Category Archives: ब्रह्माण्ड

matter antimatter4

इस भाग में हम प्रोटोन संख्या, आयसोटोप और आयसोबार पर बात करेंगे | यह पोस्ट यहाँ भी है 

पिछले भागों में हमने देखा कि (आप चाहें तो यह नीले रंग वाला भाग छोड़ कर आगे चले जाएँ और आज के भाग को पढ़ें )
१) हमारे आस पास की हर वस्तु पदार्थ (matter ) से बनी हैं | 
२) इनमे से अधिकतर पदार्थ “मिश्रण” (mixtures ) हैं (जैसे – समुद्र के पानी में पानी और अनेक अम्ल हैं )
३) भौतिक प्रक्रियाओं द्वारा इन मिश्रणों से “सत्व ” (pure substance )  अलग किये जा सकते हैं (जैसे पानी, नमक, शक्कर आदि) |
३) यह सत्व शुद्ध तत्त्व (elements जैसे हायड्रोजन – H ) या उनके रासायनिक जोड़ से बने संयोजन (compounds जैसे पानी – H2O ) हो सकते हैं | 
४) संयोजनों को रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा अपने मूल तत्वों में अलग किया जा सकता है, किन्तु प्राकृतिक रूप में ये अधिकतर संयोजित रूप में ही पाए जाते हैं |
५)मूल तत्वों को परमाणुओं तक और संयोजनों को अणुओं तक विभाजित किया जा सकता है | यहाँ तक उस पदार्थ के सभी गुण नज़र आयेंगे |
६) परमाणुओं को इससे भी आगे प्रोटोंस, न्यूट्रोंस , और इलेक्ट्रोंस में तोडा जा सकता है | किन्तु ये कण अब मूल तत्त्व के गुणों को नहीं दिखायेंगे | एक इलेक्ट्रोन चाहे कार्बन से आया हो, अल्युमिनियम से आया हो या किसी और परमाणु से – उसका उस पर कोई प्रभाव नहीं होगा | यह नहीं पहचाना जा सकेगा कि यह इलेक्ट्रोन किस मूल तत्त्व से आया है | 


पिछले भाग में हमने देखा कि परमाणु की संरचना में इलेक्ट्रोन किस तरह अपनी कक्षाओं में घूमते हैं, किस कक्षा में कितने इलेक्ट्रोन होते हैं, कैसे एक परमाणु दुसरे को इलेक्ट्रोन दे सकता है, या ले सकता है या फिर share कर सकता है – जिसकी वजह से electrovalent या covalent bond बनते हैं और रासायनिक संयोजन बनते हैं | कैसे कुछ पदार्थ संयोजन करते (Na + Cl = NaCl ) या नहीं करते (He ) हैं |

इस भाग में हम प्रोटोन संख्या, आयसोटोप और आयसोबार पर बात करेंगे |


हर एक मूल तत्व के परमाणु में प्रोटोन और इलेक्ट्रोन की संख्या बराबर होती है | ये दोनों उलटे आवेशों वाले है – प्रोटोन + आवेश लिए हैं और इलेक्ट्रोन – आवेश …. तो जब तक दोनों की संख्या बराबर होती है – ये दोनों आवेश एक दूसरे को बैलेंस करते हैं | इसलिए परमाणु न्यूट्रल होता है (अर्थात कोई आवेश नहीं दिखाता ) | किन्तु जो प्रोटोन होते हैं, वे इलेक्ट्रोन  की अपेक्षा हज़ारों गुना अधिक द्रव्यमान लिए होते हैं | तो भारी होने की वजह से ये “आलसी” हैं :) अर्थात ये घूम नहीं रहे, बलिक नाभिक (nucleus ) में बैठे सिर्फ आराम कर रहे हैं :) | और परमाणु को भार दे रहे हैं | इनके साथ ही भारी न्यूट्रोन भी हैं , जिन पर न + आवेश है न ही – आवेश …. ये भी प्रोटोन जितने ही द्रव्यमान वाले हैं … और यह भी नाभिक में बसे हैं , घूम नहीं रहे | इसके विपरीत इलेक्ट्रोन का आवेश – है और साथ ही ये बहुत ही हलके हैं – और ये नाभिक के आस पास अपनी कक्षाओं में घूमते रहते हैं |


यदि इलेक्ट्रोन अपने परमाणु को छोड़ जाए तो + आवेश जीतने लगेगा और + आयन बन जाएगा, इसके विपरीत बाहर से इलेक्ट्रोन आ जुड़े तो – आयन बनेगा | 


नाभिक के भीतर प्रोटोन की संख्या fixed होती है | इसे atomic number (आणविक संख्या कहते हैं ) एक प्रोटोन का वजन और एक न्यूट्रोन का वजन करीब करीब बराबर होता है – और यह होता है करीब 1 U या 1 AMU |


पिछले भाग में दी सारिणी को देखिये | एक हायड्रोजन के परमाणु में एक प्रोटोन होता है (आणविक संख्या = १) तो उसका भार कितना होगा ?


अ) यदि कोई न्यूट्रोन नहीं हो – तो १ amu 
ब) यदि १ न्यूट्रोन हो तो १+१=२ amu 
स) यदि २ न्यूट्रोन हों – तो १+२=३ amu 


अर्थात – प्रोटोन संख्या १ होने से परमाणु होगा तो हायड्रोजन ही का, गुण भी हायड्रोजन के होंगे, किन्तु आणविक संख्या एक होते हुए भी न्यूट्रोन संख्या में फर्क की वजह से आणविक भार अलग अलग हो सकते हैं | ऐसे परमाणु isotopes कहलाते हैं |


इसी तरह से यह भी हो सकता है कि आणविक संख्या अलग हो, किन्तु भार एक ही हो | जैसे 


एक पदार्थ में १० प्रोटोन और ११ न्यूट्रोन हैं – तो उसकी आणविक संख्या है १० और भार है १०+११=२१ | एक और पदार्थ में ११ प्रोटोन और १० न्यूट्रोन हैं – तो उसकी आणविक संख्या है ११ और भार है ११ +१० = २१ | तो दोनों की संख्या अलग है – तो पदार्थ तो अलग हैं, किन्तु आणविक भार एक ही बराबर है | इन्हें isobars कहा जाता है |


जारी …. 

matter antimatter 3

अनुवाद आभार – आदरणीय गिरिजेश राव जी |


[
अब तक हमने देखा --> 
{चाहें तो यह भाग जो नीले रंग में है, इसे छोड़ कर नीचे नए भाग को देखें }
*1* पदार्थ के मिश्रणों को भौतिक प्रक्रियाओं द्वारा पहले तो सत्वों (substances) में अलग अलग किया जा सकता है | [ जो या तो मूल तत्व (ELEMENTS ) या उनके संयोजन / यौगिक (COMPOUNDS )} हो सकते हैं ] 
*2* इसके बाद और फिर रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा मूल तत्त्व अलग किये जा सकते हैं | मूल तत्त्व [elements ] प्रकृति में करीब करीब ११० हैं, जिनके कई तरह के संयोजन और मिश्रणों से बने पदार्थों से वह हर चीज़ बनी हुई है जो हम अपने आस पास देखते हैं | 
*3* [जैसे समुद्र का पानी एक मिश्रण (mixture ) है, जिसमे सत्व (substances ) हैं - शुद्ध पानी, नमक रेत आदि | इन सब को भौतिक प्रक्रियाओं द्वारा  अलग अलग किया जा सकता है  | 
*4* अब जो शुद्ध पानी हमें मिलेगा - वह एक यौगिक संयोजन (compound ) है - जिसमे मूल तत्त्व (elements ) हैं हाईड्रोजन और ओक्सिजन ]
*5* संयोजन अणुओं से बने हुए हैं [compounds are made up of molecules] ….. और तत्त्व परमाणुओं से बने हुएहैं | ( elements are made up of atoms) 

