पूर्वाग्रह ३ : सीखना

इस शृंखला के पुराने भाग  देखें  :-

आज के भाग के लिए इस नीले भाग से आगे पढ़ें । यह नीला भाग background information  और पुनरावृत्ति है – जो आगे की प्रक्रिया समझने में सहायक होगी ।

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पिछले दो भागों में हमने पढ़ा कि:


भाग १ –  पूर्वाग्रह का अर्थ है किसी वस्तु / व्यक्ति को देखने या जानने से पूर्व ही उसके बारे में एक धारणा बना लेना । यह पूर्वाग्रह भाषा ज्ञान से भी आता है, हमारे निजी अनुभव से भी बनता है । पूर्वाग्रह के बारे में अक्सर हमारे मन में एक पूर्वाग्रह है कि यह कोई “निंदनीय” चीज़ है, पूर्वाग्रह रखना कोई बुरी बात है । किन्तु यहाँ – इस शृंखला में मैं यह चाहूंगी कि आप इसके प्रति यह पूर्वाग्रह न रखें । यह हमारे पहचान और निर्णय की प्रक्रिया का एक भाग है । हमारे nervous system से ही प्रेरणा लेकर आजकल artificial intellegence के लिए सिस्टम्स बनाये जा रहे हैं – जो artificial neurons का उपयोग करते हैं । इन artificial electronic neurons को भी inputs और पूर्वाग्रह का उपयोग उसी प्रकार करना होता है जैसे हमारे मस्तिष्क की प्रक्रियाओं में होता है । मैंने दो तीन उदाहरण लिए पूर्वाग्रह के – जैसे, ….आम = मीठा पीला फल, …..हिंदी फिल्मों में ” माँ ” , …. सूर्य, ….चोट, ….दोस्त अदि ।


भाग २ – पूर्वाग्रह का पहचान और निर्णय की प्रक्रिया में क्या योगदान है । जैसे – यदि मैं मई के महीने में फल के बाज़ार में गयी और मुझे दूर से पीले फलों का ठेला दिखा – तो मैंने मान लिया कि यह आम हैं । यह तो पास जा कर ही जान पाऊंगी कि हैं , या नहीं हैं । तो मुझे एक तो यह पहचान करनी है कि यह फल आम है या नहीं, और दूसरा यह image मेरे मन में बने कि यह फल मुझे ख़ुशी की अनुभूति देगा (यदि मुझे आम पसंद हैं तो ) या नहीं (नापसंद हैं तो ) । निर्णय के दो आधार हैं – अभी क्या इनपुट आया और पहले से उस चीज़ के बारे में मेरा अनुभव कैसा रहा । neuron कैसे decide करे ? 

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यह दो चित्र आगे के लेख को समझने में सहायक होंगे – इन्हें याद रखने की आवश्यकता नहीं है – सिर्फ रेफेर करने में काम आयेंगे ।


हमारे शरीर के neuron  का एक उदाहरण यह है ।

natural neuron 


यह जो दोनों और, ऊपर और नीचे टहनियां और जडें सी दीखती हैं – ये हजारों की संख्या में हैं । ये neurons को एक दूसरे से जोडती हैं, और उनमे आपस में संकेत भेजने का भी काम करती हैं । जब दो neuron आपस में “बात” करते हैं – तो उनके बीच का सम्बन्ध और सुदृढ़ हो जाता है , और जो बारम्बार बात करते हैं, उनके सम्बन्ध उतने अधिक प्रगाढ़ होते चले जाते हैं । इसके विरुद्ध, जो connection use  नहीं होता, वह कमज़ोर होता जाता है । हर एक neuron दुसरे हज़ारों neurons से इनपुट भी लेता है, और हजारों को output भी देता है । ( आपको शायद आश्चर्य होगा – किन्तु आज इलेक्ट्रोनिक / इंस्ट्रुमेंटेशन इंजिनियर / डॉक्टर हमारी जीभ के neurons – जो हम स्वाद के अनुभव के लिए use करते हैं – उन्हें नेत्रहीन लोगों के देखने के लिए प्रयुक्त करने का प्रयास कर रहे हैं – और कुछ हलकी सफलताएं मिलने भी लगी हैं ।


 

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artificial neuron कुछ ऐसा होता है – (यह natural वाले से बहुत ही कमतर है – किन्तु basic working को copy करता है ।)

Artificial  Neuron 


१.ये जो inputs दीख रहे हैं – ये असल inputs हैं । 

२.इस एक नयूरोन का सिर्फ एक ही output है ।

३.हर इनपुट को कितना महत्व (वजन, weight ) दिया जाएगा – नयूरोन हर उदाहरण से सीखता है ।

४.यह सीखना अब तक के अनुभव की आधार पर होता है – यह वजन अनुभव के साथ बदलता है ।

५.जो इनपुट इस neuron के output के साथ में सकारात्मक रूप से काम करें – उन inputs का इस neuron में + महत्व बढ़ता जाता है, (+१ तक) , और जो इस output के साथ न हों / विरुद्ध हों, उनका घटता जाता है या – में बढ़ता है ( – १ तक)।

६.ये सारी चीज़ें (असर) जोड़ी जाती हैं ।

७.activation function का काम है इस जोड़ को (जो एक से अधिक हो सकता है – +-१ तक लिमिट करना। (अर्थात हाँ या ना में उत्तर बनाना )


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अब चलते हैं सीखने की प्रक्रिया की ओर – कि हर प्रविष्टि का वजन कैसे निर्धारित होता है और हर बार bias के वजन पर क्या असर होता है |

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एक रोज़मर्रा का उदहारण लेते हैं : सोचिये की यह न्यूरोन एक नन्हा १० ११ माह का बच्चा है जो घुटने चलता है । उसे कई तरह के अनुभव होते हैं – और अलग अलग स्थितयों के अनुसार सोचिये की उसे “हाँ” या “न” में चुनाव करना सीखना है ।

 

 

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इनमे से हर एक इनपुट को एक के बाद एक लेते और समझते हैं । हम में से अधिकतर लोगों को ये experience हुए ही हैं – तो समझना आसान होगा

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१.

