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japan quake 4 – how volcanoes are formed

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इस श्रुंखला का यह आखरी भाग है । इसके पहले के भागों में हमने () भूकंप आने की प्रक्रिया () और सुनामी आने की प्रक्रिया (  ) देखी, संतोरिणी द्वीप के भयंकर विस्फोट (  ) , और न्यूक्लियर मेल्ट डाउन पर ( 3 ) बात की । इस आखरी भाग में हम ज्वालामुखियों (volcanoes) पर बात करते हैं ।

 

इस पोस्ट में तीन मुख्य भाग हैं – ज्वालमुखी बनने / फूटने की प्रक्रिया; विस्फोट के प्रभाव; और ज्वालामुखियों के प्रकार ।

सभी चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।————————-

ज्वालामुखी की प्रक्रिया :

 

ज्वालामुखी मूल रूप में धरती की ऊपरी सतह crust में टेक्टोनिक प्लेटों तक गहरे उतारे हुए क्रेक्स होते हैं , (देखिये पहला भाग) जिसमे से भीतर का उबलता हुआ मेग्मा अपने अत्यधिक दबाव की वजह से बाहर आ जाता है । यह मैंने पहले भाग मे दूध की मलाई का उदहारण लेकर बताया था ।

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 चाहें तो इस नीले भाग को छोड़ कर आगे बढ़ जाएँ – यह पहले भाग का संक्षिप्त सार है (सिर्फ ज्वालामुखी के सन्दर्भ में ):

 

चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।

 

धरती के भीतर अत्यधिक गर्मी और दबाव है, जिसकी वजह से सब कुछ पिघला हुआ है । पिघले हुए द्रव्य को धरती के हज़ारों वर्षों तक लगातार घूमने से ठंडा होने का मौका मिला , और ऊपर की सतह ठंडी हो कर मलाई की तरह जम गयी । परन्तु मलाई ही की तरह – यह एक टुकड़े में नहीं जमी बल्कि इस के अलग अलग सात मुख्य टुकड़े हैं – जिन्हें हम टेक्टोनिक प्लेट्स कहते हैं। ये टेक्टोनिक प्लेटें सख्त पत्थर जैसी थीं, जो हजारों वर्षों धूप की गर्मी से फैलने और सिकुड़ने की प्रक्रिया से पहले क्रैक हुई, फिर टूट कर छोटे (?) आकार में परिवर्तित हुई । हवा, धूप, बारिश आदि के लगातार प्रभाव से धीरे धीरे रेत और मिटटी आदि बने । परन्तु हम जो भी ऊपर देखते हैं, यह सिर्फ कुछ ही किलो मीटर गहरा है । नीचे सब कुछ इन टेक्टोनिक प्लेटों पर ही “रखा” हुआ है । सारे समुद्रों के सागरतल भी, और सारे महाद्वीपों के भूतल भी – इन्ही टेक्टोनिक प्लेटों पर टिके हैं । और ये टेक्टोनिक प्लेटें तैर रही हैं भीतर के पिघले मेग्मा पर । जब ये टेक्टोनिक प्लेटें एक दूसरे से आगे/ पीछे आदि खिसकना चाहती हैं, तो अत्यधिक भार (ऊपर महाद्वीप और समुद्रों का भार है ) के कारण अत्यधिक फ्रिक्शन होता है – और ये सरक नहीं पातीं । जब कई सौ साल गुज़रते हुए दबाव बहुत बढ़ जाए – तो कमज़ोर पड़ जाने वाले जोड़ पर पत्थर टूट जाते हैं और प्लेटें अचानक सरक जाती हैं । इसी से भूकंप आते हैं ।

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कहीं कही इन टेक्टोनिक प्लेटों के बीच में क्रेक्स भी हैं, जहां से नीचे का माग्मा कभी कभी बाहर उबल आता है । यही ज्वालामुखी का रूप लेता है । परन्तु यह तीन तरह के कॉम्बिनेशन हो सकते हैं

 

1, सिर्फ भूकंप – कहाँ ? जहां टेक्टोनिक प्लेटें खिसकें, परन्तु मेग्मा बाहर न आये ।

 

2. सिर्फ ज्वालामुखी – जहां मेग्मा बाहर आने योग्य क्रैक तो हो, परन्तु दबाव इतना न हो की प्लेट खिसक सके। यहाँ, या तो एक प्लेट दूसरी के नीचे को खिसकती है ( और नीचे के मैंटल की गर्मी से पत्थर पिघल कर मेग्मा बनने लगते हैं ) या फिर प्लेटें एक दुसरे से दूर खिसकती हैं, जिससे क्रैक बनते हैं और चौड़े हो जाते हैं – जिनसे नीचे का लावा बाहर आने का रास्ता पा जाता है ।

 

3. सबसे डेंजरस है वह कोम्बिनेशन जहां ये दोनों एक साथ होने की संभावना बने – इन्हें “thermal plume” कहा जाता है । शायद ये क्रैक इतने मोटे हैं / इनकी झिर्रियाँ किसी कुँए की झिर्रियों की ही तरह आस पास फ़ैली हुई है, जिससे पिघला हुआ मेग्मा इधर उधर फ़ैल कर टेक्टोनिक प्लेटों के जोड़ों को लुब्रिकेट कर रहा है । इससे टेक्टोनिक प्लेटों के बीच फ्रिक्शन कम होता है । तो ज्वालामुखी और भूकम्प दोनों ही आते है ऐसी जगहों पर । भाग दो मे हमने जिस सेंटोरिनी के बारे में बात के – ऐसा ही “thermal plume” है ।

 

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ज्वालामुखियों के प्रभाव :

आम तौर पर ऐसा लगता है की ज्वालामुखी उतने विनाशकारी न होते होंगे जितने भूकंप – क्योंकि उनका असर सिर्फ उस भूभाग तक होता होगा- जितने में लावा बह कर जाए । परन्तु ऐसा है नहीं ।

 

1.

ज्वालामुखी से सिर्फ लावा ही नहीं निकलता, साथ ही भीतर की जहरीली गैस, एसिड (जिससे काफी बड़े क्षेत्र में एसिड रेन का भय होता है ), राख और धुआं आदि भी वातावरण में बड़े ही उच्च चाप से फिंकते हैं (poisonous gases, acid, ash and smoke)। यह सब वातावरण में फ़ैल जाता है । जो पिघले पत्थर हैं – वे एक नदी की तरह बह निकलते हैं । साथ ही (- जैसे दूध उबल कर गिरे तो सिर्फ दूध बहता ही नहीं, बल्कि दूध की नन्ही नन्ही महीन सी बूँदें भी उछलती हैं हवा में, जो इतनी छोटी होती हैं की दिखती नहीं – किन्तु होती तो हैं, और पूरे प्लेटफोर्म पर दूध के छीटें दिखने लगते हैं ) पिघले माग्मा (magma) की महीन बूंदे भी बड़े वेग से आसमान में फिंक जाती हैं । ये इतनी छोटी हैं कि बड़ी जल्दी जम जाती हैं और हवा में ही धूल बन जाती हैं ।

 

 

 

 

 

 

चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।

 

2.