जिस अनुपात (ratio ) में संयोजन अपने घटक (component ) तत्त्वों के जोड़ हैं, ठीक इसी रूप में उन संयोजनों के मूल “अणु” उन्ही परमाणुओं के उस ही अनुपात में जोड़ हैं | उदाहरण के लिए, पानी (water ) एक संयोजन है जिसमे गिनती के अनुपात में देखा जाए तो एक भाग  पानी में दो भाग हाईड्रोजन और एक भाग ओक्सिजन है तो ——- पानी के एक अणु में भी दो हाईड्रोजन के परमाणु और एक ओक्सिजन का परमाणु है | परन्तु इसे भौतिक प्रक्रियाओं द्वारा नहीं तोडा जा सकता, हाँ रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा ज़रूर तोड़ा जा सकता है और हाईड्रोजन और ओक्सिजन को अलग किया जा सकता है | कौनसे परमाणु किस अनुपात में जुड़ेंगे यह उनकी संयोजकता पर निर्भर है, जो हम यहाँ (नीचे) देखेंगे |
]
अब आगे …

यहाँ तक तो हमने यह देखा कि - हर मूल तत्त्व को उसके घटक अणुओं तक  तोडा जा सकता है | इनमे से हर एक अणु में वह सारे गुण देखे जा सकते हैं, जो उस मूल तत्त्व के गुण हैं |  यहाँ इसके बारे में अक्सर लोगो को भ्रान्ति है कि अणु के नीचे हम पदार्थ को तोड़ नहीं सकते | यह गलत जानकारी है | तथ्य यह है कि अणु को तोडा तो जा सकता है, परन्तु अब जो घटक मिलेंगे, वे घटक युनिवर्सल हैं | [ यह कुछ कुछ भारतीय दर्शन में जो कहा गया है कि हर वास्तु पञ्च-महाभूतों से बनी है - वैसा ही है | ] अर्थात, उन घटकों में मूल तत्त्व के गुण नहीं दीखते | ये घटक हैं, इलेक्ट्रोन, प्रोटोन, और न्यूट्रोन | ये घटक चाहे हाइड्रोजन के परमाणु से आये हों या फिर ओक्सिजन से, या अल्युमिनियम से या किसी भी और मूल तत्त्व से – इनके स्त्रोत से इनके गुणों पर कोई फर्क नहीं पड़ता | हर एक मूल तत्त्व से मिला इलेक्ट्रोन एक ही तरह का होगा – इलेक्ट्रोन को पाकर यह बताया नहीं जा सकता कि यह मूलतः किस मूल तत्त्व के परमाणु में था !!!                       

एक अणु के भीतर मुख्य रूप से ३ तरह के कण हैं - इलेक्ट्रोन, प्रोटोन, और न्यूट्रोन – इन्हें एक एक कर समझते हैं – इस पोस्ट में सिर्फ इलेक्ट्रोन पर ही बात हो पाएगी |

१. इलेक्ट्रोन 
 ये कण बहुत ही हलके हैं | जिस तरह सौरमंडल में धरती, मंगल आदि ग्रह सूर्य के आसपास घूमते रहते हैं, उसी तरह ये परमाणु के नाभिक ["न्युक्लिअस"] के आस पास घूमते रहते हैं | इनमे ऋणात्मक आवेश ( निगेटिव चार्ज) है | इलेक्ट्रोन अपने अणु को छोड़ कर दूसरे अणु से भी जुड़ सकते हैं | तो वह जो अणु पहले न्यूट्रल था, अब पोजिटिव आयन (धनात्मक) हो गया, क्योंकि निगेटिव इलेक्ट्रोन उसे छोड़ कर चला गया | इसी प्रकार, जिस अणु में यह इलेक्ट्रोन जुड़ गया है अब , वह भी पहले न्यूट्रल था – लेकिन अब इस इलेक्ट्रोन के आ जाने से यह अब निगेटिव आयन (धनात्मक) हो गया | 

अब यह तो हम जानते ही है कि पोजिटिव और निगेटिव एक दूसरे को अपनी ओर खींचते हैं | तो जो पहले वाला अणु पोजिटिव हो गया है, और दूसरा जो निगेटिव हो गया है – एक दूसरे को खींचने लगते हैं, और इनकी “जोड़ी” बन जाती है | या आसानी से अलग नहीं किये जा सकते हैं अब | इस गठजोड़ को “इलेक्ट्रो वेलेंट बोंड” या विद्युत्-संयोजित बन्ध कहते हैं |

यह इलेक्ट्रोन का देना और लेना हर जगह और मनमाने तरीके से नहीं होता | हर मूल तत्त्व में एक निश्चित मात्रा में इलेक्ट्रोन हैं, जो अपनी अपनी “कक्षा” (orbit ) में नाभिक (nucleus ) के आस पास घूम रहे हैं | पिछले भाग में मैंने जो सारिणी दी थी, उसे फिर से यहाँ दिखा रही हूँ | जो तत्त्व जिस स्थान पर है, उसमे उतने ही इलेक्ट्रोन हैं (और आगे देखेंगे कि उसके नाभिक में उतने ही प्रोटोन भी हैं ) 

अब देखें कि हर कक्षा में कितने इलेक्ट्रोन हो सकते हैं?? पहली – सबसे भीतर वाली कक्षा में अधिकतम दो ,दूसरी में आठ आदि | यह कक्षा संख्या को यदि “n ” माना जाए, तो उसमे अधिकाधिक  इलेक्ट्रोन जा सकेंगे – और जिस मूल तत्त्व में जितने इलेक्ट्रोन होंगे – कक्षा में उस से अधिक ( 2 x n x n ) इलेक्ट्रोन भरे जा सकते हैं | 

कक्षा     इलेक्ट्रोन की अधिकतम संख्या    यहाँ तक योग संख्या 
१             २.१.१ = २                                   २ 
२            २.२.२ = ८                                  २+८=१०   
३            २.३.३ = १८                                १०+१८ = २८ 
आदि   


अब जिस तत्त्व में जितने इलेक्ट्रोन हैं, उस तरह से या तो कक्षा पूरी भरी रह सकती है , या कुछ खाली रह सकती है – और हर परमाणु की कोशिश रहती है कि सबसे बाहर की कक्षा या तो पूरी भरी हो ( H और He के लिए २ इलेक्ट्रोन ) या फिर बाहरी कक्षा में ८ इलेक्ट्रोन हों | इसे पूरा करने के लिए अणु को जो आसान हो – १,२,या ३ इलेक्ट्रोन लिए जा सकते है , या १,२,या ३ इलेक्ट्रोन दिए जा सकते हैं, या ४ इलेक्ट्रोन शेयर किये जा सकते हैं | (उदाहरण के लिए – यदि बाहर ७ इलेक्ट्रोन हों, तो या तो ७ दे दिए जाएँ या फिर १ ले लिया जाए – निश्चित ही एक लेना आसान है ७ देने की अपेक्षा ) ऊपर हमने देखा कि यदि एक ने दूसरे को इलेक्ट्रोन दिए, तो पहला + और दूसरा – बन जाएगा और ये दोनों विद्युत् संयोजी बन्ध द्वारा संयोजित हो जायेंगे | यदि शेयर किये, तो यह बनेगा सह-संयोजित बन्ध | इस बार भी दोनों अणुओं को साथ रहना पड़ेगा क्योंकि अब यह शेयर्ड इलेक्ट्रोन दोनों के नाभिकों का चक्कर लगाने लगे हैं |

