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japan quake 4 – how volcanoes are formed

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इस श्रुंखला का यह आखरी भाग है । इसके पहले के भागों में हमने () भूकंप आने की प्रक्रिया () और सुनामी आने की प्रक्रिया (  ) देखी, संतोरिणी द्वीप के भयंकर विस्फोट (  ) , और न्यूक्लियर मेल्ट डाउन पर ( 3 ) बात की । इस आखरी भाग में हम ज्वालामुखियों (volcanoes) पर बात करते हैं ।

 

इस पोस्ट में तीन मुख्य भाग हैं – ज्वालमुखी बनने / फूटने की प्रक्रिया; विस्फोट के प्रभाव; और ज्वालामुखियों के प्रकार ।

सभी चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।————————-

ज्वालामुखी की प्रक्रिया :

 

ज्वालामुखी मूल रूप में धरती की ऊपरी सतह crust में टेक्टोनिक प्लेटों तक गहरे उतारे हुए क्रेक्स होते हैं , (देखिये पहला भाग) जिसमे से भीतर का उबलता हुआ मेग्मा अपने अत्यधिक दबाव की वजह से बाहर आ जाता है । यह मैंने पहले भाग मे दूध की मलाई का उदहारण लेकर बताया था ।

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 चाहें तो इस नीले भाग को छोड़ कर आगे बढ़ जाएँ – यह पहले भाग का संक्षिप्त सार है (सिर्फ ज्वालामुखी के सन्दर्भ में ):

 

चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।

 

धरती के भीतर अत्यधिक गर्मी और दबाव है, जिसकी वजह से सब कुछ पिघला हुआ है । पिघले हुए द्रव्य को धरती के हज़ारों वर्षों तक लगातार घूमने से ठंडा होने का मौका मिला , और ऊपर की सतह ठंडी हो कर मलाई की तरह जम गयी । परन्तु मलाई ही की तरह – यह एक टुकड़े में नहीं जमी बल्कि इस के अलग अलग सात मुख्य टुकड़े हैं – जिन्हें हम टेक्टोनिक प्लेट्स कहते हैं। ये टेक्टोनिक प्लेटें सख्त पत्थर जैसी थीं, जो हजारों वर्षों धूप की गर्मी से फैलने और सिकुड़ने की प्रक्रिया से पहले क्रैक हुई, फिर टूट कर छोटे (?) आकार में परिवर्तित हुई । हवा, धूप, बारिश आदि के लगातार प्रभाव से धीरे धीरे रेत और मिटटी आदि बने । परन्तु हम जो भी ऊपर देखते हैं, यह सिर्फ कुछ ही किलो मीटर गहरा है । नीचे सब कुछ इन टेक्टोनिक प्लेटों पर ही “रखा” हुआ है । सारे समुद्रों के सागरतल भी, और सारे महाद्वीपों के भूतल भी – इन्ही टेक्टोनिक प्लेटों पर टिके हैं । और ये टेक्टोनिक प्लेटें तैर रही हैं भीतर के पिघले मेग्मा पर । जब ये टेक्टोनिक प्लेटें एक दूसरे से आगे/ पीछे आदि खिसकना चाहती हैं, तो अत्यधिक भार (ऊपर महाद्वीप और समुद्रों का भार है ) के कारण अत्यधिक फ्रिक्शन होता है – और ये सरक नहीं पातीं । जब कई सौ साल गुज़रते हुए दबाव बहुत बढ़ जाए – तो कमज़ोर पड़ जाने वाले जोड़ पर पत्थर टूट जाते हैं और प्लेटें अचानक सरक जाती हैं । इसी से भूकंप आते हैं ।

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कहीं कही इन टेक्टोनिक प्लेटों के बीच में क्रेक्स भी हैं, जहां से नीचे का माग्मा कभी कभी बाहर उबल आता है । यही ज्वालामुखी का रूप लेता है । परन्तु यह तीन तरह के कॉम्बिनेशन हो सकते हैं

 

1, सिर्फ भूकंप – कहाँ ? जहां टेक्टोनिक प्लेटें खिसकें, परन्तु मेग्मा बाहर न आये ।

 

2. सिर्फ ज्वालामुखी – जहां मेग्मा बाहर आने योग्य क्रैक तो हो, परन्तु दबाव इतना न हो की प्लेट खिसक सके। यहाँ, या तो एक प्लेट दूसरी के नीचे को खिसकती है ( और नीचे के मैंटल की गर्मी से पत्थर पिघल कर मेग्मा बनने लगते हैं ) या फिर प्लेटें एक दुसरे से दूर खिसकती हैं, जिससे क्रैक बनते हैं और चौड़े हो जाते हैं – जिनसे नीचे का लावा बाहर आने का रास्ता पा जाता है ।

 

3. सबसे डेंजरस है वह कोम्बिनेशन जहां ये दोनों एक साथ होने की संभावना बने – इन्हें “thermal plume” कहा जाता है । शायद ये क्रैक इतने मोटे हैं / इनकी झिर्रियाँ किसी कुँए की झिर्रियों की ही तरह आस पास फ़ैली हुई है, जिससे पिघला हुआ मेग्मा इधर उधर फ़ैल कर टेक्टोनिक प्लेटों के जोड़ों को लुब्रिकेट कर रहा है । इससे टेक्टोनिक प्लेटों के बीच फ्रिक्शन कम होता है । तो ज्वालामुखी और भूकम्प दोनों ही आते है ऐसी जगहों पर । भाग दो मे हमने जिस सेंटोरिनी के बारे में बात के – ऐसा ही “thermal plume” है ।

 

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ज्वालामुखियों के प्रभाव :

आम तौर पर ऐसा लगता है की ज्वालामुखी उतने विनाशकारी न होते होंगे जितने भूकंप – क्योंकि उनका असर सिर्फ उस भूभाग तक होता होगा- जितने में लावा बह कर जाए । परन्तु ऐसा है नहीं ।

 

1.