जो कुछ मोटी हों – वे धूल / मिटटी (dust) के मोटे कण बनाती हैं – जो अपने वजन की वजह से धीरे धीरे नीचे बैठ जाती हैं । परन्तु अत्यधिक छोटे धूल के कण बैठते नहीं – वातावरण में ही रहते हैं । ये इतने महीन हैं – की ये हवाई जहाज़ों के air conditioning filters के पार निकल जाते हैं । इससे हवाई जहाज़ों के संयंत्र फेल हो कर क्रैश हो सकता है । इसके अलावा यह फैली हुई धूल कई महीनों तक आस पास के बहुत बड़े क्षेत्र में लोगों को सांस की तकलीफ (दमा आदि) और किडनी की भी – क्योंकि यह धुल हमारी साँसों से फेफड़ों से होकर खून तक पहुँच सकती है । 2010 में आइसलैंड में जो ज्वालामुखी फूटा था – उसकी वजह से महीने से ज्यादा वक़्त ता यूरोप पर से हवाई उड़ानें डिस्टर्ब हो गयी थीं । indoneshia में विस्फोट के बाद बरसों तक इस धूल ने दुनिया को रंग बिरंगे सूर्योदय और सूर्यास्त दिखाए ।

 

3.

कई बार ज्वालामुखी फटने से भीतर का मेग्मा बाहर निकलने से भीतर खोखलापन आ जाता है – और उस पहाड़ की (या आस पास की ) धरती धंस (volcanic collapse )जाती है । इसे caledra कहते हैं । कई बार इस गड्ढे में लावा भर जाता है और जम जाता है ।

 

4.

यदि पहाड़ ऊंचा था और उस पर बर्फ जमी थी – तो पिघले गर्म पत्थर जब टनों बर्फ से मिलते हैं – तो क्षण भर में बर्फ पिघल जाती है, और लावा ठोस मिटटी में बदल जाता है । इससे लावा की छोटी नदी के बजाये सारे ही पिघली बर्फ की कीचड भरी गर्म नदी बाढ़ की तरह अचानक ही आ जाती है – और रास्ते में आये हर गाँव और शहर को नेस्तनाबूत कर देती है । इसे mud slide कहते हैं ।

 

 

 

चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।

 

5.

लावा का बहाव तो खैर सब जानते ही हैं की विनाशकारी है ही ।

 

 

 

चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।

 

ये सभी वजहें इतिहास में महाविनाश का कारण बनी हैं ।

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ज्वालामुखियों के प्रकार :

 

चार मुख्य तरह के ज्वालामुखी होते हैं – cinder cones, composite volcanoes, shield volcanoes, और lava domes. ज्वालामुखियों को active (जो लगातार फूटते रहते हैं ) , intermitent (जो फूटता रहता है परन्तु लगातार नहीं ) dormant (जो काफी समय से नहीं फूटा, लेकिन फूटने की अपेक्षा है ) और extinct (मृत – जो जबसे इतिहास की जानकारी है तब से अब तक कभी नहीं फूटा, इसलिए मान लिया गया कि अब न फूटेगा ) मानते हैं – लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें “मृत” घोषित किया जा चुका था – परन्तु ये फिर से फट पड़े!!

 

समुद्र के तल में कई जगह ऐसे क्रैक हैं जो भूभाग के ज्वालामुखी की तरह अचानक नहीं फटते , बल्कि लगातार थोडा थोडा रिसते रहते हैं । इनसे निकला लावा जमता रहता है और नए सागरतल का निर्माण होता रहता है । कई द्वीप भी ऐसे बने हैं ।

 

यहाँ एक सारिणी है – इतिहास के सबसे विनाशकारी ज्वालामुखी विस्फोटों की । कुछ विशेषज्ञ मानते हैं की अटलेटिस सभ्यता का सर्वनाश वोल्कनिक इरप्शन से हुआ । ऊंचे बर्फ से दबे ज्वालामुखी में विस्फोट से टनों बर्फ पिघली और कीचड की बहती नदी (बाढ़) ने पूरे शहरों को ढँक दिया । जो जहां जैसे था – जम गया उस कीचड के नीचे । परन्तु यह सच है या नहीं इसका कोई प्रमाण नहीं है । इंडोनेशिया के krakatoa ज्वालामुखी के भयंकर विस्फोट से वह पूरा द्वीप धंस गया और समुद्र में डूब गया – यहाँ के निवासी तो खैर समुद्र की भेंट चढ़ ही गए, साथ ही इससे उठी सुनामी ने और भी कई द्वीपों पर भयंकर तबाही की ।

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जापान का भूकंप – ३ : न्यूक्लियर मेल्ट डाउन – क्या और कैसे

जापान का भूकंप ३ : ज्वालामुखी

पिछले भागों ( ) में हमने भूकंप आने की प्रक्रिया ()  और सुनामी आने की प्रक्रिया (  ) देखी, संतोरिणी द्वीप के भयंकर विस्फोट की बात की  (  ) , अब इस भाग में न्यूक्लियर मेल्ट डाउन पर बात करते हैं | अगले (आखरी ) भाग में ज्वालामुखियों पर बात करेंगे ।

मार्च २०११ में आये जापानी भूकंप के समय वहां के फुकुशिमा न्यूक्लियर पावर प्लांट में कुछ हिस्सों में धमाके हो रहे थे और यह आशंका थी की कही न्यूक्लियर मेल्ट डाउन न हो जाए , कहीं चर्नोबिल जैसी त्रासदी न देखने में आये । यह होता क्या है ? इस पोस्ट में समझने का प्रयास करते हैं ।

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बिजली बनाने की प्रक्रिया वही होती है जो आमतौर पर बाज़ार में generator में होती है । जैसा मैंने पहले मेटर एंटी मेटर वाली पोस्ट में कहा था – ऊर्जा में principle of coservation of energy काम करता है – अर्थात ऊर्जा दूसरी तरह की ऊर्जा में बदल सकती है परन्तु विनष्ट नहीं हो सकती । जैसे कोयले में भरी रासायनिक ऊर्जा उसके जलने से गर्मी में बदलती है – जिससे पानी उबाला जाता है – इस उबलते पानी की शक्ति से विशाल dynamo घूमते हैं – जिससे बिजली बनती है (thermal power)। या फिर किसी बाँध में ऊँचाई से गिरते पानी से – hydal power । जनरेटर में पेट्रोल जलने से । हवा से चकरी घूमे – तो wind power आदि ।