तत्त्व    इलेक्ट्रोन   कितनी       इलेक्ट्रोन       बाहरी कक्षा       ८ की गिनती पूरी      संयोजकता 
           संख्या        कक्षाएं?      का वितरण   में इलेक्ट्रोन       करने को कितने       / वेलेंसी 
                                                                                           इलेक्ट्रोन  देने हैं 

H          1                 १                      १              १               १ दे या ले सकता है    +१  या – १ 

He        2                 १                      २              २               पूर्ण है – तो शून्य |     संयोजन 
                                                                                         न देगा ना लेगा |        नहीं करेगा          

Li         3                 २                    २+१           १                     १ देगा                            +१   

Be        4                 २                   २+२            २                   २ देगा                            +२   



B          5                 २                    २+ ३         ३                    ३ देगा                            +३ 



यहाँ तक + संयोजकता हुई, अब सह संयोजकता और अब- संयोजकता
तत्त्व    इलेक्ट्रोन   कितनी       इलेक्ट्रोन       बाहरी कक्षा       ८ की गिनती पूरी      संयोजकता 
           संख्या        कक्षाएं?      का वितरण   में इलेक्ट्रोन       करने को कितने       / वेलेंसी 
                                                                                           इलेक्ट्रोन लेने हैं 

C          6                 २                    २+४          ४                 शेयर करेगा               सह-संयोजन   



N          7                 २                    २+५         ५                  ३ लेगा                             -३  


O          8                 २                    २+६          ६                    २ लेगा                           -२   


F           9                २                    २+७          ७                   १ लेगा                            -१     


Ne       10               २                     २+८          ८               पूर्ण है – तो शून्य |        संयोजन 

                                                                                         न देगा ना लेगा |          नहीं करेगा 

यह चित्र देखें, किस तरह की व्यवस्था बद्ध संरचना होती है |

जिस तत्त्व की संयोजकता + हो, वह – संयोजकता वाले तत्त्व से उस अनुपात में जोड़ कर सकता है जिससे दोनों की संयोजकता संतुष्ट हो | जैसे 

Na {+१} और Cl {-१} का जोड़ है NaCl [खाने का नमक ]

H {+१} और O {-२} का जोड़ है (२H +१ ओ = H2O ) [पीने का पानी ]

अगले अंक में प्रोटोंस, न्युट्रोंस और आइसोटोप्स की बात होगी |
जारी …

Matter and anti matter2

हाँ तो दोस्तों – इस शृंखला के अगले भाग के साथ हाज़िर हूँ | सबसे पहले तो यह कहूँगी कि यह कोई मिथ्या परिकल्पना नहीं है, यह आधारित है ठोस गणित के आधार पर – सिर्फ इतना है – कि हम उस ब्रह्माण्ड तक पहुंचे नहीं हैं{ और यह अच्छा ही है – क्योंकि दोनों ब्रह्मांडों का जोड़ तो विध्वंस ही करेगा :) | } वैज्ञानिक इस संभावना पर काम कर रहे हैं |

(1) अब, यह तो हम सब जानते ही हैं कि इस दुनिया में जिसमे हम रहते हैं – हर चीज़ पदार्थ से बनी है | यह पदार्थ जो हम देखते हैं, छूते हैं, उपयोग में लाते हैं – यह अधिकतर “मिश्रित पदार्थ” ( mixtures ) हैं | इनमे से सत्व (pure substances ) अलग किये जा सकते हैं भौतिक प्रक्रियाओं द्वारा (physical processes) | उदाहरण के लिए – यदि पानी में नमक मिला है (H2O + NaCl) - तो पानी को सुखा कर भाप बनाया जाए एक ट्यूब के द्वारा कही और पहुंचा कर , दूसरी जगह फिर से इस भाप को ठंडा कर के  पानी बना दिया जाए और पीछे रह जाएगा शुद्ध नमक – जो भाप नहीं बनेगा | जब यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती – अर्थात भौतिकी तरकीबें अब काम नहीं करतीं – तो हम “मिश्रित पदार्थ” ( mixtures ) को आपने सत्व (pure substances ) में अलग कर चुके हैं | 

(2) अब यह जो सत्व अलग हुए हैं, इन्हें यह दो तरह के होते हैं - मूल तत्त्व (elements) और उनके संयोजन (compounds) जो मूल तत्त्व हैं – वे तो शुद्ध रूप में हैं, किन्तु जो संयोजन हैं उन्हें अब रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा आपने घटक मूल तत्त्वों में तोडा जा सकता है | उदहारण के लिए – ऊपर के उदहारण में पानी और नमक (जो सत्त्व अलग हुए थे) दोनों ही संयोजन हैं | पानी है H2O जिसके एक कण में मूल तत्त्व हाइड्रोजन के दो कण हैं, और ओक्सिजन का एक कण – तो इन्हें अलग करना भौतिकी प्रक्रियाओं द्वारा संभव नहीं – इन्हें रासायनिक तरीके से ही तोडा जा सकेगा | इसी तरह से NaCl के एक कण में भी , एक कण सोडियम और एक कण क्लोरिन है – जिन्हें अलग किया जा सकता है |

अब जो मूल तत्त्व हैं – उन पर आते हैं | यह सारिणी देखिये :

इस सारिणी में आप देख सकते हैं कि मूल तत्त्व एक निश्चित क्रम में जमे हैं, और यह हम मानवों की बनाई हुई सारिणी नहीं है | प्रकृति में ये मूल तत्त्व एक योजनाबद्ध तरीके से ही मौजूद हैं – हम मनुष्यों ने यह सारिणी सिर्फ उस तरीके को समझ कर, वर्णन करने और अध्ययन करने के लिए बनाई है | {…… पहला मूल तत्त्व हाइड्रोजन है – फिर हीलियम ; फिर अगली पंक्ति में – लिथियम, बेरिलियम, बोरोन, कार्बन, नाइटरोजन,  ओक्सिजन, फ्लुरिन, नियोन ; फिर अगली पंक्ति में सोडियम , मग्निशियम आदि …..} 

(3) यह मूल तत्त्व भी पने कणों में तोड़े जा सकते हैं | एक उदाहरण के लिए – एक ग्राम हाइड्रोजन में अंदाज़न –> 
      ६.०२३ गुणा १००,०००,०००,०००,०००,०००,०००,००० 
     ( = ६.०२३ क्ष १० पॉवर २३ )
     ( = १ अवोगाड्रो नंबर या मोल )

शुद्ध हाइड्रोजन कण हैं – जिनमे से हर एक कण में मूल तत्त्व  हाइड्रोजन के सारे गुण मौजूद हैं – हर एक कण वह सब रासायनिक और भौतिकी गुण रखता है – जो कि इस मूल तत्त्व हाइड्रोजन के हों |

अब इसके आगे इन कणों में क्या है – इसकी चर्चा हम इस सीरीज की अगली पोस्ट में करेंगे | 

matter and antimatter 1

पदार्थ और ऊर्जा - यह दो चीज़ें ब्रह्माण्ड का कच्चा पदार्थ हैं | पदार्थ को आप ऊर्जा का ही संग्रहित रूप कह सकते हैं | आमतौर पर ऊर्जा – ऊर्जा में(energy to energy) ,  और पदार्थ – पदार्थ में (matter to matter), बदलते रहते हैं, किन्तु पदार्थ ऊर्जा में या ऊर्जा पदार्थ में बदले – यह आम स्थितयों में देखने नहीं मिलता |

(1) साधारण रासायनिक प्रतिक्रियाओं(chemical reactions) में पदार्थ के मूलतत्व (elements) नहीं बदलते – सिर्फ उनके संयोजन (compounds) बदलते हैं – जैसे सोडियम हाइड्रोक्साइड (NaOH) और हाइड्रो क्लोरिक एसिड (HCl) मिल कर सोडियम क्लोराइड (NaCl) और पानी (H2O) बन जाते हैं – किन्तु मूल तत्त्व जो पहले थे – सोडियम, क्लोरिन, हाइड्रोजन और ओक्सिजन – वही रहते हैं और उतनी ही मात्रा में रहते हैं | इन रासायनिक क्रियाओं में ऊर्जा निकल भी सकती है, और सोखी भी जा सकती है – लेकिन यह सिर्फ रूपांतरण होता है – ऊर्जा ना बन रही होती है, ना ही नष्ट होती है |

(2) न्यूक्लियर अभिक्रिया (nuclear reaction) की ज़रूरी स्थितियां हों – तो पदार्थ (matter) { जो प्रोटोन , नियुट्रोन  और इलेक्ट्रोन से बना है } एलिमेंटल स्तर पर बदल सकता है - जैसे हाइड्रोजन हीलियम में बदल सकती है | इन दोनों (और बाकी सब ही ) मूल तत्वों में प्रोटोन और इलेक्ट्रोन की गिनती अलग अलग होती है | इस तरह के न्युक्लिकीय अभिक्रियाएँ सितारों में चलती ही रहती हैं | जब यह होता है – तो अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा बनती है [ E = m x 9 x 10,000,000,000,000,000 ] अर्थात एक ग्राम पदार्थ से  इतनी ऊर्जा { जुल्स में } बनती है – लेकिन यह जिन स्थितयों में होता है वे हमारी धरती पर आमतौर पर नहीं पायी जातीं | हाँ – वे स्थितयां बनायी जा सकती हैं | न्यूक्लियर पावर प्लांट्स में और न्यूक्लियर बम में यही किया जाता है | 

(3) और एक तरह के पदार्थ बदलाव होते हैं – [पदार्थ और प्रति पदार्थ {matter and antimatter} ] के आपस में बदलने के – लेकिन यह ब्रह्माण्ड (Universe) की शुरुआत से पहले होता है – ब्रह्माण्ड के जीवनकाल में यह नहीं होता , क्योंकि पदार्थ और प्रति पदार्थ एक साथ नहीं रह सकते | फिर – उस समय की परिस्थितियों के हिसाब से या तो पदार्थ ब्रह्माण्ड बन जाता है, या प्रतिपदार्थ ब्रह्माण्ड | दोनों साथ नहीं रह सकते | 

जब [१] पदार्थ पदार्थ में या [२] पदार्थ प्रति पदार्थ में बदले – तब अत्यधिक ऊर्जा पैदा होती है |  यह ऊर्जा आयोनाइज़्ड और नॉन आयोनाइज़्ड विकिरण (electromagnetic rays, radio active rays) के रूप में फटती है – और फैलती चली जाती है | 

मैंने एक ( तीन भागों में ) सिरीज़ में सितारों की संरचना के बारे में लिखा था - एक सितारे की जीवन यात्रा - जिसमे लिखा था कि सितारे कैसे जन्म लेते हैं, युवा और बूढ़े होते हैं – और फिर नष्ट हो कर ब्रह्माण्ड में रिसाइकल होते रहते हैं | किन स्थितियों में वे ब्लेक होल बनते हैं और कब रेड जायंट वगैरह | लिंक है –  एक सितारे की जीवन यात्रा | अब मैं – पदार्थ और प्रति पदार्थ पर सिरीज़ शुरू करने जा रही हूँ, आशा है आपको पसंद आएगी |

लेकिन शुरुआत में यह ज़रूर कहूँगी कि इस पदार्थ ब्रह्माण्ड की रचना और विनष्ट होने के प्रोसिजर को समझा कर धर्म और ईश्वर के नहीं होने की कोई बात मैं नहीं कह रही | ईश्वर इन सब चीज़ों से बहुत परे , बहुत ऊपर हैं | और यदि सूक्ष्मता से वे लिनक्स (जो मैंने दिए हैं) देखेंगे तो पायेंगे , कि ब्लेक होले का घूमना और उसकी धुरी से पदार्थ , का चिन्ह काफी कुछ ब्रह्माण्ड के आधार रूप में श्री महाविष्णु रूप और नाभिकमल पर बैठे ब्रह्म जैसा है | उसी तरह सुपर नोवा एक्स्प्लोज़न का वीडयो बहुत कुछ शिव की तीसरी आँख जैसा लगेगा (दरअसल इस वीडयो का नाम ही है – the eye of god !!! ) 

तो अब यह सिरीज़ शुरू करने जा रही हूँ … |

Star Life cycle3

दोस्तों – पिछली पोस्ट में हम सितारे के जीवन के आखरी स्टेजेस पर थे – अब आगे … कैसे अलग अलग तारे रेड जायंट, व्हाय्ट ड्वार्फ , ब्लैक ड्वार्फ , नियुट्रोन स्टार या ब्लैक होल बनते हैं ….
सितारों के भीतर आणविक संलयन (nuclear fusion) के लिए ईंधन (फ्युएल) चाहिए …. और सितारे बनते ही हैं हायड्रोजन  से – जो ईंधन के रूप में फ्यूज़न (आणविक संलयन) से हीलिअम बनती है फिर हीलिअम से कार्बन, ओक्सिजन आदि बनते हैं – यह चित्र फिर दिखा रही हूँ |

 क्योंकि हर पदार्थ का आणविक भार अलग है – तो गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्तों के अनुसार वह अलग अलग लेयर में – होगा – और अलग प्रेशर पर फ्यूज़ होगा | अब स्थिति यह आ पहुँचती है की जो हलके वजन के पदार्थ हैं – वे बाहर की लेयर में हैं , और गहराई में भारी पदार्थ हैं | बदलाव कभी तो बहुत ही धीरे होते हैं – तो कभी विस्फोटक रूप में | यह सब खरबों वर्षों की समयावधि में होता है |

यह याद रखना ज़रूरी है की सबसे भीतर जो लोहा ( iron – Fe) है – वह हमारी धरती की तरह ठोस रूप में नहीं है – क्योंकि दबाव और तापमान इतना अधिक है – सभी पदार्थ पांचवी स्थिति में हैं – जिसे प्लाज्मा (न सोलिड, न लिक्विड, न गैस) कहा जाता है | यह लोहा अभी फ्यूज़न (संलयन)नहीं कर सकता – जिसके लिए अभी दबाव और तापमान (हमारे दृष्टिकोण से बहुत – बहुत – बहुत अधिक हो कर भी ) कम है – सो यह भीतरी परत सिर्फ गुरुत्वाकर्षण बढ़ा रही है – विस्फोट यहाँ हो ही नहीं रहे …

