पूर्वाग्रह २ : पहचान और निर्णय

पूर्वाग्रह भाग  देखें 


पिछले भाग में मैंने (लेख और टिप्पणियों के discussion में) कहने की कोशिश की – कि 


१. शब्द जो छवि बनाते हैं हमारे मन मस्तिष्क में – उसमे से कुछ भाषाज्ञान है, और कुछ पूर्वाग्रह | 


२, आम – फल है | किन्तु – कैसा है ? यह हर वह व्यक्ति बता सकता है – जिसने आम खाया है (समझाना तो मेरे बस का नहीं है) यह भाषाज्ञान है |


३.  मैंने यह भी कहा ( पोस्ट में भी और टिप्पणियों में भी ) कि यह पोस्ट मैं सिर्फ हमारी (मनुष्यों की) मानसिक प्रक्रियाओं पर concentrate कर के नहीं लिख रही हूँ, बल्कि ये मानसिक प्रक्रियाएं सिर्फ एक background हैं – आगे मैं natural neurons , artificial neurons और artificial neural networks पर बात करने वाली हूँ | 

अब – आगे ….

———————————————–


पहली बात तो यह कि आम पीला है – यह हमारी सोच प्रक्रिया में बना हुआ एक पूर्वाग्रह है | कृपया यह न सोचें कि मैं पूर्वाग्रह की निंदा कर रही हूँ – नहीं तो आगे जो बातें होनी हैं – वे इस निंदा की image की ही वजह से निरर्थक हो जायेंगी | इस पोस्ट के सन्दर्भों में पूर्वाग्रह निंदनीय नहीं है – यह अक्सर सहायक है सही पहचान के लिए | यदि यह अड़चन बनने लगता है – तो धीरे धीरे यह ( हमारी मानसिक प्रक्रियाओं के द्वारा ) बदल भी जाता है | हर आम तो पीला नहीं होता ( दसहरी , लंगड़ा हरे आम हैं ) – फिर भी यह बात तो है ही कि आम सुन कर पीला फल ही मन में उभरता है | इससे उलट – यदि गर्मियों के मौसम में दूर से फल का ठेला दिखे – तो यदि उस पर पीले फल दिख रहे हों – तो आम ही लगते हैं |  


यह ऊपर – दो अलग बातें है – 


(अ) आम पीले होते हैं – यह छवि – “cognition ” कहलाती है हमारी इलेक्ट्रोनिक की इमेज प्रोसेसिंग की भाषा में | 


(ब) ठेले पर जब दूर से पीले फल दिख रहे हों – तो वह आम का ठेला है – यह “recognition “ कहलाता है | 


जब cognition होता है – तब हम मशीन को सिखाते हैं कि किस वस्तु (label) के साथ क्या properties associate की जाएँ | इसी तरह – छोटे बच्चे को हम सिखाते हैं – अ- अनार का ; आ – आम का – और उस पुस्तक में अनार और आम की छवि होती है | लेकिन न हम उसे अनार सिखा रहे थे, न आम, हम तो उसे सिखा रहे थे कि यह जो अक्षर लिखा है किताब में – इसे बोला किस तरह से जाता है | इसके उलट – यह जो हम बोल रहे हैं “अ”, “आ” इसे लिखा कैसे जाए |


अब समझें – दो प्रकार के factors हैं, जो हमारे निर्णय को प्रभावित करते हैं (उदाहरण के लिए – यह चीज़ / व्यक्ति मुझे पसंद आएगा / नापसंद / या न्यूट्रल ? ) अब जैसे – किसी को आम पसंद है / किसी को नहीं | तो उसी एक फल को देख कर कोई पहचानेगा की यह आम है, कोई नहीं पहचानेगा | इसके आगे – किसी के मन में पसंद की भावना होगी – किसी के मन में नापसंदगी की | 


अ) एक – तत्काल अभी उस से क्या input आ रहा है ? (जो सामने फल है – यह आम है या नहीं इसे पहचानने के लिए उसका रंग, रूप. आदि )

बी) और दूसरा – लॉन्ग टर्म में मैंने उसके बारे में क्या जाना है | ( मीठा ? खट्टा ? रसीला ? नर्म ? सख्त ? )


तत्काल अभी आए inputs को weigh कर के जो असर होता है – वह एक sum बनाता है | इसमें पहले के अनुभव से आये bias को जोड़ा जात है | तब – इस मिले जोड़ के आधार पर – निश्चय लिया जाता है |


अब आगे बढ़ते हैं – neuron की ओर – कि वह कैसे decision लेता है कि किस वस्तु को किस category में रखा जाए | हमारे शरीर में एक nervous system है , जिसके हिस्से हैं nerves , spinal chord और brain | ये सब नयूरोंस पर बने हैं | ये नन्हे नयूरोंस करोड़ों की संख्या में हैं – और इनकी कई शाखाएं एक दुसरे से जुडी हैं | ये जुडी हुई शाखाएं एक से दुसरे को chemicals के exchange द्वारा सन्देश देती हैं | 


शरीर का एक प्राकृतिक neuron हमारे engineers द्वार बनाए artificial neuron से बहुत अधिक advanced है – किन्तु उसी को समझ कर और उसकी working को कॉपी कर के ही हम artificial neron और neural network बनाते हैं | इन नयूरोंस पर बात होगी अगले अंक में – कि  कैसे बनते और कार्य करते हैं | 


Posted on December 12, 2011, in जीवन, विज्ञान. Bookmark the permalink. Leave a comment.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: