Star Life cycle3

दोस्तों – पिछली पोस्ट में हम सितारे के जीवन के आखरी स्टेजेस पर थे – अब आगे … कैसे अलग अलग तारे रेड जायंट, व्हाय्ट ड्वार्फ , ब्लैक ड्वार्फ , नियुट्रोन स्टार या ब्लैक होल बनते हैं ….
सितारों के भीतर आणविक संलयन (nuclear fusion) के लिए ईंधन (फ्युएल) चाहिए …. और सितारे बनते ही हैं हायड्रोजन  से – जो ईंधन के रूप में फ्यूज़न (आणविक संलयन) से हीलिअम बनती है फिर हीलिअम से कार्बन, ओक्सिजन आदि बनते हैं – यह चित्र फिर दिखा रही हूँ |

 क्योंकि हर पदार्थ का आणविक भार अलग है – तो गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्तों के अनुसार वह अलग अलग लेयर में – होगा – और अलग प्रेशर पर फ्यूज़ होगा | अब स्थिति यह आ पहुँचती है की जो हलके वजन के पदार्थ हैं – वे बाहर की लेयर में हैं , और गहराई में भारी पदार्थ हैं | बदलाव कभी तो बहुत ही धीरे होते हैं – तो कभी विस्फोटक रूप में | यह सब खरबों वर्षों की समयावधि में होता है |

यह याद रखना ज़रूरी है की सबसे भीतर जो लोहा ( iron – Fe) है – वह हमारी धरती की तरह ठोस रूप में नहीं है – क्योंकि दबाव और तापमान इतना अधिक है – सभी पदार्थ पांचवी स्थिति में हैं – जिसे प्लाज्मा (न सोलिड, न लिक्विड, न गैस) कहा जाता है | यह लोहा अभी फ्यूज़न (संलयन)नहीं कर सकता – जिसके लिए अभी दबाव और तापमान (हमारे दृष्टिकोण से बहुत – बहुत – बहुत अधिक हो कर भी ) कम है – सो यह भीतरी परत सिर्फ गुरुत्वाकर्षण बढ़ा रही है – विस्फोट यहाँ हो ही नहीं रहे …

अब ईंधन की कमी के चलते (हलके पदार्थ बाहर हैं – और कम हैं ) तारे के भीतरी भाग में विस्फोटिकीय शक्तियां कमज़ोर हो जाती हैं और गुरुत्वाकर्षण की ताकतवर – तो संतुलन गड़बड़ाने लगता है | अब तारे का कोर (मर्म) भीतर गिरता है और उसकी मृत्यु किस रूप में हो – यह इस पर निर्भर है की वह किस वजन का था | 
छोटे तारे : हायड्रोजन ख़त्म होने पर जिन तारों का शुरुआती मास (द्रव्यमान) हमारे सूर्या के ०.५ गुणे से कम रहा हो, वे हीलियम जलाने के योग्य प्रेशर नहीं बना पाते – जो थोड़ी बहुत हीलिअम , ओक्सिजन आदि बनी है – वह भीतरी परत में है – लेकिन जल नहीं पा रही (हम यहाँ कभी भी केमिकल बर्निंग की नहीं , हमेशा ही आणविक जलने की बात कर रहे हैं ) | तो यह तारे ऊपर दिए चित्र तक तो पहुँच ही नहीं पाते – इनमे भीतरी दिखाए पदार्थ बनते ही नहीं ! यह “रेड ड्वार्फ” बनते हैं – और सूर्या से १००० गुना लम्बा जीवन है इनका | जिनका वजन सूर्या के ०.१ गुणा से भी कम हो – वे तो में सीक्वेंस में कई हज़ार ख़राब वर्षों तक रहते है – उसके बाद भी इन्हें रेड ड्वार्फ से व्हाय्ट ड्वार्फ बनने में कोई सौ खरब वर्ष लगते हैं | 