अब ईंधन की कमी के चलते (हलके पदार्थ बाहर हैं – और कम हैं ) तारे के भीतरी भाग में विस्फोटिकीय शक्तियां कमज़ोर हो जाती हैं और गुरुत्वाकर्षण की ताकतवर – तो संतुलन गड़बड़ाने लगता है | अब तारे का कोर (मर्म) भीतर गिरता है और उसकी मृत्यु किस रूप में हो – यह इस पर निर्भर है की वह किस वजन का था | 
छोटे तारे : हायड्रोजन ख़त्म होने पर जिन तारों का शुरुआती मास (द्रव्यमान) हमारे सूर्या के ०.५ गुणे से कम रहा हो, वे हीलियम जलाने के योग्य प्रेशर नहीं बना पाते – जो थोड़ी बहुत हीलिअम , ओक्सिजन आदि बनी है – वह भीतरी परत में है – लेकिन जल नहीं पा रही (हम यहाँ कभी भी केमिकल बर्निंग की नहीं , हमेशा ही आणविक जलने की बात कर रहे हैं ) | तो यह तारे ऊपर दिए चित्र तक तो पहुँच ही नहीं पाते – इनमे भीतरी दिखाए पदार्थ बनते ही नहीं ! यह “रेड ड्वार्फ” बनते हैं – और सूर्या से १००० गुना लम्बा जीवन है इनका | जिनका वजन सूर्या के ०.१ गुणा से भी कम हो – वे तो में सीक्वेंस में कई हज़ार ख़राब वर्षों तक रहते है – उसके बाद भी इन्हें रेड ड्वार्फ से व्हाय्ट ड्वार्फ बनने में कोई सौ खरब वर्ष लगते हैं | 

एक सफ़ेद बौना 

                  इससे कुछ बड़े सितारे, अब, इस स्थिति में हैं की , जो थोड़ी बहुत हायड्रोजन बची है – वह बाहरी लेयर में है – और विस्फोटक शक्ति के कारण फैलती जाती है | सितारे का बाहरी आकार इतना बढ़ जाता है की सितारा धरती या मंगल गृह की कक्षा (ऑर्बिट) जितना फ़ैल जाता है – अन्दर भारी ईंधन जल ही नहीं रहे, तो गुरुत्वाकर्षण से कोलैप्स जारी है | तारा फ़ैल कर अब एक “रेड जायंट” बन जाता है – बाहरी परत और अधिक उज्जवल हो जाती है | सतह का तापमान ५००० से ६००० डिग्री फेरेंहाईट होता है – जो तारों के लिहाज से बहुत ही ठंडा (???) कहलाता है [  :)  ] तो भीतरी और बाहरी तापमान के फर्क के चले शक्तिशाली सौर्य तूफ़ान / आंधी उठती है – जो बाहरी हायड्रोजन को बहा ले जा कर दूर दूर अंतरिक्ष में बिखेर देती है | जो बचा है भीतर, वह मृत तारा है – यह कहलाता है -long period variable star (दीर्घ कालीन बदलता सितारा)… और, जो बाहर बिखर गया (हायड्रोजन) – वह एक बार फिर से   planetary nebula बन जाता है , और एक प्रकाश वर्ष तक बड़ा हो सकता है | (आकार में – प्रकाश वर्ष आकार दर्शाता है – समय नहीं | जानकारी के लिए - प्रकाश एक सेकण्ड में ३ लाख किलोमीटर की दूरी तय करता है – तो एक मिनट में इसका साठ गुणा , फिर एक घंटे में इसका साठ गुणा, फिर एक दिन में इसका चौबीस गुणा और एक वर्ष में इसका भी तीन सौ पैसठ गुणा
               आणविक अभिक्रियाएँ करीब करीब चुक गयी है – परन्तु तापमान अभी भी कई लाख डिग्री है | कुछ अरब सालों में यह  (सफ़ेद बौना) white dwarf बनेगा , और ठंडा होने के बाद यह चमकना बंद हो कर black dwarf.(काला बौना )बन जाएगा |
        यह बौना हीलिअम और ओक्सिजन से बना है …. और बहुत ही घना है | इसका आकार तो करीब करीब पृथ्वी जितना है, किन्तु इसमें पदार्थ का मास (द्रव्यमान) करीब करीब सूर्य जितना है – धरती से हज़ार गुना से भी अधिक भारी !!

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बड़े सितारे :   यदि शुरूआती मास (द्रव्यमान) सूर्य के आठ गुणे से कम था – तब तो उसकी समाप्ति रेड जायंट पर हो जायेगी | किन्तु अधिक मास (द्रव्यमान) के तारे यहाँ नहीं रुकते | -वे आगे भी जलते हैं | उनमे भार अधिक है – तो गुरुत्वाकर्षण भी अधिक है – इसलिए दबाव और भी बढ़ता जाता है – तो भार के प्रभाव से दबाव इतना बढ़ जाता है की, भीतर ओक्सिजन और कार्बन भी संलयन (फ्यूज़न) करने लगते हैं | कार्बन से नीओन और मग्नीशीऍम  बनता है , और ओक्सिजन से सिलिकोन और सल्फर !! यह सिलिकोन और सल्फर अब फ्यूज़ हो कर लोहे को जन्म देते हैं | और जैसा मैंने पहले भी कहा है – लोहा अभी  फ्यूज़न नहीं करेगा – उसे अभी की स्थिति से कहीं अधिक दबाव चाहिए!!! - (यहं आणविक रिएक्शन हो रहे हैं और पदार्थ एक से दूसरे में परिवर्तित हो रहे हैं – केमिकल जलने की बात नहीं हो रही जिसमे धातु नहीं बदल सकती) 
तो अब एक बार फिर बैलेंस बिगड़ गया है -
सितारा फिर से भीतर को गिर रहा है – और भीतरी लेयर का लोहा विस्फोट के लिए अभी तैयार नहीं है |  यही नहीं, क्योंकि लोहा भारी है तो इसकी गुरुत्व शक्ति दूसरे पदार्थों से बहुत ही अधिक है – तो दोनों बातें एक साथ हो रही है – गुरुत्वाकर्षण बढ़ रहा है, विस्फोट कमज़ोर हो रहे हैं |


इस सबसे भीतरी पर्त – जिसमे लोहा है -जब इस पर्त का निजी द्रव्यमान १.४ सौर्य द्रव्यमान तक पहुँच जाता है – तब  बैलेंस इतना बिगड़ जाता है कि जो कोर (मर्म) है – जहाँ भारी लोहे का गुरुत्वाकर्षण तो है – लेकिन विस्फोट हैं ही नहीं – वह अचानक ही कोलैप्स होता है | क्षण भर में ही (१ सेकंड से भी कम समय में ) इस कोर का आकार करीब ५००० मील से घाट कर करीब बारह मील रह जाता है !!!!