ज्वालामुखी से सिर्फ लावा ही नहीं निकलता, साथ ही भीतर की जहरीली गैस, एसिड (जिससे काफी बड़े क्षेत्र में एसिड रेन का भय होता है ), राख और धुआं आदि भी वातावरण में बड़े ही उच्च चाप से फिंकते हैं (poisonous gases, acid, ash and smoke)। यह सब वातावरण में फ़ैल जाता है । जो पिघले पत्थर हैं – वे एक नदी की तरह बह निकलते हैं । साथ ही (- जैसे दूध उबल कर गिरे तो सिर्फ दूध बहता ही नहीं, बल्कि दूध की नन्ही नन्ही महीन सी बूँदें भी उछलती हैं हवा में, जो इतनी छोटी होती हैं की दिखती नहीं – किन्तु होती तो हैं, और पूरे प्लेटफोर्म पर दूध के छीटें दिखने लगते हैं ) पिघले माग्मा (magma) की महीन बूंदे भी बड़े वेग से आसमान में फिंक जाती हैं । ये इतनी छोटी हैं कि बड़ी जल्दी जम जाती हैं और हवा में ही धूल बन जाती हैं ।

 

 

 

 

 

 

चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।

 

2.

जो कुछ मोटी हों – वे धूल / मिटटी (dust) के मोटे कण बनाती हैं – जो अपने वजन की वजह से धीरे धीरे नीचे बैठ जाती हैं । परन्तु अत्यधिक छोटे धूल के कण बैठते नहीं – वातावरण में ही रहते हैं । ये इतने महीन हैं – की ये हवाई जहाज़ों के air conditioning filters के पार निकल जाते हैं । इससे हवाई जहाज़ों के संयंत्र फेल हो कर क्रैश हो सकता है । इसके अलावा यह फैली हुई धूल कई महीनों तक आस पास के बहुत बड़े क्षेत्र में लोगों को सांस की तकलीफ (दमा आदि) और किडनी की भी – क्योंकि यह धुल हमारी साँसों से फेफड़ों से होकर खून तक पहुँच सकती है । 2010 में आइसलैंड में जो ज्वालामुखी फूटा था – उसकी वजह से महीने से ज्यादा वक़्त ता यूरोप पर से हवाई उड़ानें डिस्टर्ब हो गयी थीं । indoneshia में विस्फोट के बाद बरसों तक इस धूल ने दुनिया को रंग बिरंगे सूर्योदय और सूर्यास्त दिखाए ।

 

3.

कई बार ज्वालामुखी फटने से भीतर का मेग्मा बाहर निकलने से भीतर खोखलापन आ जाता है – और उस पहाड़ की (या आस पास की ) धरती धंस (volcanic collapse )जाती है । इसे caledra कहते हैं । कई बार इस गड्ढे में लावा भर जाता है और जम जाता है ।

 

4.

यदि पहाड़ ऊंचा था और उस पर बर्फ जमी थी – तो पिघले गर्म पत्थर जब टनों बर्फ से मिलते हैं – तो क्षण भर में बर्फ पिघल जाती है, और लावा ठोस मिटटी में बदल जाता है । इससे लावा की छोटी नदी के बजाये सारे ही पिघली बर्फ की कीचड भरी गर्म नदी बाढ़ की तरह अचानक ही आ जाती है – और रास्ते में आये हर गाँव और शहर को नेस्तनाबूत कर देती है । इसे mud slide कहते हैं ।

 

 

 

चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।

 

5.

लावा का बहाव तो खैर सब जानते ही हैं की विनाशकारी है ही ।

 

 

 

चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।

 

ये सभी वजहें इतिहास में महाविनाश का कारण बनी हैं ।

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ज्वालामुखियों के प्रकार :

 

चार मुख्य तरह के ज्वालामुखी होते हैं – cinder cones, composite volcanoes, shield volcanoes, और lava domes. ज्वालामुखियों को active (जो लगातार फूटते रहते हैं ) , intermitent (जो फूटता रहता है परन्तु लगातार नहीं ) dormant (जो काफी समय से नहीं फूटा, लेकिन फूटने की अपेक्षा है ) और extinct (मृत – जो जबसे इतिहास की जानकारी है तब से अब तक कभी नहीं फूटा, इसलिए मान लिया गया कि अब न फूटेगा ) मानते हैं – लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें “मृत” घोषित किया जा चुका था – परन्तु ये फिर से फट पड़े!!

 

समुद्र के तल में कई जगह ऐसे क्रैक हैं जो भूभाग के ज्वालामुखी की तरह अचानक नहीं फटते , बल्कि लगातार थोडा थोडा रिसते रहते हैं । इनसे निकला लावा जमता रहता है और नए सागरतल का निर्माण होता रहता है । कई द्वीप भी ऐसे बने हैं ।

 

यहाँ एक सारिणी है – इतिहास के सबसे विनाशकारी ज्वालामुखी विस्फोटों की । कुछ विशेषज्ञ मानते हैं की अटलेटिस सभ्यता का सर्वनाश वोल्कनिक इरप्शन से हुआ । ऊंचे बर्फ से दबे ज्वालामुखी में विस्फोट से टनों बर्फ पिघली और कीचड की बहती नदी (बाढ़) ने पूरे शहरों को ढँक दिया । जो जहां जैसे था – जम गया उस कीचड के नीचे । परन्तु यह सच है या नहीं इसका कोई प्रमाण नहीं है । इंडोनेशिया के krakatoa ज्वालामुखी के भयंकर विस्फोट से वह पूरा द्वीप धंस गया और समुद्र में डूब गया – यहाँ के निवासी तो खैर समुद्र की भेंट चढ़ ही गए, साथ ही इससे उठी सुनामी ने और भी कई द्वीपों पर भयंकर तबाही की ।

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जापान का भूकंप – ३ : न्यूक्लियर मेल्ट डाउन – क्या और कैसे

जापान का भूकंप ३ : ज्वालामुखी

पिछले भागों ( ) में हमने भूकंप आने की प्रक्रिया ()  और सुनामी आने की प्रक्रिया (  ) देखी, संतोरिणी द्वीप के भयंकर विस्फोट की बात की  (  ) , अब इस भाग में न्यूक्लियर मेल्ट डाउन पर बात करते हैं | अगले (आखरी ) भाग में ज्वालामुखियों पर बात करेंगे ।

मार्च २०११ में आये जापानी भूकंप के समय वहां के फुकुशिमा न्यूक्लियर पावर प्लांट में कुछ हिस्सों में धमाके हो रहे थे और यह आशंका थी की कही न्यूक्लियर मेल्ट डाउन न हो जाए , कहीं चर्नोबिल जैसी त्रासदी न देखने में आये । यह होता क्या है ? इस पोस्ट में समझने का प्रयास करते हैं ।

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बिजली बनाने की प्रक्रिया वही होती है जो आमतौर पर बाज़ार में generator में होती है । जैसा मैंने पहले मेटर एंटी मेटर वाली पोस्ट में कहा था – ऊर्जा में principle of coservation of energy काम करता है – अर्थात ऊर्जा दूसरी तरह की ऊर्जा में बदल सकती है परन्तु विनष्ट नहीं हो सकती । जैसे कोयले में भरी रासायनिक ऊर्जा उसके जलने से गर्मी में बदलती है – जिससे पानी उबाला जाता है – इस उबलते पानी की शक्ति से विशाल dynamo घूमते हैं – जिससे बिजली बनती है (thermal power)। या फिर किसी बाँध में ऊँचाई से गिरते पानी से – hydal power । जनरेटर में पेट्रोल जलने से । हवा से चकरी घूमे – तो wind power आदि ।

अब जो nuclear power प्लांट होते हैं – वहां भी विशालकाय केतलियों में पानी उबाला जाता है – लेकिन यह गर्मी कोयले आदि को जला कर नहीं, बल्कि आणविक विखंडन से आती है । उसी पोस्ट में हमने यह भी चर्चा की थी की पदार्थ में भी  principle of coservation of matter काम करता है – तो पदार्थ एक से दूसरे जोड़ और गठबन्धनों में तो जा सकता है (2H +1O = 1H2O ) किन्तु न तो बन सकता है न ही विनष्ट हो सकता है । जब ये गठबंधन बनते बदलते हैं (chemical reactions ) तब या तो ऊर्जा भीतर को सोखी जाती है, या बाहर निकलती है ।

किन्ही विशिष्ट परिस्थितियों में कुछ पदार्थ ऊर्जा में बदल सकते हैं । एक ग्राम पदार्थ से ४५,०००,०००,०००,०००,००० जूल ऊर्जा मिल सकती है , आणविक अभिक्रियाओं से !!!

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Background information (इसमें रूचि न हो तो इस नीले हिस्से को छोड़ कर आगे पढ़ें )

साधारण तौर पर पदार्थ मिश्रण (mixtures ) हैं – जैसे समुद्र का पानी । इन मिश्रणों को (उदहारण पानी और नमक ) को भौतिक प्रक्रियाओं (physical processes ) द्वारा अलग अलग किया जाए तो सत्व (pure substance ) मिलते हैं – जो या तो शुद्ध तत्व (elements ) हैं, या उनके संयोजन (compounds ) । नमकीन पानी को अलग किया जाए distillation द्वार तो पानी (H2O ) और नमक (NaCl ) मिलेगा । संयोजनों को आगे तोडना हो, तो भौतिक (physical ) नहीं, बल्कि रासायनिक (chemical ) प्रोसेस चाहिए । शुद्ध तत्त्व परमाणुओं (atoms ) से और संयोजन अणुओं (molecules ) से बने हैं (जैसे पानी के एक molecule में दो हाईड्रोजन और एक ओक्सिजन atom होते हैं , नमक में एक सोडियम और एक क्लोरिन ) ।


इन परमाणुओं के भीतर न्यूक्लियस में भारी कण प्रोटोंस और न्यूट्रोंस हैं, और बाहर हलके इलेक्ट्रोंस घूम रहे हैं । 


साधारण रासायनिक प्रतिक्रियाओं में न्यूक्लियस बिना किसी बदलाव के वैसा ही बना रहता है – जबकि बाहरी इलेक्ट्रोन एक से दूसरे परमाणु में जुड़ सकते हैं । इससे भिन्न तत्त्व एक दूसरे से जुड़ कर नए संयोजन बनाते हैं (जैसे Na + Cl = NaCl अर्थात सोडियम और क्लोरिन का एक एक परमाणु जुड़ कर नमक का एक अणु बनता है ) यह प्रक्रिया मैंने यहाँ समझाई थी ।


किन्तु आणविक अभिक्रियाओं में (nuclear reactions में ) न्यूक्लियस का ही या तो विखंडन (fission ) या संयोजन (fusion ) होता है । इससे वह तत्त्व या तो दूसरे तत्त्व में बदलता है (यहाँ देखें ), या फिर अपने ही दूसरे आयसोटोप में (यहाँ देखें)। जब यह होता है – तो अत्यधिक ऊर्जा बनती है । यही ऊर्जा (गर्मी के रूप में ) बाहर निकलती है – जिसे अलग अलग रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है ।

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Nuclear Power Plant Working in simple language :


सभी चित्र गूगल इमेजेस से साभार : किसी भी चित्र को बड़ा देखने / लेबल पढने को, उस पर क्लीक करें )

१. न्यूक्लियर प्रतिक्रिया :

न्यूक्लियर पावर प्लांट में परमाणु के fission विखंडन ( fusion या संलयन का इस्तेमाल अक्सर नहीं किया जाता ) से प्राप्त ऊर्जा इस्तेमाल की जाती है । अधिकतर प्लांट्स में ईंधन के रूप में युरेनियम २३५ का इस्तेमाल होता है । प्रतिक्रिया से बहुत तेज़ गति पर न्यूट्रोन निकलते हैं – जो इस प्रक्रिया को लगातार आगे बढाते हैं । इसके अलावा गर्मी के रूप में ऊर्जा निकलती है । इस प्रक्रिया की गति को कम ज्यादा करने के लिए लेड या कैडमियम के रोड्स कण्ट्रोल करने के लिए होतेहैं । यह चित्र देखिये :

२. कोर, fuel रोड व् कण्ट्रोल रोड :