एक सफ़ेद बौना 

                  इससे कुछ बड़े सितारे, अब, इस स्थिति में हैं की , जो थोड़ी बहुत हायड्रोजन बची है – वह बाहरी लेयर में है – और विस्फोटक शक्ति के कारण फैलती जाती है | सितारे का बाहरी आकार इतना बढ़ जाता है की सितारा धरती या मंगल गृह की कक्षा (ऑर्बिट) जितना फ़ैल जाता है – अन्दर भारी ईंधन जल ही नहीं रहे, तो गुरुत्वाकर्षण से कोलैप्स जारी है | तारा फ़ैल कर अब एक “रेड जायंट” बन जाता है – बाहरी परत और अधिक उज्जवल हो जाती है | सतह का तापमान ५००० से ६००० डिग्री फेरेंहाईट होता है – जो तारों के लिहाज से बहुत ही ठंडा (???) कहलाता है [  :)  ] तो भीतरी और बाहरी तापमान के फर्क के चले शक्तिशाली सौर्य तूफ़ान / आंधी उठती है – जो बाहरी हायड्रोजन को बहा ले जा कर दूर दूर अंतरिक्ष में बिखेर देती है | जो बचा है भीतर, वह मृत तारा है – यह कहलाता है –long period variable star (दीर्घ कालीन बदलता सितारा)… और, जो बाहर बिखर गया (हायड्रोजन) – वह एक बार फिर से   planetary nebula बन जाता है , और एक प्रकाश वर्ष तक बड़ा हो सकता है | (आकार में – प्रकाश वर्ष आकार दर्शाता है – समय नहीं | जानकारी के लिए – प्रकाश एक सेकण्ड में ३ लाख किलोमीटर की दूरी तय करता है – तो एक मिनट में इसका साठ गुणा , फिर एक घंटे में इसका साठ गुणा, फिर एक दिन में इसका चौबीस गुणा और एक वर्ष में इसका भी तीन सौ पैसठ गुणा
               आणविक अभिक्रियाएँ करीब करीब चुक गयी है – परन्तु तापमान अभी भी कई लाख डिग्री है | कुछ अरब सालों में यह  (सफ़ेद बौना) white dwarf बनेगा , और ठंडा होने के बाद यह चमकना बंद हो कर black dwarf.(काला बौना )बन जाएगा |
        यह बौना हीलिअम और ओक्सिजन से बना है …. और बहुत ही घना है | इसका आकार तो करीब करीब पृथ्वी जितना है, किन्तु इसमें पदार्थ का मास (द्रव्यमान) करीब करीब सूर्य जितना है – धरती से हज़ार गुना से भी अधिक भारी !!

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बड़े सितारे :   यदि शुरूआती मास (द्रव्यमान) सूर्य के आठ गुणे से कम था – तब तो उसकी समाप्ति रेड जायंट पर हो जायेगी | किन्तु अधिक मास (द्रव्यमान) के तारे यहाँ नहीं रुकते | -वे आगे भी जलते हैं | उनमे भार अधिक है – तो गुरुत्वाकर्षण भी अधिक है – इसलिए दबाव और भी बढ़ता जाता है – तो भार के प्रभाव से दबाव इतना बढ़ जाता है की, भीतर ओक्सिजन और कार्बन भी संलयन (फ्यूज़न) करने लगते हैं | कार्बन से नीओन और मग्नीशीऍम  बनता है , और ओक्सिजन से सिलिकोन और सल्फर !! यह सिलिकोन और सल्फर अब फ्यूज़ हो कर लोहे को जन्म देते हैं | और जैसा मैंने पहले भी कहा है – लोहा अभी  फ्यूज़न नहीं करेगा – उसे अभी की स्थिति से कहीं अधिक दबाव चाहिए!!! – (यहं आणविक रिएक्शन हो रहे हैं और पदार्थ एक से दूसरे में परिवर्तित हो रहे हैं – केमिकल जलने की बात नहीं हो रही जिसमे धातु नहीं बदल सकती) 
तो अब एक बार फिर बैलेंस बिगड़ गया है –
सितारा फिर से भीतर को गिर रहा है – और भीतरी लेयर का लोहा विस्फोट के लिए अभी तैयार नहीं है |  यही नहीं, क्योंकि लोहा भारी है तो इसकी गुरुत्व शक्ति दूसरे पदार्थों से बहुत ही अधिक है – तो दोनों बातें एक साथ हो रही है – गुरुत्वाकर्षण बढ़ रहा है, विस्फोट कमज़ोर हो रहे हैं |


इस सबसे भीतरी पर्त – जिसमे लोहा है -जब इस पर्त का निजी द्रव्यमान १.४ सौर्य द्रव्यमान तक पहुँच जाता है – तब  बैलेंस इतना बिगड़ जाता है कि जो कोर (मर्म) है – जहाँ भारी लोहे का गुरुत्वाकर्षण तो है – लेकिन विस्फोट हैं ही नहीं – वह अचानक ही कोलैप्स होता है | क्षण भर में ही (१ सेकंड से भी कम समय में ) इस कोर का आकार करीब ५००० मील से घाट कर करीब बारह मील रह जाता है !!!!