यह इतना तेज़ बदलाव – और इतना अधिक मोमेंटम – कई प्रतिक्रियाओं को शुरू करता है | “प्रोटोंस” और “इलेक्ट्रोंस” जुड़ कर “न्यूट्रोंस” बनाते हैं | इन “उप-परमाणविक” कणों में बहुत ही अधिक ऊर्जा होती है (याद कीजिये – जून २०११ में जापान के भूकंप से आणविक रिएक्टर के खतरे को – और वह ईंधन तो सितारे के हिसाब से धूल भी नहीं है ) इस एक पल में इतनी ऊर्जा बनती है जैसे कि कई सौ सितारे दस ख़रब वर्षों में बनाते हैं -यह एक पल का विस्फोट भीतरी से बाहरी परत को फैलता है और supernova explosion. http://www.youtube.com/watch?v=RgfbjHz_UTo&feature=related होता है |
इस झटके की लहर भीतर से बाहर की और बढती है और उन परतों को अत्यधिक गर्म कर देती है | हर परत में आणविक अभिक्रियाएँ और भी पुरजोर हो उठती हैं | बाहरी परत १० अरब मील प्रति घंटे से भी अधिक रफ़्तार से अंतरिक्ष में फिंक जाती हैं | इस दबाव में अब लोहा भी संलयन (फ्यूज़न) करने लगता है – और अधिक भारी पदार्थ प्रकट होते हैं | एक या दो दिनों में यह तारा कई खरब सूर्यों से भी अधिक प्रज्ज्वलित हो कर चमकता है | दो हफ्ते गुज़रते गुज़रते यह विस्फोट तो कमज़ोर पड़ जाता है – परन्तु, यह चमक अंतरिक्ष में महीनों या वर्षों तक बनी रहती है | जो भीतर बच गया – वह नियुट्रोन स्टार या ब्लैक होल  है | यह विडीयो देखें - http://www.youtube.com/watch?v=vLaoT611i4Y&feature=related





नियुट्रोन सितारे :
यदि बचा हुआ भाग १.४ सौर्य द्रव्यमान से कम है (मूल द्रव्यमान नहीं -सिर्फ बचा हुआ भाग) – तो यह नियुट्रोन सितारा  होगा | इसका द्रव्यमान तो इतना अधिक है – परन्तु व्यास (डायामीटर) सिर्फ करीब १२ मील का है | छोटा आकार और अधिक द्रव्यमान के कारण यह बहुत घनीभूत है | आणविक विस्फोट तो नहीं हैं – परन्तु गुरुत्वाकर्षण बहुत शक्तिशाली है | यह बड़ी तेज़ी से अपनी धुरी पर घूमता है – अंदाज़न एक सेकण्ड में ३० बार!!!
जैसा कि हम सब जानते ही हैं – लोहा एक चुम्बकीय पदार्थ है – जब इतनी तेज़ी से घूमता है – तो विद्युत्-चुम्बिकीय लहरें उठती हैं – और यह “पल्सर”  कहलाता है|


ब्लैक  होल्स :
यदि द्रव्यमान इससे भी अधिक हो – सौर्य द्रव्यमान से ४० गुणा तक – तो यह गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक मजबूत होगा कि तारा सिकुड़ता ही चला जाएगा, सिकुड़ता ही चला जाएगा, सिकुड़ता ही चला जाएगा, ….|

तब तक सिकुड़ेगा – जब तक कि यह एक बिंदु बन जाए | यह इतना घनीभूत बिंदु है कि इसका गुरुत्वाकर्षण प्रकाश को तक बाहर नहीं जाने देता – इसीलिए यह “ब्लैक होल” कहलाता है | यह अपने पास पहुँचने वाले तारों को “खा” जाता है !!!! यह विडीयो देखिये – कैसे खा लेता है – http://www.youtube.com/watch?v=ou3TukauccM

सभी गैलेक्सी (आकाश गंगा) के बीचों बीच एक  super massive black hole.  होता है – जिसके आकर्षण से अरबों तारे उस गैलेक्सी में घूमते हैं – जैसे हमारा सूर्य हमारी आकाश गंगा में) – !! http://www.youtube.com/watch?v=0yMca0bFAdQ&NR=1&feature=fvwp

पडोसी गैलेक्सियों के आधार ब्लैक होल भी एक दूसरे को आकर्षित करते हैं – किन्तु दूरी इतनी अधिक है कि यह प्रभाव उतना शक्तिवान नहीं | फिर भी – गैलेक्सियां एक दूसरे की और आकृष्ट होती हैं – जैसे हमारी आकाश गंगा और हमारी पड़ोसी आकाश गंगा एक दूजे की और बढ़ रही हैं – जब मिलेंगी तो जो तबाही होगी – उसकी कम्प्युटराय्ज्ड झलक आप यहाँ देख सकते हैं —  http://www.youtube.com/watch?v=OxtsUNA1tk8&feature=related

किसी और पोस्ट में हम बात करेंगे कि यह वैज्ञानिक भाषा की यह बातें कितनी मिलती हैं हमारे पुराणों की ब्रह्मा – विष्णु – और महेश की बातों से….

शेष फिर ….

जानकारी ली गयी है विकीपेडिया , थिन्क्स्पेस , यूट्यूब से ……. साभार ……..
यु ट्यूब पर बेहतरीन विडीओज़ हैं – सभी लिंक यहाँ हैं – और पोस्ट के चलते हुए भी यह लिंक आयेगे - लेकिन  यदि आप पोस्ट के साथ देखें – तो ज्यादा एन्जॉय करेंगे …

Star life cycle2

 संशोधन एवं तकनीकी शब्दों के अनुवाद ::: आभार - गिरिजेशराव  जी …. साभार  

पहले भाग में हमने देखा की अन्तरिक्षीय धूल सितारों को जन्म देती है | अब आगे … यह धूल क्या है ? किस चीज़ से बनी है ? 
जैसा हम अपने आस पास देखते हैं , प्रकृति में हर चीज़ की “रीसाईकलिंग” होती है | तो – जब सितारे “मरते हैं” तो उनसे हायड्रोजन के कण ब्रह्माण्ड में धूल बन कर बिखर जाते हैं | यही धूल फिर अन्तरिक्षीय धूल बन कर बिखरती है – यही नेबुला पिछली पोस्ट  में होती है – जिससे नए सितारों का पुनः पुनः जन्म होता रहता है | जैसा मैंने इस विषय की पिछली पोस्ट में कहा था – किसी डिस्टर्बेंस से गोलिया बनती हैं -जो सघन होती जाती हैं – बढ़ते “मास” (द्रव्यमान ) के कारण – और अधिक अणु   इकट्ठे होते हैं – जिससे और गुरुत्वाकर्षण बढ़ जाता है – जिससे और अणु इकट्ठे होते हैं ….  | यह प्रक्रिया चलती जाती  है – और गुरुत्वाकर्षण का दबाव इतना अधिक बढ़ जाता है कि गर्मी और तापमान करीब 10,000,000 K (18,000,000 °F)  तक पहुच जाती है | अब परमाणु अभिक्रिया शुरू हो जाती है - दो हायड्रोजन के कण मिल कर आणविक फ्यूजन  ( संलयन )द्वारा हीलियम के एक अणु को जन्म देते हैं | यह जो नया नया तारा बना है – इसकी विस्फोटक प्रतिक्रयाओं के कारण बड़ी तेजी से वाष्प (पानी की नहीं – अभी पानी नहीं बना है) बाहर फूटती है और तारा तेज़ी से घूमने लगता है | इस वजह से जिस धूल के विशाल बादल ने इस तारे को बनाया था - वह हट जाता है – तारा “माँ” की कोख से बाहर आ जाता है | http://www.youtube.com/watch?v=4elLkaeLqZQ&feature=related  यहाँ आप देख सकते हैं – तारे की जीवन यात्रा |

यह एक “बालक” सितारा है | अब – गुरुत्वाकर्षण इसे अपने ही अन्दर गिराने की कोशिश कर रहा है – व परमाणु विस्फोट इसे फोड़ डालना चाहते हैं | इन दोनों विरोधी प्रक्रियाओं के बैलंस (संतुलन) से सितारा स्थिर स्थिति में रहता है | अन्दर हायड्रोजन का “फ्यूज़न ” (संलयन ) चल रहा है | नीचे दिए पीरियोडिक टेबल आवर्त सारिणी ) में आप देख सकते हैं कि पहले  पदार्थ  हायड्रोजन में एक प्रोटोन है – तो दूसरे पदार्थ  हीलियम  में दो | तो दो हायड्रोजन के कण मिल कर आणविक फ्यूजन (संलयन )  द्वारा हीलियम के एक अणु को जन्म देते हैं | यह फ्यूजन रिएक्शन “न्युक्लीअर फिजन (आणविक विखंडन) ” से बहुत अधिक ऊर्जा देता है (जो आणविक बम हिरोशिमा और नागासाकी में गिरे थे – उससे बहुत अधिक शक्तिशाली प्रतिक्रिया) और जो बम हम इंसान बनाते हैं – वे बहुत ही कम वजन के हैं – जिससे कहा जाता है कि धरती पल भर में नष्ट हो सकती है| सितारे के भीतर धरती  के कुल वजन से भी करोडो गुना भारी फ्युएल (ईंधन)  है – जो करोडो वर्षों तक अभिक्रियारत रहता है| हमारा सूर्य एक मध्यम आकर व् मध्यम उम्र का सितारा है – साइंटिस्ट्स के हिसाब से भी (1010 वर्ष – अर्थात १०,००,००,००,००० वर्ष ) – - और धार्मिक पुराणों के हिसाब से भी |




यह “बालक सितारे” की स्थिति कई करोड़ वर्षों तक रहती है | इसे “मेन सीक्वेंस ” (मुख्या अनुक्रम) कहते हैं | यह आयु निर्भर होती है – सितारे के शुरुआती मास (द्रव्यमान) और डेंसिटी (घनत्व) पर | 

कई करोड़ वर्षों के बाद अब हायड्रोजन कम होने लगती है - तो विस्फोट कमजोर पड़ने लगते हैं | जब विस्फोटों की शक्ति क्षीण होती है – तो सितारे को बाहर की और फोड़ती ताकतें कमज़ोर और गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव प्रबल हो जाता है | एक बार फिर बैलेंस बिगड़ गया है अब – और सितारा फिर कोलैप्स होने लगता है – यानी अपने ही अन्दर गिरने लगता है | सितारे के भीतरी भाग में अब हीलियम (जो भारी है) की बहुतायत है – जिसके फ्यूज़न के लायक प्रेशर अभी नहीं बना है |  बाहरी लेयर (पर्त) में अब भी हायड्रोजन है - लेकिन क्योंकि यह बाहर है – तो वहां “वोल्यूम” ज्यादा है – और पदार्थ कम – तो घनत्व बहुत कम है | हायड्रोजन फ्यूज़न अब भी जारी है – किन्तु कम घनत्व अर्थात कम गर्मी (सितारे के हिसाब से तापमान कम है – हमारे हिसाब से नहीं :) तापमान अभी भी  करोड़ों डीग्री सेल्सिअस ही है )



बड़े सितारे बहुत तेज़ी से अपनी फ्युएल (ईंधन) जलाते हैं (रेडिओ धर्मिता के नियमों के अनुसार – जितनी भी मात्रा में पदार्थ हो – उसे अपने से आधा होने के लिए एक ही बराबर वक्त चाहिए – इसे हाफ लाइफ पीरीअड़ कहा जाता है  - यदि एक घंटे में २०० किलो १०० किलो बन रहा है, तो इतने ही समय में १०० किलो से ५० और ५० से २५ , … आदि …)- और जल्दी मर जाते हैं – छोटे तारे धीरे जलते हैं  – और अंत में “रेड ड्वार्फ” या “वाईट ड्वार्फ “बनते हैं – जो की करीब १३.७ बिलीयन (अरब) सालों बाद होता है | क्योंकि हमारे इस ब्रह्माण्ड की आयु इससे कम है – तो अभी तक यहाँ – हमारे इस ब्रह्माण्ड में – रेड ड्वार्फ नहीं हैं | दूसरे ब्रह्माण्ड – और यह ब्रह्माण्ड भी – कैसे बने (विज्ञानं के अनुसार – धार्मिक ग्रंथों के अनुसार नहीं ) – यह मैं एक और सिरीज़ में डिस्कस करूंगी |


 अब हम सितारे के प्रौढ़ जीवन पर हैं | जिन तारों का वजन हमारे सूर्य से ०.४ गुना तक हो – वे रेड ड्वार्फ बनेंगे | हमारा सूर्य एक माध्यम वजन का तारा है – यह रेड जायंट बनेगा | जब हमारा सूर्य ऐसा होगा – तो वह अपने अभी के आकार से २५० गुना बढ़ जाएगा – जिसका रेडिअस १५०० लाख कि.मी. होगा |  जो रेड जायंट सूर्य से २.२५ गुना भारी तारों से बनें – वे “रेड सुपर जायंट ” बन जाते हैं |

जब प्रौढ़ सितारे का बैलेंस बिगड़ता है – तो विस्फोटक शक्तियां गुरुत्वाकर्षण की शक्तियों से हारने लगती हैं – और तारा अपने ही वजन से ही अन्दर गिरने लगता है | भीतर का दबाव फिर बढ़ने लगता है | जब दबाव इतना बढ़ जाए – की अब “हीलियम” का फ्यूज़न (संलयन) शुरू हो सके – तो फिर नए बैलेंस (संतुलन) की स्थिति हो जाती है | ऊपर दिए पीरियोडिक टेबल आवर्त सारिणी )में देखें – हीलियम में दो प्रोटोन हैं तो कार्बन में छह – तो तीन अणु हीलियम के मिल कर कार्बन का एक अणु बनाते हैं | इसी तरह ओक्सिजन, नीओन, सिलिकोन आदि भारी पदार्थ बनते जाते हैं ….|

जितना भारी पदार्थ होगा - उस के ऊपर गुरुत्वाकर्षण उतना अधिक प्रभाव डालेगा , और वह उतनी अंदरूनी पर्त में होगा | वह उतनी गहराइ  में फ्यूज़ हो कर अपने से अधिक  भारी पदार्थ को जन्म देगा – जो उससे भी अन्दर की पर्त बनाएगा – कुछ प्याज़ के छिलकों की तरह | एक लेयर्ड स्ट्रक्चर बन जाता है – जैसा यहाँ दिखाया गया है | इस स्थिति में – सबसे अन्दर लोहा – आयरन है – जो फ्यूज़न (संलयन) नहीं कर सकता – इसका फिजन (विखंडन) होगा – जो तारे की मृत्यु होगी – इस पर अगली पोस्ट में बात करेंगे | यहाँ यह ध्यान देने की बात है – की पदार्थ चाहे हायड्रोजन हो या लोहा (आयरन) यहाँ कुछ भी सोलिड (ठोस), या लिक्विड (तरल) नहीं है – सब ही गैस (वायु रूप )में हैं – क्योंकि तापमान करोड़ों डीग्री सेल्सिअस है |  इस स्थिति में – सबसे अन्दर जो लोहा – आयरन है, वह भी वाष्प है – तो वह फैल या दब सकता है – जबकि धरती पर तापमान कम होने से लोहा ठोस है – जो न फैल सकता है , न दब सकता है | 


अगली पोस्ट में – तारे की मृत्यु, सुपरनोवा एक्सप्लोजन, नीयुट्रोन  स्टार, ब्लैक होल आदि पर चर्चा करेंगे ….

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अधिक जानकारी के लिए -
http://en.wikipedia.org/wiki/Life_of_a_star
Information from wikipedia,  burro.astr.cwru.edu, csep10.phys.utk.edu, youtube…. credits and thanks ….

star life 1


http://www.youtube.com/watch?v=H8Jz6FU5D1A 
http://en.wikipedia.org/wiki/Star
क्या आप जानते हैं की – हमारी ही तरह – तारों की भी जीवन यात्रा होती है?  जन्म से पूर्व का विकास, जन्म, विकास , एवं आखिर में मृत्यु ! आज इस पर बातें करते हैं … की किस तरह अलग अलग प्रकार के सितारे बनते हैं , और कितनी अलग अलग तरह से उनकी यात्रा का अंत होता है |


और – यह जानना भी बहुत महत्व पूर्ण है कि, यह जीवन यात्रा बहुत कुछ उसी तरह है – जैसा कि धार्मिक ग्रंथों में संसार के निर्माण व प्रलय को समझाया गया है |  जैसे कि – हमारे हिन्दू ग्रंथों में कहा गया है – शिव का तीसरा नेत्र खुलना .. – यह चित्र देखिये , (और यदि चाहें तो लिंक क्लिक कर के इसी का विडियो देखिये )-
http://www.youtube.com/watch?v=NAinKUU-Mo8 






तो बात करें तारों के जन्म की | 

जैसा कि हम जानते ही हैं – अंतरिक्ष नाम है अथाह और अनंत फैलाव का – जिसे कि माना जाता है कि यह पूर्ण रूप से खाली और रीता है – जिसे अंग्रेजी में वैक्यूम कहते हैं | लेकिन ध्यान देने की बात है कि यह शब्द “वैक्यूम” वैसा हे है जैसे कि शून्य या कि अनंत | दरअसल तो वैक्यूम जैसी कोई चीज़ नहीं होती – जब पदार्थ का घनत्व घटता ही जाए – तो हम एक निर्धारित सीमा के बाद उस जगह को वैक्यूम कहते हैं | जब हवा का दबाव इतना कम हो कि उसे व्यावहारिक रूप से जीरो या शून्य मान लिया जाए – तब उसे वैक्यूम कहते हैं – और अंतरिक्ष का यह विस्तार प्रभाव में तो शून्य है – किन्तु असलियत में अंतरिक्ष में भी अणु परमाणु होते हैं ! यह और बात है कि वह हमारे रौशनी के बल्ब के अन्दर की जगह से भी बहुत कम मात्रा में होते हैं | अंतरिक्ष के यह परमाणु बादल अतिशय तरल तो हैं , लेकिन रीते नहीं |



यह नक्षत्रीय धूल मुख्य रूप से हलकी गैसों – हाईड्रोजन  एवं हीलियम की बनी है | यह बहुत बड़े विस्तार में फैली होती हैं – और इन्हें “नेबुला” कहा जाता है |यह एक चित्र है नेबुला का – यहाँ जो खम्बे से दिख रहे हैं, एक एक प्रकाश वर्ष जितने लम्बे हैं !! खम्बे के ऊपर जो उंगलियाँ सी दिखती हैं – वे संपूर्ण सौर्य मंडल से बड़ी हैं!!) इनमे कई हजारों लाखों तारे भ्रूण की स्थिति में पल रहे हैं 

  


 इन नेबुला के भी कई प्रकार हैं -  उत्सर्जनप्रतिबिंबन, कृष्ण , नक्षत्रीय एवं सुपरनोवा अवशेष ) http://burro.astr.cwru.edu/stu/stars_birth.html) . यह नेबुला करोड़ों वर्षों तक विश्रांति की स्थिति में रहते हैं | फिर कभी उनके निकट से कोई अशांति का वाहक गुज़ारे (जैसे कि कोई ब्लैक होल  या कोई तारकीय विस्फोट) -तो धूल के इस बादल में कुछ उथल पुथल होती है | (जब हम निकट कहते हैं तो यह हमारी निकटता नहीं है – अंतरिक्ष में कई प्रकाश वर्षों की दूरी को निकट माना जाता है | जानकारी के लिए - प्रकाश एक सेकण्ड में ३ लाख किलोमीटर की दूरी तय करता है – तो एक मिनट में इसका साठगुना, फिर एक घंटे में इसका साठ गुना, फिर एक दिन में इसका चौबीस गुना और एक वर्ष में इसका भी तीन सौ पैसठ गुना | इस दूरी को प्रकाश वर्ष कहते हैं – और कई प्रकाश वर्षों की दूरी अंतरिक्ष में “निकट” कही जाती है ) 


तब कुछ गोलियां सी बन जाती हैं – समझें कि कस कर खिंची हुई एक चादर पर कुछ अंटियाँ बिखेर दी जाएँ और उस पर से एक भारी गोला लुढकाया  जाए – तो उस गोले की वजह से जो दबाव और झुकाव बनेगा- तो सब छोटी अंटियाँ उस और लुढ़क पड़ेंगी और कुछ गुच्छे से बन जायेंगे | इन इकट्ठी हुई गोलियों की वजह से वहां चादर और नीची हो जाएगी एवं और अधिक गोलियां इस और आने लगेंगी – और यह होता ही जाएगा |इसे “अक्रेशन ” कहते हैं | यह ढेरी और सघन होती जाती है , गुरुत्वाकर्षण से गर्मी बढती जाती है और दबाव भी बढ़ता जाता है | जब यह हाईड्रोजन का ढेर काफी बड़ा हो जाए और परमाणु प्रक्रिया शुरू होने के लायक दबाव बन जाए – तब इसे  प्रोटो स्टार “  कहते हैं |
दबाव के कारण इस के अंतर में परमाणु प्रतिक्रिया होने लगती है और विस्फोट शुरू हो जाते हैं | यह है जन्म के पूर्व का सितारा!! यह गुरुत्वाकर्षण के कारण घने होते जाने की स्थिति करीब एक या डेढ़ करोड़ वर्षों तक रहती है (तुलना कीजिये – हम अपनी माँ कि कोख में सिर्फ नौ महीने रहते हैं!) यह जो नया तारा बना है – इसकी विस्फोटक प्रतिक्रयाओं के कारण बड़ी तेजी से वाष्प (पानी की नहीं – अभी पानी नहीं बना है) बाहर फूटती है और तारा तेज़ी से घूमने लगता है | इस वजह से जिस धूल के विशाल बादल ने इस तारे को बनाया था - वह दूर हो जाता है – और तारा “माँ” की कोख से बाहर आ जाता है | http://www.youtube.com/watch?v=4elLkaeLqZQ&feature=related  यहाँ आप देख सकते हैं – तारे की जीवन यात्रा |




इसके आगे – जन्म के बाद तारे में क्या होता है – यह चर्चा हम अगले भाग में करेंगे |
जारी ….
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