यह प्लांट का कोर (core ) या रिएक्टर वेसेल है जिसमे हरे रोड्स लेड या कैडमियम जैसे पदार्थों के कण्ट्रोल रोड (control rod ) हैं जो न्यूट्रोन को सोख कर आणविक प्रतिक्रिया को धीमा करते है । कोर वेसेल मेटल की है, और यह पूरा अरेंजमेंट concrete tower के भीतर है (ऊपर चित्र देखिये)। लाल रोड युरेनियम के (ईंधन या fuel rod ) हैं जो विखंडित हो रहा है और ऊर्जा और न्युत्रोंस को जन्म दे रहा है । प्रक्रिया की गति बढानी हो तो ईंधन के रोड अधिक और कण्ट्रोल रोड कम पेवस्त किये जाते हैं, और घटानी हो तो इसका उल्टा । आकस्मित स्थिति (emergency ) में कण्ट्रोल रोड पूरी तरह भीतर गिर जाते हैं, जिससे प्रतिक्रिया पूरी तरह रोकी जा सके । इससे एक fuel rod से दुसरे तक न्यूट्रोन का प्रवाह रुक जाता है – जिससे जो भी विखंडन हो रहा हो, वह हर एक रोड के भीतर ही सीमित हो जाता है – एक से दूसरे fuel rod तक न्यूट्रोन नहीं पहुँच पाते और क्रिटिकल मास से कम होने से एक रोड इस प्रक्रिया को बनाये नहीं रख पाता  ।

३. पानी :

यह सब कुछ पूरी तरह से पानी में डूबा हुआ है (हेवी वाटर) । यहाँ पानी के दो मुख्य काम हैं । एक तो यह न्युत्रोनों की अत्यधिक गति को कुछ धीमा करता है । यदि ऐसा न किया जाए – तो न्यूट्रोन जितनी तेज गति से चले हैं – वे अगले रोड के युरेनियम एटम के न्यूक्लियस से सीधे ही निकल जायेंगे , उसमे फ़िजन की शुरुआत किये बिना ही । इससे प्रतिक्रिया एक तो आगे नहीं बढ़ेगी, दूसरे ये रेडियो एक्टिविटी को बाहरी पर्यावरण तक पहुंचा देगा ।

पानी का दूसरा काम यह है कि यह प्रतिक्रिया से निकलती हुई गर्मी को सोखता है । और इसे ट्रान्सफर करता है । यह गर्मी आगे भाप बनाने में काम आती है । ध्यान दीजिये यह कोर का पानी बाहर नहीं निकल रहा है । यही पानी गर्मी को काम में लेने के बाद फिर से ठंडा कर के भीतर पहुंचाया जाता है । यानी यह इसी closed loop में recirculate होता रहता है – बाहर नहीं जाता ।

इन तेज़ गति के न्युत्रोंस को सोख लेने से पानी के हाइड्रोजन परमाणु अपने भारी आयसोटोप ड्युटेरियम और ट्रीटियम (लिंक देखिये ) में परिवर्तित हो जाते हैं – जिससे पानी हेवी और सुपर हेवी पानी में परिवर्तित हो जाता है । यह भी रेडिओ एक्टिव है क्योंकि ये दोनों ही आयसोटोप स्टेबल नहीं हैं । इस पानी का डिस्पोसल बड़ी सावधानी से करना होता है।

ऊपर चित्र में देखिये । हलके नीले रंग के पाइप में जो पानी बह रहा है , वह कोर में से हो कर गुज़र रहा है। कोर में यह गर्म हो जाता है । फिर हीट एक्सचेंजर में यह गर्मी गाढे नीले पाइप में घूमते ठन्डे पानी को दे दी जाती है । यह पानी कूलिंग टावर में फिर ठंडा कर के रेसर्कुलेट होता है ।

दो तरह के रिएक्टर होते हैं – प्रेशराइज़्ड वाटर रिएक्टर, और बोइलिंग वाटर रिएक्टर ।

४. प्रेषराइज्ड वाटर रिएक्टर :

कोर का भारी (हेवी ) पानी (जो रेडिओ एक्टिव है) अत्यधिक प्रेशर पर रखा जाते है । तो यह १०० डिग्री पर भी उबल कर भाप (gas ) नहीं बनता , बल्कि तरल (liquid ) ही बना रहता है ।  इस पानी की गर्मी हीट एक्सचेंजर में नॉन रेडिओ एक्टिव पानी को जाती है । वह पानी उबल कर “सुपर हीटेड स्टीम ” (super heated steam ) बनाता है – जिससे विशाल turbine (टर्बाइन) घूमती हैं और बिजली बनती है । यह चित्र देखिये :

ध्यान दीजिये कि टर्बाइन गाढे नीले पानी के पाइप पर है, कोर वाले हलके नीले पाइप पर नहीं है ।

५. बोइलिंग वाटर रिएक्टर :

अब यह चित्र देखिये :

जैसा कि चित्र में साफ़ दिख ही रहा है – टर्बाइन इस बार कोर वाले पानी से ही चल रही है । कोर का पानी खुद ही वहां की गर्मी से उबल कर स्टीम बन रहा हा और टर्बाइन को घुमा रहा है । इसके बाद इसे हीट एक्सचेंजर में ठंडा कर के वापस भेजा जा रहा है ।

इस तरह के प्लांट में फायदा यह है कि कोर के पानी को प्रेशराइज़ करने का खर्चा बच जाता है । लेकिन बहुत बड़ा नुकसान भी है कि रेडिओ एक्टिव पानी ही स्टीम बन रहा है, जिससे टर्बाइन भी contaminate हो जाती है ।इस कंटामिनेशन के कारण जब प्लांट को dismantle  किया जाएगा – तब रेडिओ एक्टिव कॉम्पोनेन्ट ज्यादा होने से अधिक खतरा और खर्चा होगा ।

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अब आते हैं न्यूक्लियर मेल्ट डाउन के होने की प्रक्रिया पर ।

१.