यह इतना तेज़ बदलाव – और इतना अधिक मोमेंटम – कई प्रतिक्रियाओं को शुरू करता है | “प्रोटोंस” और “इलेक्ट्रोंस” जुड़ कर “न्यूट्रोंस” बनाते हैं | इन “उप-परमाणविक” कणों में बहुत ही अधिक ऊर्जा होती है (याद कीजिये – जून २०११ में जापान के भूकंप से आणविक रिएक्टर के खतरे को – और वह ईंधन तो सितारे के हिसाब से धूल भी नहीं है ) इस एक पल में इतनी ऊर्जा बनती है जैसे कि कई सौ सितारे दस ख़रब वर्षों में बनाते हैं –यह एक पल का विस्फोट भीतरी से बाहरी परत को फैलता है और supernova explosion. http://www.youtube.com/watch?v=RgfbjHz_UTo&feature=related होता है |
इस झटके की लहर भीतर से बाहर की और बढती है और उन परतों को अत्यधिक गर्म कर देती है | हर परत में आणविक अभिक्रियाएँ और भी पुरजोर हो उठती हैं | बाहरी परत १० अरब मील प्रति घंटे से भी अधिक रफ़्तार से अंतरिक्ष में फिंक जाती हैं | इस दबाव में अब लोहा भी संलयन (फ्यूज़न) करने लगता है – और अधिक भारी पदार्थ प्रकट होते हैं | एक या दो दिनों में यह तारा कई खरब सूर्यों से भी अधिक प्रज्ज्वलित हो कर चमकता है | दो हफ्ते गुज़रते गुज़रते यह विस्फोट तो कमज़ोर पड़ जाता है – परन्तु, यह चमक अंतरिक्ष में महीनों या वर्षों तक बनी रहती है | जो भीतर बच गया – वह नियुट्रोन स्टार या ब्लैक होल  है | यह विडीयो देखें – http://www.youtube.com/watch?v=vLaoT611i4Y&feature=related





नियुट्रोन सितारे :
यदि बचा हुआ भाग १.४ सौर्य द्रव्यमान से कम है (मूल द्रव्यमान नहीं -सिर्फ बचा हुआ भाग) – तो यह नियुट्रोन सितारा  होगा | इसका द्रव्यमान तो इतना अधिक है – परन्तु व्यास (डायामीटर) सिर्फ करीब १२ मील का है | छोटा आकार और अधिक द्रव्यमान के कारण यह बहुत घनीभूत है | आणविक विस्फोट तो नहीं हैं – परन्तु गुरुत्वाकर्षण बहुत शक्तिशाली है | यह बड़ी तेज़ी से अपनी धुरी पर घूमता है – अंदाज़न एक सेकण्ड में ३० बार!!!
जैसा कि हम सब जानते ही हैं – लोहा एक चुम्बकीय पदार्थ है – जब इतनी तेज़ी से घूमता है – तो विद्युत्-चुम्बिकीय लहरें उठती हैं – और यह “पल्सर”  कहलाता है|


ब्लैक  होल्स :
यदि द्रव्यमान इससे भी अधिक हो – सौर्य द्रव्यमान से ४० गुणा तक – तो यह गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक मजबूत होगा कि तारा सिकुड़ता ही चला जाएगा, सिकुड़ता ही चला जाएगा, सिकुड़ता ही चला जाएगा, ….|

तब तक सिकुड़ेगा – जब तक कि यह एक बिंदु बन जाए | यह इतना घनीभूत बिंदु है कि इसका गुरुत्वाकर्षण प्रकाश को तक बाहर नहीं जाने देता – इसीलिए यह “ब्लैक होल” कहलाता है | यह अपने पास पहुँचने वाले तारों को “खा” जाता है !!!! यह विडीयो देखिये – कैसे खा लेता है — http://www.youtube.com/watch?v=ou3TukauccM

सभी गैलेक्सी (आकाश गंगा) के बीचों बीच एक  super massive black hole.  होता है – जिसके आकर्षण से अरबों तारे उस गैलेक्सी में घूमते हैं – जैसे हमारा सूर्य हमारी आकाश गंगा में) – !! http://www.youtube.com/watch?v=0yMca0bFAdQ&NR=1&feature=fvwp

पडोसी गैलेक्सियों के आधार ब्लैक होल भी एक दूसरे को आकर्षित करते हैं – किन्तु दूरी इतनी अधिक है कि यह प्रभाव उतना शक्तिवान नहीं | फिर भी – गैलेक्सियां एक दूसरे की और आकृष्ट होती हैं – जैसे हमारी आकाश गंगा और हमारी पड़ोसी आकाश गंगा एक दूजे की और बढ़ रही हैं – जब मिलेंगी तो जो तबाही होगी – उसकी कम्प्युटराय्ज्ड झलक आप यहाँ देख सकते हैं —  http://www.youtube.com/watch?v=OxtsUNA1tk8&feature=related

किसी और पोस्ट में हम बात करेंगे कि यह वैज्ञानिक भाषा की यह बातें कितनी मिलती हैं हमारे पुराणों की ब्रह्मा – विष्णु – और महेश की बातों से….

शेष फिर ….

जानकारी ली गयी है विकीपेडिया , थिन्क्स्पेस , यूट्यूब से ……. साभार ……..
यु ट्यूब पर बेहतरीन विडीओज़ हैं – सभी लिंक यहाँ हैं – और पोस्ट के चलते हुए भी यह लिंक आयेगे – लेकिन  यदि आप पोस्ट के साथ देखें – तो ज्यादा एन्जॉय करेंगे …

Posted on November 25, 2011, in ब्रह्माण्ड, विज्ञान, सितारे. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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