किचन में गर्म कुकर है – जिसे छूने बच्चे बार बार आगे जाते हैं । माँ मना करती है – बेटा मत छू – हाथ जलेगा। माँ सामने हो तो बच्चे अक्सर मान भी जाते हैं, परन्तु उनमे वह उत्सुकता बनी रहती है – कि छूना है । फिर किसी दिन माँ की नज़र न हो – तो छूते ही हैं – और हाथ में जलन के दर्द का अनुभव उन्हें तुरंत हाथ खींचने पर मजबूर करता है – रोने पर भी । कुछ देर बाद – हाथ धुलने से / दवा देने से राहत हो जाती है । कुछ दिन बच्चे को वह दर्द याद रहता है – और वह कुकर नहीं छूता । फिर यह repeat होता है – शायद अबकी बार किसी गर्म कढाई / गर्म दूध की भगोनी आदि के साथ । तो अनुभव पक्का होता जाता है, याददाश्त प्रगाढ़ होती जाती है ।

 

अब बच्चे ने दो तरह की बात सीखी –

         (क) एक यह की किचन में गर्म चीज़ें जो प्लेटफोर्म पर / चूल्हे पर रखी हैं – उन्हें छूना दर्द देता है – तो उन्हें  नहीं छूना है । तो उस input के लिए वजन negative बन गया ।

         (ख) माँ जो कह रही थी – वह मेरे लिए सही था – तो माँ की बात मानने में भलाई है – नकारात्मकता (माँ ने मना किया था ) और नकारात्मकता (दर्द हुआ ) के गुणा होने से सकारात्मक परिणाम  (bias या माँ की बात का वजन बढ़ गया)

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(२)

दूसरा इनपुट एक बजता हुआ खिलौना है – माँ बच्चे को हंस हंस कर उससे खेलने को दे रही है । बच्चा उसे लेता है – खेलता है – और एन्जॉय करता है – फिर से दो बातें हिया हैं ।

       (क) खिलौने (input ) का वजन positive हो गया ।

       (ख) माँ की बात (bias ) का वजन भी बढ़ा – इस बार सकारात्मक (माँ ने खेलने दिया था) और सकारात्मक (मजा आया खेलने में )  के गुणा होने से + result आया है ।

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(३)

पिता की थाली में चटनी / अचार है – जबकि बच्चे को सिर्फ मीठी / फीकी /  हलकी नमकीन चीज़ें ही मिली हैं । बच्चे के ललचाने पर माँ कहती है – थोडा बड़ा हो जा – फिर मिलेगा । अभी मुह जलेगा । परन्तु बच्चा जिद करता है । फिर थोडा सा अचार चटाना ही पड़ा माता पिता को । उसे मिर्च लगी । अगली बार वह नहीं खाना चाहेगा (कुछ दिन तक ) । फिर से दो बातें हुईं

         (क) तीखा अचार मुंह में जलन देता है – तो नहीं खाना है – neagtive वजन ।

         (ख) माँ की बात मान लेता तो तकलीफ न होती – bias का वजन फिर बढ़ा ।

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अब – इनमे से हर एक इनपुट – हर experience (अनुभव ) के बाद अपने ही वजन को प्रभावित कर रहा है – उसे + या – दिशा में बढ़ा रहा है । किस दिशा में – यह इस पर निर्भर है की अनुभव सुखदायी था या दुखदायी ।

 

इसके अलावा – इनमे से हर एक इनपुट के लिए माँ (bias ) ने जो कहा – यदि अनुभव उसके अनुरूप रहा – तो  bias का वजन बढ़ता चला जायेगा । यदि माँ ने न कहा था – और अनुभव कटु हुआ – तो बच्चा सीखेगा की माँ की बात न मानने में मेरा नुकसान है (नकरात्मक और नकरात्मक = सकारात्मक )। इसके ठीक उलट – यदि माँ ने हाँ कहा था और अनुभव मीठा रहा – तो बच्चे यह सीखते हैं की अरे वाह – माँ की बात मानने में बड़ा फायदा है (सकारात्मक और सकारात्मक = सकारात्मक )। इन दोनों ही रूप में bias का वजन + की दिशा में बढ़ता है ।

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इस सीखे हुए अनुभव का उपयोग कैसे होगा? एक समय में अक्सर एक ही इनपुट होगा, या तो गर्म कुकर है, या फिर बजने वाला बाजा । तो एक input =+१ है, बाकी के इनपुट शून्य हैं । तो जोड़ जो बनेगा – वह उस एक ही इनपुट के असर से बनेगा । और उसी के हिसाब से परिणाम या तो +१ आएगा (अर्थात हाँ ) या फिर -१ आएगा (अर्थात ना )।

 

अगले भाग में हम यह देखने का प्रयास करेंगे की यह bias या इनपुट के वजन जो हमने इंसानी दिमाग में देखे समझे – ये artificial neuron में कैसे घटाए और बढाए जाते हैं ।

 

जारी ……..

Posted on January 23, 2012, in जीवन, विज्ञान. Bookmark the permalink. 1 Comment.

  1. बहुत अच्छा लगा इस ब्लौग पर आना…. हिंदी में ‘विज्ञान’ संबंधी आलेख लिखना स्वयं में बहुत कठिन है, आपके प्रयास की ढेरों सराहना!

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