस्तु (label) के साथ क्या properties associate की जाएँ | इसी तरह – छोटे बच्चे को हम सिखाते हैं – अ- अनार का ; आ – आम का – और उस पुस्तक में अनार और आम की छवि होती है | लेकिन न हम उसे अनार सिखा रहे थे, न आम, हम तो उसे सिखा रहे थे कि यह जो अक्षर लिखा है किताब में – इसे बोला किस तरह से जाता है | इसके उलट – यह जो हम बोल रहे हैं “अ”, “आ” इसे लिखा कैसे जाए |


अब समझें – दो प्रकार के factors हैं, जो हमारे निर्णय को प्रभावित करते हैं (उदाहरण के लिए – यह चीज़ / व्यक्ति मुझे पसंद आएगा / नापसंद / या न्यूट्रल ? ) अब जैसे – किसी को आम पसंद है / किसी को नहीं | तो उसी एक फल को देख कर कोई पहचानेगा की यह आम है, कोई नहीं पहचानेगा | इसके आगे – किसी के मन में पसंद की भावना होगी – किसी के मन में नापसंदगी की | 


अ) एक – तत्काल अभी उस से क्या input आ रहा है ? (जो सामने फल है – यह आम है या नहीं इसे पहचानने के लिए उसका रंग, रूप. आदि )

बी) और दूसरा – लॉन्ग टर्म में मैंने उसके बारे में क्या जाना है | ( मीठा ? खट्टा ? रसीला ? नर्म ? सख्त ? )


तत्काल अभी आए inputs को weigh कर के जो असर होता है – वह एक sum बनाता है | इसमें पहले के अनुभव से आये bias को जोड़ा जात है | तब – इस मिले जोड़ के आधार पर – निश्चय लिया जाता है |


अब आगे बढ़ते हैं – neuron की ओर – कि वह कैसे decision लेता है कि किस वस्तु को किस category में रखा जाए | हमारे शरीर में एक nervous system है , जिसके हिस्से हैं nerves , spinal chord और brain | ये सब नयूरोंस पर बने हैं | ये नन्हे नयूरोंस करोड़ों की संख्या में हैं – और इनकी कई शाखाएं एक दुसरे से जुडी हैं | ये जुडी हुई शाखाएं एक से दुसरे को chemicals के exchange द्वारा सन्देश देती हैं | 


शरीर का एक प्राकृतिक neuron हमारे engineers द्वार बनाए artificial neuron से बहुत अधिक advanced है - किन्तु उसी को समझ कर और उसकी working को कॉपी कर के ही हम artificial neron और neural network बनाते हैं | इन नयूरोंस पर बात होगी अगले अंक में – कि  कैसे बनते और कार्य करते हैं | 


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