इमरजेंसी की स्थिति में कण्ट्रोल रोड्स पूरी तरह अन्दर गिर जाते हैं, और न्यूट्रोन एक से दूसरे ईंधन रोड तक नहीं पहुँच पाते । इससे आणविक विखंडन की प्रक्रिया तकरीबन बंद सी हो जाती है । हर एक रोड क्रिटिकल मास (critical mass ) से कम है – तो विखंडन बंद सा हो जाता है । तो आणविक विस्फोट का भय बिलकुल नहीं रहता । जापान में भी यही हुआ था ।

२.

किन्तु, भीतर जो युरेनियम रोड्स हैं – वे अपने आप में अत्यधिक गर्म हैं । इन्हें लगातार सर्कुलेट होते पानी से ठंडा रखना आवश्यक है । इसके लिए पानी के पम्प लगातार काम करते रहने चाहिए ।

३.

यदि पानी सर्कुलेट न हो, या पम्प काम न करें, तो कोर के भीतर का हेवी वाटर उबलने लगेगा और पानी कम होता जाएगा, स्टीम प्रेशर बढ़ता जाएगा । इस पानी की भाप से टावर में विस्फोट हो सकता है (आणविक नहीं – भाप के प्रेशर का विस्फोट ) । इसलिए ये पम्प न सिर्फ बिजली के में सप्लाई से जुड़े होते हैं, बल्कि इनका अपना एक जनरेटर भी होता है । यदि मुख्य बिजली बंद हो भी जाए – तो भी इस जनरेटर की बिजली से यह पानी के पम्प काम करते हैं और कोर में पानी का बहाव होता रहता है ।

४. 

इस तरह पानी कम होने से युरेनियम रोड हवा से एक्सपोज़ होंगी, और ठंडी नहीं हो पाएंगी । अब अपनी ही गर्मी से यह पिघलने लगेंगी । गर्मी अत्यधिक बढ़ जाए तो ये पिघल कर कोर वेसेल को भी पिघला सकती है, और पिघली हुई धातु एक दूसरे के साथ बह आने से फिर से क्रिटिकल मास तक पहुँच कर फिर से विखंडन शुरू हो सकता है ।

{ fukushima japan (फुकुशीमा जापान ) में एक तो भूकंप और दूसरे सुनामी के चलते यही हुआ कि दोनों ही supply बंद हो गयीं और pump ने काम करना बंद कर दिया था । वहां के कई वर्कर्स ने अपनी जान की परवाह न करते हुए (रेडिओ एक्टिव एक्सपोज़र ) वहां से बाहर आने से इंकार कर दिया था और भीतर ही रह कर अपनी क़ुरबानी दे कर प्रयास किये कि डिजास्टर को ताला जाए । बाद में समुद्र में जहाजो से समुद्र का पानी pump कर के कोर को ठंडा किया गया । }

५. 

यदि इस गर्मी से वेसेल भी पिघल जाए – तो भीतर का रेडिओ एक्टिव पिघला पदार्थ बाहरी पर्यावरण तक पहुँच जाएगा और पर्यावरण में रेडिओ एक्टिव प्रदूषण बुरी तरह से फ़ैल जाएगा । इसे ही nuclear meltdown कहते हैं ।

जापान का भूकंप -२ :सुनामी की प्रक्रिया , संतोरिणी द्वीप के ज्वालामुखी

जापान में आये भयंकर भूकंप और सुनामी के प्रकोप को एक साल बीत चुका है । इस के सन्दर्भ में मैंने यह श्रंखला शुरू की है जिसमे पिछले भाग में हमने देखा की भूकंप कैसे आते हैं  । “टेक्टोनिक” प्लेटें एक दूसरे से जुडी होती हैं , और इस जोड़ पर काफी लम्बे अरसे तक अलग दिशा में/ अलग गति से  हिलने के प्रयास करती रहती हैं । किन्तु अत्यंत शक्तिशाली और महाविशालकाय पत्थरों पर अत्यधिक भार है ।(सातों महाद्वीपों और महासागरों के समुद्रतल इन्ही टेक्टोनिक प्लेटों पर “रखे” हुए है, उन सब का भार इन्ही प्लेटों पर टिका है) । इस अत्यधिक भार के कारण फ्रिक्शन बहुत अधिक है । फ्रिक्शन के कारण हिल पाने में असफल होती प्लेटों पर समयावधि में दबाव इतने अधिक बढ़ जाते हैं कि इस फौल्ट लाइन पर जहां भी पत्थर कुछ कमज़ोर पड़ जाएँ , वहां अचानक टूट जटी हैं, और प्लेटें या तो सरक जाती हैं , या एक दुसरे के ऊपर या नीचे खिसक जाती हैं । इसी से भूकंप आते हैं ।

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इस भाग में हम सुनामी के आने की प्रक्रिया , और संतोरिणी द्वीप के भयंकर ज्वालामुखी को जानने का प्रयास करते हैं । माना जाता है कि यहाँ आया भयंकर विस्फोट तब की Atlantis सभ्यता का विनाशक साबित हुआ था । यहाँ आज भी डर है कि किसी दिन बड़ा भूकंप / ज्वालामुखी विस्फोट हुआ , तो यहाँ से उठी सुनामियां अमेरिका के तटीय शहरों का विनाश कर देंगी । लाखों की संख्या में लोग मारे जायेंगे, क्योंकि ये सुनामी की लहरें ध्वनी तरंगों से बहुत तेज़ गति से सिर्फ छः घंटे में ही अमेरिका पहुँच जायेंगी, इसलिए तटीय क्षेत्रों को खाली करने का समय नहीं होगा  ।

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सुनामी (१)सागर तल में आये भूकंप से, (२)या ज्वालामुखी विस्फोट से, (३)या समुद्र के नीचे हुए अत्यधिक शक्तिशाली परमाणु विस्फोट से , (४)या समुद्र में किसी उल्कापिंड के गिरने से, (५)या फिर या समुद्र के किसी तट पर हुए भूस्खलन से (जिससे भूमि का एक बड़ा हिस्सा समुद्र में गिर गया हो ) शुरू हो सकती है । अधिकतर ये भूकंप से शुरू होती हैं, जैसा कि पिछले साल जापान में हुआ था ।

जब भूकंप का फोकस भूभाग के नीचे हो, तो ऊपर के भूतल पर भूचाल आता है, और वहां के भवन आदि गिर जाते हैं । लेकिन यह फोकस यदि समुद्रतल के नीचे हो, तब उसके ऊपर कोई भवन तो होते नहीं, परन्तु पानी की बहुत बड़ी मात्रा कम्पित हो जाती है ( सिर्फ सागर की उस जगह की गहराई जितना ही आयतन नहीं, बल्कि जितना शक्तिशाली भूकंपन हुआ हो, उतने ही फैले हुए क्षेत्र के जल भाग का सागर तल हिल उठता है , और उसके ऊपर का पानी भी ) । इसके अलावा, समुद्र तल में टनों पानी से दबे हुए sedimentary rocks अत्यधिक दबाव से कभी कभी अचानक ही बदल कर metamorphic में बदलते हैं, जिनका आयतन पहले से बहुत ही कम होता है  ।अचानक आयी इस परिमाण के कमी के कारण भी सागर तल में भूचाल आ सकते हैं ।

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अब सोचिये – जैसे हम पानी में कंकर / या बड़े पत्थर फेंकते हैं, तो वहां से उठती तरंगे गोलाकार में सब दिशाओं को बढती हैं । जितना बड़ा पत्थर – उतनी शक्ति शाली तरंगे, क्योंकि पानी की इलास्टिसिटी हलके पत्थर की छोटी सी ऊर्जा को जल्द ही सोख लेती है । ठीक इसी तरह की तरंगे भूकंप से भी उठती हैं, किन्तु फर्क यह है कि ये तरंगे ऊपर से कंकर गिरने से नहीं , बल्कि नीचे से तले के हिलने से आई हैं, तो इन की शक्ति एक छोटे कंकर के गिरने से बहुत अधिक है । (चित्र विकिपीडिया से साभार )

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सागर तल की टेक्टोनिक प्लेट -१
नीचे पत्थर टूटने से जल का कम्पन, लहर की शुरुआत
लहरों का दोनों ओर बढ़ना

अब ये तरंगे सब दिशाओं में गोल आकर में बढती हैं, जैसे किसी झील में फिंके पत्थर से झील की सतह पर उठी  लहरें हों । लेकिन ये लहरें सिर्फ सतही नहीं हैं, बल्कि पानी का पूरा गहरा कॉलम (स्तम्भ) ही कम्पित है । (एक ऊपर तक भरी बाल्टी को तले से हिला कर देखिये, और दूसरी वैसे ही बाल्टी में ऊपर से कंकर फेंक कर देखिये – किस में से ज्यादा पानी गिरता है ?) ये उठती हुई लहरें कहाँ जायेंगी ? जाहिर है सागर के किनारों की ओर । और कितनी शक्ति के साथ किनारे को चोट पहुंचाएंगी ? जितना वह क्षेत्र भूकंपन के फोकस के नज़दीक होगा ।

ये लहरें गहरे समुद्र में बहुत ऊंची नहीं होतीं , बल्कि इनकी ऊंचाई इतनी कम होती है , कि [आपको आश्चर्य होगा,] एक छोटी सी नाव भी इनके ऊपर आसानी से ride कर सकेगी । उस नाव का कुछ नहीं बिगड़ेगा । लेकिन जैसे जैसे ये किनारे के उथले पानी की ओर आती हैं, तो इतनी बड़ी गहराई की पानी की अत्याधिक मात्रा की जितनी ऊर्जा है, वह अब कम गहरे में कम मात्रा को धकेल रही है । किनारे तक आते हुए तरंग दैर्ध्य (wavelength ) कम होती जाती है और ऊंचाई (amplitude ) बढ़ता है) तो किनारे के उथले पानी पर इनकी उग्रता बहुत बढ़ जाती है, और एक tide (ज्वार भाटा ) की तरह पानी ऊंचा हो जाता है , और ये ऊंची लहरें भूभाग में बहुत भीतर तक , बड़ी ऊंची होकर, और बड़े वेग से घुस आती हैं । इसीलिए इन्हें tsunami या tidal waves भी कहा जाता है ।

एक बड़ी परेशानी यह है की लहर के बढ़ने के सिद्धांत के अनुसार, तट पर पहले लहर का निचला भाग पहुँचता है । इसे “drawback ” कहते हैं – पानी जैसे तट से दूर खिंच जाता है, और तल काफी दूर तक दिखने लगता है । जो लोग यह नहीं जानते की यह क्यों हुआ, वे कौतूहल के कारण वहीँ खड़े रहते हैं, और जब पीछे से ऊंची लहर आती है, तब किसी को भागने का स्थान / समय नहीं मिलता । सुनामी की मार दोहरी होती है – एक तो इतने वेग से पानी की जो लहर अति है उसकी मार, ऊपर से यह ऊंचा पानी शहरों के शहर काफी समय के लिए डुबा देता है । यह चित्र देखिये (विकिपीडिया से साभार) ।

यूरोप और अफ्रीका के बीच के सागर में “santorini ” नाम की जगह है (ग्रीस में )। यह जगह न ही सिर्फ fault line पर है , बल्कि यहाँ सक्रिय शक्तिशाली ज्वालामुखी भी हैं । सदियों पहले यहाँ हुए ज्वालामुखी विस्फोटों के तब की सभ्यता को अचानक समाप्त कर देने का जिम्मेदार भी माना जाता है । कई लोग इसे “Atlantis ” की सभ्यता का विनाशक मानते हैं, की इस महान ज्वालामुखी के विस्फोट से पहाड़ जो ऊपर उठा हुआ था, वह धंस गया, और उस खाली caldera में समुद्र का पानी भर गया । ये जो द्वीप के भीतर घुसा हुआ पानी दिख रहा है – यह ज्वालामुखी का भीतरी भाग है – जिसे caldera कहते हैं । अलग अलग गहराई पर अलग अलग तरह के पत्थर हैं (लावा से बने igneous पत्थर) । माना जाता है की इस land failure और समुद्र में इतनी अधिक मात्रा में भूमि के गिरने से उठी भयंकर सुनामी ने ही atlantis सभ्यता को नष्ट किया । [परन्तु वैज्ञानिकों का मानना है के यह दोनों तारीखें आपस में मेल नहीं खातीं !] यह तस्वीर (विकिपीडिया से साभार) देखिये इस द्वीप की –

यह माना जाता है, कि यह एक oval द्वीप था, जो आज से करीब ३६०० साल पहले आये (धरती के इतिहास के  भयानकतम) ज्वालामुखी विस्फोट से ऐसा हो गया जैसा इस तस्वीर में दिखता है । लिन्क   ३  ४ देखिये

यहाँ कई ज्वालामुखी आज भी सक्रिय हैं, ऊपर से यह एक टेक्टोनिक फॉल्ट लाइन पर भी है । [ हर वह जगह जहां ज्वालामुखी आयें, आवश्यक नहीं की वह भूकंप का केंद्र भी हो ही ]। किन्तु दुर्भाग्य से यह द्वीप ऐसी जगह है कि दोनों ही प्राकृतिक आपदाएं इसके लिए अनपेक्षित नहीं हैं । अभी भी यहाँ इस तरह के घटनाएं चल ही रही हैं – २६ जनवरी को यहाँ ५.३ स्केल का भूकंप आया । यह लिंक देखिये  । ऊपर से बड़ी परेशानी यह है, कि यदि कोई बड़ा हादसा हो, तो चट्टान का एक बड़ा भाग भूस्खलन हो कर सागर में गिर जाएगा । इस इतनी बड़ी चट्टान के समुद्र में गिरने से जो लहरें उठेंगी, उनकी शुरूआती peak to peak ऊंचाई होगी २ किलोमीटर !!!! ये लहरें १००० किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से दौड़ेंगी और एक घंटे में अफ्रीका, साढ़े तीन घंटे में इंग्लैंड, और छः घंटे में अमेरिका के पूर्वी तट पर पहुंचेंगी । तब तक ये “छोटी” हो कर करीब ६० मीटर की हो गयी होंगी । (एक एक-मंजिले घर की ऊंचाई करीब ६ मीटर होती है – तो सोचिये – ६० मीटर ऊंची सुनामी !!!) ये बोस्टन आदि शहरों को तबाह कर सकती हैं । यह लिंक देखिये । माना जाता है की ये करीब २५ किलोमीटर तक भूभाग के भीतर घुस सकती हैं । ऐसा डर है कि अमेरिका के बोस्टन आदि (पूर्वी तटीय) शहरों में शायद करोडो लोग इस त्रासदी में हताहत हो जाएँ,  ।

जहां अमेरिकिय महाद्वीप का पूर्वी तट इस santorini से कारण सुनामी के खतरे को देखता है, वहीँ दूसरी तरह पश्चिमी तट जापान के साथ दूसरी फौल्ट लाइन पर है, तो सुनामी का खतरा वहां भी बना रहता है ।

अगले भाग में हम ज्वालामुखियों पर बात करेंगे ।

जापान का भूकंप – १ : भूकंप आने की प्रक्रिया

जापान के भयंकर भूकंप को एक साल पूरा हो रहा है । यह दुनिया में अब तक का सबसे शक्तिशाली भूकंप के रूप में दर्ज है, जबसे हम भूकम्पों की तीव्रता का आकलन कर के उसे दर्ज करने लगे हैं । न सिर्फ भूकंप, किन्तु उसके कारण आई सुनामी ने जापान को बुरी तरह से प्रभावित किया , और फिर न्यूक्लियर पावर रिएक्टर में भी कण्ट्रोल फेल हुए – जिससे स्थिति और भी बिगड़ गयी । भूकंप आते क्यों हैं ? इनके पीछे कौन से प्राकृतिक तंत्र काम करते हैं ? सुनामी कैसे आती है ? “न्यूक्लियर मेल्ट डाउन ” क्या होता है ? इन सब पर एक नज़र डालते हैं ।

सबसे पहले ( इस भाग में ) भूकंप आने की प्रक्रिया देखते हैं ।

हम सब जानते हैं  कि धरती के भीतर इतनी गर्मी है की वहां कुछ भी ठोस नहीं है । पिघला हुआ शैल्भूत (magma ) हमेशा उबलता रहता है । विज्ञान की theories के अनुसार माना जाता है  कि पहले धरती शायद सूर्य से फिंका हुआ एक जलता पुंज थी जो किसी तरह एक कक्षा में स्थापित हो कर सूर्य की परिक्रमा करने लगी और करोड़ों वर्षो तक घूमते हुए ठंडी होती होती तरल रूप में आई । {आप जानते होंगे कि satellites कैसे भेजे जाते हैं – कि पहले rocket  धरती से “फेंका” जाता है । उसकी शुरूआती गति के अनुसार वह उतने radius (त्रिज्या) की कक्षा में स्थापित हो जाताहै । }फिर जिस तरह उबले दूध पर ऊपरी सतह पर ठंडी होने से मलाई पड़ने लगती है, उसी तरह इस पिघले शैल्भूत पर भी ऊपर “मलाई” सी पड़ने लगी, अर्थात ऊपर की सतह ठोस होने लगी । परन्तु यदि आपने कभी दूध उबाला है, तो आप जानते होंगे कि यह मलाई एक अभंग इकाई (unbroken entity ) नहीं होती, बल्कि अलग अलग मलाई के भाग होते हैं, जिनके बीच में दरारें होती हैं । ( नहीं देखा, तो आज देखिएगा – चाय या दूध उबलने के बाद उसे दो मिनट ठंडा होने दीजियेगा, फिर ध्यान से मलाई को देखिएगा ।)

यह धरती के शैल्भूत की ऊपरी पथरीली सतह धीरे धीरे मोटी होती गयी । हमारी धरती की ४ मुख्य परतें हैं – inner core , outer core , mantle and crust । यह चित्र देखिये ।

layers of earth (courtesy :

धरती का जो crust  है, यह एक पतली खाल की तरह है, जो mantle का ऊपरी हिस्सा है । यह (दूध की मलाई ही की तरह) एक नहीं है, बल्कि अलग अलग टुकड़े हैं – जिन्हें tectonic plates कहते हैं । ये टेक्टोनिक प्लेट्स पिघले हुए magma के ऊपर तैरती हैं । (यदि आप यह सोच रहे हों कि ठोस तरल से भारी होता है तो इन्हें भीतर होना चाहिए – तो याद करें – आपकी car के tyres में high pressure air है, जो कार से “हलकी” होती है – परन्तु अत्यधिक दबाव की वजह से हवा भरे टायर्स कार का भार उठा सकते हैं । इसी तरह धरती के भीतर का पिघला भाग अत्यधिक दबाव वाला है, क्योंकि magma उबल रहा है लगातार । इससे धुआं और भाप (सिर्फ पानी ही की नहीं, बल्कि उबलते हुए कई पदार्थ जिनमे लोहा और कई दूसरे खनिज भी हैं, इन सभी के उबलने से बनता धुआं और भाप अत्यधिक दबाव लिए है ) बनती रहती है और उठने की कोशिश करती रहती है । लेकिन ऊपर जो ठोस परत बन चुकी है – यह उसे बाहर जाने का रास्ता नहीं देती । जब कहीं कोई कमज़ोर स्थान अपनी सहने की सीमा (breaking limit ) तक जा कर टूट जाता है – तो वहां से यह धुआं / भाप / पिघले पत्थर आदि बाहर फूट निकलते हैं – जिसे हम ज्वालामुखी का फूटना कहते हैं । यह magma ठंडा नहीं हो पाता क्योंकि ऊपर की पथरीली ठोस परत ताप (heat ) का bad conductor है । यह भी ध्यान देना होगा कि धरती यदि सच ही में सूर्य से फिंक गया कोई पुंज थी, तब तो भीतर कई तरह के विस्फोट शायद अब भी होते हों ? वैज्ञानिक भी ठीक से नहीं जानते कि भीतर क्या है, क्योंकि भीतर कोई जा तो पाया नहीं है, न ही उपकरण उस पत्थरों को पिघला देने वाली गर्मी में उतारे जा सकते हैं ) इन टेक्टोनिक प्लेट्स के ऊपर ही सारे समुद्रों के तल (sea beds ) और महाद्वीपों (continents ) के भूतल हैं । ये टेक्टोनिक प्लेट्स कुल सात हैं, और जिन दरारों पर ये आपस में जुडी हैं, उन्हें “line of fault ” कहा जाता है । ये प्लेट्स कितनी बड़ी और कितनी भारी होंगी, आप अंदाजा कर सकते हैं, क्योंकि ये सारी धरती के surface area के base हैं, और इनके ऊपर ही सारे महादीप और सारे समुद्र स्थापित हैं । भौतिकी (physics ) के अनुसार friction रगड़ खाते हुई सतहों के बीच relative movement (चाल, गमनागमन ) का विरोध करने वाली शक्ति / force होती है । और यह friction उतना अधिक होता है , जितना द्रव्यमान (mass ) अधिक हो । तो इन टेक्टोनिक प्लेट्स के बीच आपस में बहुत अधिक friction है । 

जब धरती घूमती है (- अपनी धुरी पर भी और सूर्य के आस पास भी -) तो ये प्लेट्स भी घूमते हैं ( ज़रा दूध की भगोनी को संडसी से पकड़ कर घुमाइए ) इन प्लेट्स के घूमने से इनमे relative  motion का भी सतत प्रयास होता रहता है, क्योंकि अलग अलग भार और अलग अलग composition ( संयोजन या बनावट ) होने से इन पर अलग अलग magnetic और gravitational pulls काम करते हैं । अर्थात ये प्लेट्स एक दूसरे के साथ स्थिर नहीं रहना चाहतीं, बल्कि कोई प्लेट तेजी से आगे जाना चाहती है जबकि दूसरी प्लेट कुछ कम तेजी से । तो इनमे आपस में स्थिरता नहीं होनी चाहिए, एक प्लेट आगे बढ़नी चाहिए, जबकि दूसरी पीछे छूटनी चाहिए । परन्तु अत्यधिक friction के कारण ऐसा हो नहीं पाता । ये प्लेट्स आगे पीछे होना तो चाहती हैं, परन्तु हो नहीं पातीं । साल दर साल दर साल दर साल इनके बीच में pressure (दबाव) बढ़ता जाता है, बढ़ता जाता है । फिर एक स्थिति आती है जब , जहां इन प्लेट्स के बीच के जोड़ पर थोड़ी कमजोरी हो (line of fault ) वहां की दरार के बराबर बराबर के पत्थर (छोटे मोटे नहीं – बड़े ही विराट पत्थर) टूट जाते हैं – और ये टूटने से ये परतें अचानक सरक जाती हैं / एक परत दूसरी के ऊपर चढ़ जाती है / एक परत दूसरी के नीचे घुस जाती है । यह तस्वीर देखिये :

जहां पत्थर टूटे वह “focus ” होता है, और उसके ठीक ऊपर की धरती की सतह को “epicentre “कहते हैं । जितने force से यह movement हुई, उसका माप रिचर स्केल (ritcher scale ) पर नापा जाता है (अब यह बदल रहा है ) इस अचानक हुई चाल के कारण धरती काँप जाती है और भूकंप आता है ।

एक और बात – स्केल के बारे में । आप सोचते होंगे शायद कि “magnitude 4 ” (माप ४ ) का भूकंप बड़ा ही साधारण माना जाता है , लोगों को पता तक नहीं चलता कई बार , जबकि ७ का भयंकर – ऐसा क्यों ? तो इसका उत्तर यह है कि ritcher scale  एक logarithmic scale है, अर्थ १ = १०^१, २-१०^२ . इसी अनुपात में मान ७ का एक भूकंप है १०^७ और मानक ९ का अर्थ है १०^९ । इसका एक अंदाज़न अर्थ यह हुआ कि यह २०११ का जापान का ९ मानक वाला भूकंप लातूर के १९९३ के ६.४ मानक वाले भूकंप से करीब करीब ७०० गुना ज्यादा शक्तिशाली था !!!

अगले भाग में सुनामी की प्रक्रिया पर बात करेंगे ।

References :