अब जो nuclear power प्लांट होते हैं – वहां भी विशालकाय केतलियों में पानी उबाला जाता है – लेकिन यह गर्मी कोयले आदि को जला कर नहीं, बल्कि आणविक विखंडन से आती है । उसी पोस्ट में हमने यह भी चर्चा की थी की पदार्थ में भी  principle of coservation of matter काम करता है – तो पदार्थ एक से दूसरे जोड़ और गठबन्धनों में तो जा सकता है (2H +1O = 1H2O ) किन्तु न तो बन सकता है न ही विनष्ट हो सकता है । जब ये गठबंधन बनते बदलते हैं (chemical reactions ) तब या तो ऊर्जा भीतर को सोखी जाती है, या बाहर निकलती है ।

किन्ही विशिष्ट परिस्थितियों में कुछ पदार्थ ऊर्जा में बदल सकते हैं । एक ग्राम पदार्थ से ४५,०००,०००,०००,०००,००० जूल ऊर्जा मिल सकती है , आणविक अभिक्रियाओं से !!!

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Background information (इसमें रूचि न हो तो इस नीले हिस्से को छोड़ कर आगे पढ़ें )

साधारण तौर पर पदार्थ मिश्रण (mixtures ) हैं – जैसे समुद्र का पानी । इन मिश्रणों को (उदहारण पानी और नमक ) को भौतिक प्रक्रियाओं (physical processes ) द्वारा अलग अलग किया जाए तो सत्व (pure substance ) मिलते हैं – जो या तो शुद्ध तत्व (elements ) हैं, या उनके संयोजन (compounds ) । नमकीन पानी को अलग किया जाए distillation द्वार तो पानी (H2O ) और नमक (NaCl ) मिलेगा । संयोजनों को आगे तोडना हो, तो भौतिक (physical ) नहीं, बल्कि रासायनिक (chemical ) प्रोसेस चाहिए । शुद्ध तत्त्व परमाणुओं (atoms ) से और संयोजन अणुओं (molecules ) से बने हैं (जैसे पानी के एक molecule में दो हाईड्रोजन और एक ओक्सिजन atom होते हैं , नमक में एक सोडियम और एक क्लोरिन ) ।


इन परमाणुओं के भीतर न्यूक्लियस में भारी कण प्रोटोंस और न्यूट्रोंस हैं, और बाहर हलके इलेक्ट्रोंस घूम रहे हैं । 


साधारण रासायनिक प्रतिक्रियाओं में न्यूक्लियस बिना किसी बदलाव के वैसा ही बना रहता है – जबकि बाहरी इलेक्ट्रोन एक से दूसरे परमाणु में जुड़ सकते हैं । इससे भिन्न तत्त्व एक दूसरे से जुड़ कर नए संयोजन बनाते हैं (जैसे Na + Cl = NaCl अर्थात सोडियम और क्लोरिन का एक एक परमाणु जुड़ कर नमक का एक अणु बनता है ) यह प्रक्रिया मैंने यहाँ समझाई थी ।


किन्तु आणविक अभिक्रियाओं में (nuclear reactions में ) न्यूक्लियस का ही या तो विखंडन (fission ) या संयोजन (fusion ) होता है । इससे वह तत्त्व या तो दूसरे तत्त्व में बदलता है (यहाँ देखें ), या फिर अपने ही दूसरे आयसोटोप में (यहाँ देखें)। जब यह होता है – तो अत्यधिक ऊर्जा बनती है । यही ऊर्जा (गर्मी के रूप में ) बाहर निकलती है – जिसे अलग अलग रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है ।

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Nuclear Power Plant Working in simple language :


सभी चित्र गूगल इमेजेस से साभार : किसी भी चित्र को बड़ा देखने / लेबल पढने को, उस पर क्लीक करें )

१. न्यूक्लियर प्रतिक्रिया :

न्यूक्लियर पावर प्लांट में परमाणु के fission विखंडन ( fusion या संलयन का इस्तेमाल अक्सर नहीं किया जाता ) से प्राप्त ऊर्जा इस्तेमाल की जाती है । अधिकतर प्लांट्स में ईंधन के रूप में युरेनियम २३५ का इस्तेमाल होता है । प्रतिक्रिया से बहुत तेज़ गति पर न्यूट्रोन निकलते हैं – जो इस प्रक्रिया को लगातार आगे बढाते हैं । इसके अलावा गर्मी के रूप में ऊर्जा निकलती है । इस प्रक्रिया की गति को कम ज्यादा करने के लिए लेड या कैडमियम के रोड्स कण्ट्रोल करने के लिए होतेहैं । यह चित्र देखिये :

२. कोर, fuel रोड व् कण्ट्रोल रोड :


यह प्लांट का कोर (core ) या रिएक्टर वेसेल है जिसमे हरे रोड्स लेड या कैडमियम जैसे पदार्थों के कण्ट्रोल रोड (control rod ) हैं जो न्यूट्रोन को सोख कर आणविक प्रतिक्रिया को धीमा करते है । कोर वेसेल मेटल की है, और यह पूरा अरेंजमेंट concrete tower के भीतर है (ऊपर चित्र देखिये)। लाल रोड युरेनियम के (ईंधन या fuel rod ) हैं जो विखंडित हो रहा है और ऊर्जा और न्युत्रोंस को जन्म दे रहा है । प्रक्रिया की गति बढानी हो तो ईंधन के रोड अधिक और कण्ट्रोल रोड कम पेवस्त किये जाते हैं, और घटानी हो तो इसका उल्टा । आकस्मित स्थिति (emergency ) में कण्ट्रोल रोड पूरी तरह भीतर गिर जाते हैं, जिससे प्रतिक्रिया पूरी तरह रोकी जा सके । इससे एक fuel rod से दुसरे तक न्यूट्रोन का प्रवाह रुक जाता है – जिससे जो भी विखंडन हो रहा हो, वह हर एक रोड के भीतर ही सीमित हो जाता है – एक से दूसरे fuel rod तक न्यूट्रोन नहीं पहुँच पाते और क्रिटिकल मास से कम होने से एक रोड इस प्रक्रिया को बनाये नहीं रख पाता  ।

३. पानी :

यह सब कुछ पूरी तरह से पानी में डूबा हुआ है (हेवी वाटर) । यहाँ पानी के दो मुख्य काम हैं । एक तो यह न्युत्रोनों की अत्यधिक गति को कुछ धीमा करता है । यदि ऐसा न किया जाए – तो न्यूट्रोन जितनी तेज गति से चले हैं – वे अगले रोड के युरेनियम एटम के न्यूक्लियस से सीधे ही निकल जायेंगे , उसमे फ़िजन की शुरुआत किये बिना ही । इससे प्रतिक्रिया एक तो आगे नहीं बढ़ेगी, दूसरे ये रेडियो एक्टिविटी को बाहरी पर्यावरण तक पहुंचा देगा ।

पानी का दूसरा काम यह है कि यह प्रतिक्रिया से निकलती हुई गर्मी को सोखता है । और इसे ट्रान्सफर करता है । यह गर्मी आगे भाप बनाने में काम आती है । ध्यान दीजिये यह कोर का पानी बाहर नहीं निकल रहा है । यही पानी गर्मी को काम में लेने के बाद फिर से ठंडा कर के भीतर पहुंचाया जाता है । यानी यह इसी closed loop में recirculate होता रहता है – बाहर नहीं जाता ।

इन तेज़ गति के न्युत्रोंस को सोख लेने से पानी के हाइड्रोजन परमाणु अपने भारी आयसोटोप ड्युटेरियम और ट्रीटियम (लिंक देखिये ) में परिवर्तित हो जाते हैं – जिससे पानी हेवी और सुपर हेवी पानी में परिवर्तित हो जाता है । यह भी रेडिओ एक्टिव है क्योंकि ये दोनों ही आयसोटोप स्टेबल नहीं हैं । इस पानी का डिस्पोसल बड़ी सावधानी से करना होता है।

ऊपर चित्र में देखिये । हलके नीले रंग के पाइप में जो पानी बह रहा है , वह कोर में से हो कर गुज़र रहा है। कोर में यह गर्म हो जाता है । फिर हीट एक्सचेंजर में यह गर्मी गाढे नीले पाइप में घूमते ठन्डे पानी को दे दी जाती है । यह पानी कूलिंग टावर में फिर ठंडा कर के रेसर्कुलेट होता है ।

दो तरह के रिएक्टर होते हैं – प्रेशराइज़्ड वाटर रिएक्टर, और बोइलिंग वाटर रिएक्टर ।

४. प्रेषराइज्ड वाटर रिएक्टर :

कोर का भारी (हेवी ) पानी (जो रेडिओ एक्टिव है) अत्यधिक प्रेशर पर रखा जाते है । तो यह १०० डिग्री पर भी उबल कर भाप (gas ) नहीं बनता , बल्कि तरल (liquid ) ही बना रहता है ।  इस पानी की गर्मी हीट एक्सचेंजर में नॉन रेडिओ एक्टिव पानी को जाती है । वह पानी उबल कर “सुपर हीटेड स्टीम ” (super heated steam ) बनाता है – जिससे विशाल turbine (टर्बाइन) घूमती हैं और बिजली बनती है । यह चित्र देखिये :

ध्यान दीजिये कि टर्बाइन गाढे नीले पानी के पाइप पर है, कोर वाले हलके नीले पाइप पर नहीं है ।

५. बोइलिंग वाटर रिएक्टर :

अब यह चित्र देखिये :

जैसा कि चित्र में साफ़ दिख ही रहा है – टर्बाइन इस बार कोर वाले पानी से ही चल रही है । कोर का पानी खुद ही वहां की गर्मी से उबल कर स्टीम बन रहा हा और टर्बाइन को घुमा रहा है । इसके बाद इसे हीट एक्सचेंजर में ठंडा कर के वापस भेजा जा रहा है ।

इस तरह के प्लांट में फायदा यह है कि कोर के पानी को प्रेशराइज़ करने का खर्चा बच जाता है । लेकिन बहुत बड़ा नुकसान भी है कि रेडिओ एक्टिव पानी ही स्टीम बन रहा है, जिससे टर्बाइन भी contaminate हो जाती है ।इस कंटामिनेशन के कारण जब प्लांट को dismantle  किया जाएगा – तब रेडिओ एक्टिव कॉम्पोनेन्ट ज्यादा होने से अधिक खतरा और खर्चा होगा ।

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अब आते हैं न्यूक्लियर मेल्ट डाउन के होने की प्रक्रिया पर ।

१.

इमरजेंसी की स्थिति में कण्ट्रोल रोड्स पूरी तरह अन्दर गिर जाते हैं, और न्यूट्रोन एक से दूसरे ईंधन रोड तक नहीं पहुँच पाते । इससे आणविक विखंडन की प्रक्रिया तकरीबन बंद सी हो जाती है । हर एक रोड क्रिटिकल मास (critical mass ) से कम है – तो विखंडन बंद सा हो जाता है । तो आणविक विस्फोट का भय बिलकुल नहीं रहता । जापान में भी यही हुआ था ।

२.

किन्तु, भीतर जो युरेनियम रोड्स हैं – वे अपने आप में अत्यधिक गर्म हैं । इन्हें लगातार सर्कुलेट होते पानी से ठंडा रखना आवश्यक है । इसके लिए पानी के पम्प लगातार काम करते रहने चाहिए ।

३.

यदि पानी सर्कुलेट न हो, या पम्प काम न करें, तो कोर के भीतर का हेवी वाटर उबलने लगेगा और पानी कम होता जाएगा, स्टीम प्रेशर बढ़ता जाएगा । इस पानी की भाप से टावर में विस्फोट हो सकता है (आणविक नहीं – भाप के प्रेशर का विस्फोट ) । इसलिए ये पम्प न सिर्फ बिजली के में सप्लाई से जुड़े होते हैं, बल्कि इनका अपना एक जनरेटर भी होता है । यदि मुख्य बिजली बंद हो भी जाए – तो भी इस जनरेटर की बिजली से यह पानी के पम्प काम करते हैं और कोर में पानी का बहाव होता रहता है ।

४. 

इस तरह पानी कम होने से युरेनियम रोड हवा से एक्सपोज़ होंगी, और ठंडी नहीं हो पाएंगी । अब अपनी ही गर्मी से यह पिघलने लगेंगी । गर्मी अत्यधिक बढ़ जाए तो ये पिघल कर कोर वेसेल को भी पिघला सकती है, और पिघली हुई धातु एक दूसरे के साथ बह आने से फिर से क्रिटिकल मास तक पहुँच कर फिर से विखंडन शुरू हो सकता है ।

{ fukushima japan (फुकुशीमा जापान ) में एक तो भूकंप और दूसरे सुनामी के चलते यही हुआ कि दोनों ही supply बंद हो गयीं और pump ने काम करना बंद कर दिया था । वहां के कई वर्कर्स ने अपनी जान की परवाह न करते हुए (रेडिओ एक्टिव एक्सपोज़र ) वहां से बाहर आने से इंकार कर दिया था और भीतर ही रह कर अपनी क़ुरबानी दे कर प्रयास किये कि डिजास्टर को ताला जाए । बाद में समुद्र में जहाजो से समुद्र का पानी pump कर के कोर को ठंडा किया गया । }

५. 

यदि इस गर्मी से वेसेल भी पिघल जाए – तो भीतर का रेडिओ एक्टिव पिघला पदार्थ बाहरी पर्यावरण तक पहुँच जाएगा और पर्यावरण में रेडिओ एक्टिव प्रदूषण बुरी तरह से फ़ैल जाएगा । इसे ही nuclear meltdown कहते हैं ।

जापान का भूकंप -२ :सुनामी की प्रक्रिया , संतोरिणी द्वीप के ज्वालामुखी

जापान में आये भयंकर भूकंप और सुनामी के प्रकोप को एक साल बीत चुका है । इस के सन्दर्भ में मैंने यह श्रंखला शुरू की है जिसमे पिछले भाग में हमने देखा की भूकंप कैसे आते हैं  । “टेक्टोनिक” प्लेटें एक दूसरे से जुडी होती हैं , और इस जोड़ पर काफी लम्बे अरसे तक अलग दिशा में/ अलग गति से  हिलने के प्रयास करती रहती हैं । किन्तु अत्यंत शक्तिशाली और महाविशालकाय पत्थरों पर अत्यधिक भार है ।(सातों महाद्वीपों और महासागरों के समुद्रतल इन्ही टेक्टोनिक प्लेटों पर “रखे” हुए है, उन सब का भार इन्ही प्लेटों पर टिका है) । इस अत्यधिक भार के कारण फ्रिक्शन बहुत अधिक है । फ्रिक्शन के कारण हिल पाने में असफल होती प्लेटों पर समयावधि में दबाव इतने अधिक बढ़ जाते हैं कि इस फौल्ट लाइन पर जहां भी पत्थर कुछ कमज़ोर पड़ जाएँ , वहां अचानक टूट जटी हैं, और प्लेटें या तो सरक जाती हैं , या एक दुसरे के ऊपर या नीचे खिसक जाती हैं । इसी से भूकंप आते हैं ।

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इस भाग में हम सुनामी के आने की प्रक्रिया , और संतोरिणी द्वीप के भयंकर ज्वालामुखी को जानने का प्रयास करते हैं । माना जाता है कि यहाँ आया भयंकर विस्फोट तब की Atlantis सभ्यता का विनाशक साबित हुआ था । यहाँ आज भी डर है कि किसी दिन बड़ा भूकंप / ज्वालामुखी विस्फोट हुआ , तो यहाँ से उठी सुनामियां अमेरिका के तटीय शहरों का विनाश कर देंगी । लाखों की संख्या में लोग मारे जायेंगे, क्योंकि ये सुनामी की लहरें ध्वनी तरंगों से बहुत तेज़ गति से सिर्फ छः घंटे में ही अमेरिका पहुँच जायेंगी, इसलिए तटीय क्षेत्रों को खाली करने का समय नहीं होगा  ।

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सुनामी (१)सागर तल में आये भूकंप से, (२)या ज्वालामुखी विस्फोट से, (३)या समुद्र के नीचे हुए अत्यधिक शक्तिशाली परमाणु विस्फोट से , (४)या समुद्र में किसी उल्कापिंड के गिरने से, (५)या फिर या समुद्र के किसी तट पर हुए भूस्खलन से (जिससे भूमि का एक बड़ा हिस्सा समुद्र में गिर गया हो ) शुरू हो सकती है । अधिकतर ये भूकंप से शुरू होती हैं, जैसा कि पिछले साल जापान में हुआ था ।

जब भूकंप का फोकस भूभाग के नीचे हो, तो ऊपर के भूतल पर भूचाल आता है, और वहां के भवन आदि गिर जाते हैं । लेकिन यह फोकस यदि समुद्रतल के नीचे हो, तब उसके ऊपर कोई भवन तो होते नहीं, परन्तु पानी की बहुत बड़ी मात्रा कम्पित हो जाती है ( सिर्फ सागर की उस जगह की गहराई जितना ही आयतन नहीं, बल्कि जितना शक्तिशाली भूकंपन हुआ हो, उतने ही फैले हुए क्षेत्र के जल भाग का सागर तल हिल उठता है , और उसके ऊपर का पानी भी ) । इसके अलावा, समुद्र तल में टनों पानी से दबे हुए sedimentary rocks अत्यधिक दबाव से कभी कभी अचानक ही बदल कर metamorphic में बदलते हैं, जिनका आयतन पहले से बहुत ही कम होता है  ।अचानक आयी इस परिमाण के कमी के कारण भी सागर तल में भूचाल आ सकते हैं ।

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अब सोचिये – जैसे हम पानी में कंकर / या बड़े पत्थर फेंकते हैं, तो वहां से उठती तरंगे गोलाकार में सब दिशाओं को बढती हैं । जितना बड़ा पत्थर – उतनी शक्ति शाली तरंगे, क्योंकि पानी की इलास्टिसिटी हलके पत्थर की छोटी सी ऊर्जा को जल्द ही सोख लेती है । ठीक इसी तरह की तरंगे भूकंप से भी उठती हैं, किन्तु फर्क यह है कि ये तरंगे ऊपर से कंकर गिरने से नहीं , बल्कि नीचे से तले के हिलने से आई हैं, तो इन की शक्ति एक छोटे कंकर के गिरने से बहुत अधिक है । (चित्र विकिपीडिया से साभार )

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सागर तल की टेक्टोनिक प्लेट -१
नीचे पत्थर टूटने से जल का कम्पन, लहर की शुरुआत
लहरों का दोनों ओर बढ़ना

अब ये तरंगे सब दिशाओं में गोल आकर में बढती हैं, जैसे किसी झील में फिंके पत्थर से झील की सतह पर उठी  लहरें हों । लेकिन ये लहरें सिर्फ सतही नहीं हैं, बल्कि पानी का पूरा गहरा कॉलम (स्तम्भ) ही कम्पित है । (एक ऊपर तक भरी बाल्टी को तले से हिला कर देखिये, और दूसरी वैसे ही बाल्टी में ऊपर से कंकर फेंक कर देखिये – किस में से ज्यादा पानी गिरता है ?) ये उठती हुई लहरें कहाँ जायेंगी ? जाहिर है सागर के किनारों की ओर । और कितनी शक्ति के साथ किनारे को चोट पहुंचाएंगी ? जितना वह क्षेत्र भूकंपन के फोकस के नज़दीक होगा ।

ये लहरें गहरे समुद्र में बहुत ऊंची नहीं होतीं , बल्कि इनकी ऊंचाई इतनी कम होती है , कि [आपको आश्चर्य होगा,] एक छोटी सी नाव भी इनके ऊपर आसानी से ride कर सकेगी । उस नाव का कुछ नहीं बिगड़ेगा । लेकिन जैसे जैसे ये किनारे के उथले पानी की ओर आती हैं, तो इतनी बड़ी गहराई की पानी की अत्याधिक मात्रा की जितनी ऊर्जा है, वह अब कम गहरे में कम मात्रा को धकेल रही है । किनारे तक आते हुए तरंग दैर्ध्य (wavelength ) कम होती जाती है और ऊंचाई (amplitude ) बढ़ता है) तो किनारे के उथले पानी पर इनकी उग्रता बहुत बढ़ जाती है, और एक tide (ज्वार भाटा ) की तरह पानी ऊंचा हो जाता है , और ये ऊंची लहरें भूभाग में बहुत भीतर तक , बड़ी ऊंची होकर, और बड़े वेग से घुस आती हैं । इसीलिए इन्हें tsunami या tidal waves भी कहा जाता है ।

एक बड़ी परेशानी यह है की लहर के बढ़ने के सिद्धांत के अनुसार, तट पर पहले लहर का निचला भाग पहुँचता है । इसे “drawback ” कहते हैं – पानी जैसे तट से दूर खिंच जाता है, और तल काफी दूर तक दिखने लगता है । जो लोग यह नहीं जानते की यह क्यों हुआ, वे कौतूहल के कारण वहीँ खड़े रहते हैं, और जब पीछे से ऊंची लहर आती है, तब किसी को भागने का स्थान / समय नहीं मिलता । सुनामी की मार दोहरी होती है – एक तो इतने वेग से पानी की जो लहर अति है उसकी मार, ऊपर से यह ऊंचा पानी शहरों के शहर काफी समय के लिए डुबा देता है । यह चित्र देखिये (विकिपीडिया से साभार) ।

यूरोप और अफ्रीका के बीच के सागर में “santorini ” नाम की जगह है (ग्रीस में )। यह जगह न ही सिर्फ fault line पर है , बल्कि यहाँ सक्रिय शक्तिशाली ज्वालामुखी भी हैं । सदियों पहले यहाँ हुए ज्वालामुखी विस्फोटों के तब की सभ्यता को अचानक समाप्त कर देने का जिम्मेदार भी माना जाता है । कई लोग इसे “Atlantis ” की सभ्यता का विनाशक मानते हैं, की इस महान ज्वालामुखी के विस्फोट से पहाड़ जो ऊपर उठा हुआ था, वह धंस गया, और उस खाली caldera में समुद्र का पानी भर गया । ये जो द्वीप के भीतर घुसा हुआ पानी दिख रहा है – यह ज्वालामुखी का भीतरी भाग है – जिसे caldera कहते हैं । अलग अलग गहराई पर अलग अलग तरह के पत्थर हैं (लावा से बने igneous पत्थर) । माना जाता है की इस land failure और समुद्र में इतनी अधिक मात्रा में भूमि के गिरने से उठी भयंकर सुनामी ने ही atlantis सभ्यता को नष्ट किया । [परन्तु वैज्ञानिकों का मानना है के यह दोनों तारीखें आपस में मेल नहीं खातीं !] यह तस्वीर (विकिपीडिया से साभार) देखिये इस द्वीप की –

यह माना जाता है, कि यह एक oval द्वीप था, जो आज से करीब ३६०० साल पहले आये (धरती के इतिहास के  भयानकतम) ज्वालामुखी विस्फोट से ऐसा हो गया जैसा इस तस्वीर में दिखता है । लिन्क   ३  ४ देखिये

यहाँ कई ज्वालामुखी आज भी सक्रिय हैं, ऊपर से यह एक टेक्टोनिक फॉल्ट लाइन पर भी है । [ हर वह जगह जहां ज्वालामुखी आयें, आवश्यक नहीं की वह भूकंप का केंद्र भी हो ही ]। किन्तु दुर्भाग्य से यह द्वीप ऐसी जगह है कि दोनों ही प्राकृतिक आपदाएं इसके लिए अनपेक्षित नहीं हैं । अभी भी यहाँ इस तरह के घटनाएं चल ही रही हैं – २६ जनवरी को यहाँ ५.३ स्केल का भूकंप आया । यह लिंक देखिये  । ऊपर से बड़ी परेशानी यह है, कि यदि कोई बड़ा हादसा हो, तो चट्टान का एक बड़ा भाग भूस्खलन हो कर सागर में गिर जाएगा । इस इतनी बड़ी चट्टान के समुद्र में गिरने से जो लहरें उठेंगी, उनकी शुरूआती peak to peak ऊंचाई होगी २ किलोमीटर !!!! ये लहरें १००० किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से दौड़ेंगी और एक घंटे में अफ्रीका, साढ़े तीन घंटे में इंग्लैंड, और छः घंटे में अमेरिका के पूर्वी तट पर पहुंचेंगी । तब तक ये “छोटी” हो कर करीब ६० मीटर की हो गयी होंगी । (एक एक-मंजिले घर की ऊंचाई करीब ६ मीटर होती है – तो सोचिये – ६० मीटर ऊंची सुनामी !!!) ये बोस्टन आदि शहरों को तबाह कर सकती हैं । यह लिंक देखिये । माना जाता है की ये करीब २५ किलोमीटर तक भूभाग के भीतर घुस सकती हैं । ऐसा डर है कि अमेरिका के बोस्टन आदि (पूर्वी तटीय) शहरों में शायद करोडो लोग इस त्रासदी में हताहत हो जाएँ,  ।

जहां अमेरिकिय महाद्वीप का पूर्वी तट इस santorini से कारण सुनामी के खतरे को देखता है, वहीँ दूसरी तरह पश्चिमी तट जापान के साथ दूसरी फौल्ट लाइन पर है, तो सुनामी का खतरा वहां भी बना रहता है ।

अगले भाग में हम ज्वालामुखियों पर बात करेंगे ।

जापान का भूकंप – १ : भूकंप आने की प्रक्रिया

जापान के भयंकर भूकंप को एक साल पूरा हो रहा है । यह दुनिया में अब तक का सबसे शक्तिशाली भूकंप के रूप में दर्ज है, जबसे हम भूकम्पों की तीव्रता का आकलन कर के उसे दर्ज करने लगे हैं । न सिर्फ भूकंप, किन्तु उसके कारण आई सुनामी ने जापान को बुरी तरह से प्रभावित किया , और फिर न्यूक्लियर पावर रिएक्टर में भी कण्ट्रोल फेल हुए – जिससे स्थिति और भी बिगड़ गयी । भूकंप आते क्यों हैं ? इनके पीछे कौन से प्राकृतिक तंत्र काम करते हैं ? सुनामी कैसे आती है ? “न्यूक्लियर मेल्ट डाउन ” क्या होता है ? इन सब पर एक नज़र डालते हैं ।

सबसे पहले ( इस भाग में ) भूकंप आने की प्रक्रिया देखते हैं ।

हम सब जानते हैं  कि धरती के भीतर इतनी गर्मी है की वहां कुछ भी ठोस नहीं है । पिघला हुआ शैल्भूत (magma ) हमेशा उबलता रहता है । विज्ञान की theories के अनुसार माना जाता है  कि पहले धरती शायद सूर्य से फिंका हुआ एक जलता पुंज थी जो किसी तरह एक कक्षा में स्थापित हो कर सूर्य की परिक्रमा करने लगी और करोड़ों वर्षो तक घूमते हुए ठंडी होती होती तरल रूप में आई । {आप जानते होंगे कि satellites कैसे भेजे जाते हैं – कि पहले rocket  धरती से “फेंका” जाता है । उसकी शुरूआती गति के अनुसार वह उतने radius (त्रिज्या) की कक्षा में स्थापित हो जाताहै । }फिर जिस तरह उबले दूध पर ऊपरी सतह पर ठंडी होने से मलाई पड़ने लगती है, उसी तरह इस पिघले शैल्भूत पर भी ऊपर “मलाई” सी पड़ने लगी, अर्थात ऊपर की सतह ठोस होने लगी । परन्तु यदि आपने कभी दूध उबाला है, तो आप जानते होंगे कि यह मलाई एक अभंग इकाई (unbroken entity ) नहीं होती, बल्कि अलग अलग मलाई के भाग होते हैं, जिनके बीच में दरारें होती हैं । ( नहीं देखा, तो आज देखिएगा – चाय या दूध उबलने के बाद उसे दो मिनट ठंडा होने दीजियेगा, फिर ध्यान से मलाई को देखिएगा ।)

यह धरती के शैल्भूत की ऊपरी पथरीली सतह धीरे धीरे मोटी होती गयी । हमारी धरती की ४ मुख्य परतें हैं – inner core , outer core , mantle and crust । यह चित्र देखिये ।

layers of earth (courtesy :

धरती का जो crust  है, यह एक पतली खाल की तरह है, जो mantle का ऊपरी हिस्सा है । यह (दूध की मलाई ही की तरह) एक नहीं है, बल्कि अलग अलग टुकड़े हैं – जिन्हें tectonic plates कहते हैं । ये टेक्टोनिक प्लेट्स पिघले हुए magma के ऊपर तैरती हैं । (यदि आप यह सोच रहे हों कि ठोस तरल से भारी होता है तो इन्हें भीतर होना चाहिए – तो याद करें – आपकी car के tyres में high pressure air है, जो कार से “हलकी” होती है – परन्तु अत्यधिक दबाव की वजह से हवा भरे टायर्स कार का भार उठा सकते हैं । इसी तरह धरती के भीतर का पिघला भाग अत्यधिक दबाव वाला है, क्योंकि magma उबल रहा है लगातार । इससे धुआं और भाप (सिर्फ पानी ही की नहीं, बल्कि उबलते हुए कई पदार्थ जिनमे लोहा और कई दूसरे खनिज भी हैं, इन सभी के उबलने से बनता धुआं और भाप अत्यधिक दबाव लिए है ) बनती रहती है और उठने की कोशिश करती रहती है । लेकिन ऊपर जो ठोस परत बन चुकी है – यह उसे बाहर जाने का रास्ता नहीं देती । जब कहीं कोई कमज़ोर स्थान अपनी सहने की सीमा (breaking limit ) तक जा कर टूट जाता है – तो वहां से यह धुआं / भाप / पिघले पत्थर आदि बाहर फूट निकलते हैं – जिसे हम ज्वालामुखी का फूटना कहते हैं । यह magma ठंडा नहीं हो पाता क्योंकि ऊपर की पथरीली ठोस परत ताप (heat ) का bad conductor है । यह भी ध्यान देना होगा कि धरती यदि सच ही में सूर्य से फिंक गया कोई पुंज थी, तब तो भीतर कई तरह के विस्फोट शायद अब भी होते हों ? वैज्ञानिक भी ठीक से नहीं जानते कि भीतर क्या है, क्योंकि भीतर कोई जा तो पाया नहीं है, न ही उपकरण उस पत्थरों को पिघला देने वाली गर्मी में उतारे जा सकते हैं ) इन टेक्टोनिक प्लेट्स के ऊपर ही सारे समुद्रों के तल (sea beds ) और महाद्वीपों (continents ) के भूतल हैं । ये टेक्टोनिक प्लेट्स कुल सात हैं, और जिन दरारों पर ये आपस में जुडी हैं, उन्हें “line of fault ” कहा जाता है । ये प्लेट्स कितनी बड़ी और कितनी भारी होंगी, आप अंदाजा कर सकते हैं, क्योंकि ये सारी धरती के surface area के base हैं, और इनके ऊपर ही सारे महादीप और सारे समुद्र स्थापित हैं । भौतिकी (physics ) के अनुसार friction रगड़ खाते हुई सतहों के बीच relative movement (चाल, गमनागमन ) का विरोध करने वाली शक्ति / force होती है । और यह friction उतना अधिक होता है , जितना द्रव्यमान (mass ) अधिक हो । तो इन टेक्टोनिक प्लेट्स के बीच आपस में बहुत अधिक friction है । 

जब धरती घूमती है (- अपनी धुरी पर भी और सूर्य के आस पास भी -) तो ये प्लेट्स भी घूमते हैं ( ज़रा दूध की भगोनी को संडसी से पकड़ कर घुमाइए ) इन प्लेट्स के घूमने से इनमे relative  motion का भी सतत प्रयास होता रहता है, क्योंकि अलग अलग भार और अलग अलग composition ( संयोजन या बनावट ) होने से इन पर अलग अलग magnetic और gravitational pulls काम करते हैं । अर्थात ये प्लेट्स एक दूसरे के साथ स्थिर नहीं रहना चाहतीं, बल्कि कोई प्लेट तेजी से आगे जाना चाहती है जबकि दूसरी प्लेट कुछ कम तेजी से । तो इनमे आपस में स्थिरता नहीं होनी चाहिए, एक प्लेट आगे बढ़नी चाहिए, जबकि दूसरी पीछे छूटनी चाहिए । परन्तु अत्यधिक friction के कारण ऐसा हो नहीं पाता । ये प्लेट्स आगे पीछे होना तो चाहती हैं, परन्तु हो नहीं पातीं । साल दर साल दर साल दर साल इनके बीच में pressure (दबाव) बढ़ता जाता है, बढ़ता जाता है । फिर एक स्थिति आती है जब , जहां इन प्लेट्स के बीच के जोड़ पर थोड़ी कमजोरी हो (line of fault ) वहां की दरार के बराबर बराबर के पत्थर (छोटे मोटे नहीं – बड़े ही विराट पत्थर) टूट जाते हैं – और ये टूटने से ये परतें अचानक सरक जाती हैं / एक परत दूसरी के ऊपर चढ़ जाती है / एक परत दूसरी के नीचे घुस जाती है । यह तस्वीर देखिये :

जहां पत्थर टूटे वह “focus ” होता है, और उसके ठीक ऊपर की धरती की सतह को “epicentre “कहते हैं । जितने force से यह movement हुई, उसका माप रिचर स्केल (ritcher scale ) पर नापा जाता है (अब यह बदल रहा है ) इस अचानक हुई चाल के कारण धरती काँप जाती है और भूकंप आता है ।

एक और बात – स्केल के बारे में । आप सोचते होंगे शायद कि “magnitude 4 ” (माप ४ ) का भूकंप बड़ा ही साधारण माना जाता है , लोगों को पता तक नहीं चलता कई बार , जबकि ७ का भयंकर – ऐसा क्यों ? तो इसका उत्तर यह है कि ritcher scale  एक logarithmic scale है, अर्थ १ = १०^१, २-१०^२ . इसी अनुपात में मान ७ का एक भूकंप है १०^७ और मानक ९ का अर्थ है १०^९ । इसका एक अंदाज़न अर्थ यह हुआ कि यह २०११ का जापान का ९ मानक वाला भूकंप लातूर के १९९३ के ६.४ मानक वाले भूकंप से करीब करीब ७०० गुना ज्यादा शक्तिशाली था !!!

अगले भाग में सुनामी की प्रक्रिया पर बात करेंगे ।

References :


पूर्वाग्रह ३ : सीखना

इस शृंखला के पुराने भाग  देखें  :-

आज के भाग के लिए इस नीले भाग से आगे पढ़ें । यह नीला भाग background information  और पुनरावृत्ति है – जो आगे की प्रक्रिया समझने में सहायक होगी ।

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पिछले दो भागों में हमने पढ़ा कि:


भाग १ –  पूर्वाग्रह का अर्थ है किसी वस्तु / व्यक्ति को देखने या जानने से पूर्व ही उसके बारे में एक धारणा बना लेना । यह पूर्वाग्रह भाषा ज्ञान से भी आता है, हमारे निजी अनुभव से भी बनता है । पूर्वाग्रह के बारे में अक्सर हमारे मन में एक पूर्वाग्रह है कि यह कोई “निंदनीय” चीज़ है, पूर्वाग्रह रखना कोई बुरी बात है । किन्तु यहाँ – इस शृंखला में मैं यह चाहूंगी कि आप इसके प्रति यह पूर्वाग्रह न रखें । यह हमारे पहचान और निर्णय की प्रक्रिया का एक भाग है । हमारे nervous system से ही प्रेरणा लेकर आजकल artificial intellegence के लिए सिस्टम्स बनाये जा रहे हैं – जो artificial neurons का उपयोग करते हैं । इन artificial electronic neurons को भी inputs और पूर्वाग्रह का उपयोग उसी प्रकार करना होता है जैसे हमारे मस्तिष्क की प्रक्रियाओं में होता है । मैंने दो तीन उदाहरण लिए पूर्वाग्रह के – जैसे, ….आम = मीठा पीला फल, …..हिंदी फिल्मों में ” माँ ” , …. सूर्य, ….चोट, ….दोस्त अदि ।


भाग २ – पूर्वाग्रह का पहचान और निर्णय की प्रक्रिया में क्या योगदान है । जैसे – यदि मैं मई के महीने में फल के बाज़ार में गयी और मुझे दूर से पीले फलों का ठेला दिखा – तो मैंने मान लिया कि यह आम हैं । यह तो पास जा कर ही जान पाऊंगी कि हैं , या नहीं हैं । तो मुझे एक तो यह पहचान करनी है कि यह फल आम है या नहीं, और दूसरा यह image मेरे मन में बने कि यह फल मुझे ख़ुशी की अनुभूति देगा (यदि मुझे आम पसंद हैं तो ) या नहीं (नापसंद हैं तो ) । निर्णय के दो आधार हैं – अभी क्या इनपुट आया और पहले से उस चीज़ के बारे में मेरा अनुभव कैसा रहा । neuron कैसे decide करे ? 

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यह दो चित्र आगे के लेख को समझने में सहायक होंगे – इन्हें याद रखने की आवश्यकता नहीं है – सिर्फ रेफेर करने में काम आयेंगे ।


हमारे शरीर के neuron  का एक उदाहरण यह है ।

natural neuron 


यह जो दोनों और, ऊपर और नीचे टहनियां और जडें सी दीखती हैं – ये हजारों की संख्या में हैं । ये neurons को एक दूसरे से जोडती हैं, और उनमे आपस में संकेत भेजने का भी काम करती हैं । जब दो neuron आपस में “बात” करते हैं – तो उनके बीच का सम्बन्ध और सुदृढ़ हो जाता है , और जो बारम्बार बात करते हैं, उनके सम्बन्ध उतने अधिक प्रगाढ़ होते चले जाते हैं । इसके विरुद्ध, जो connection use  नहीं होता, वह कमज़ोर होता जाता है । हर एक neuron दुसरे हज़ारों neurons से इनपुट भी लेता है, और हजारों को output भी देता है । ( आपको शायद आश्चर्य होगा – किन्तु आज इलेक्ट्रोनिक / इंस्ट्रुमेंटेशन इंजिनियर / डॉक्टर हमारी जीभ के neurons – जो हम स्वाद के अनुभव के लिए use करते हैं – उन्हें नेत्रहीन लोगों के देखने के लिए प्रयुक्त करने का प्रयास कर रहे हैं – और कुछ हलकी सफलताएं मिलने भी लगी हैं ।


 

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artificial neuron कुछ ऐसा होता है – (यह natural वाले से बहुत ही कमतर है – किन्तु basic working को copy करता है ।)

Artificial  Neuron 


१.ये जो inputs दीख रहे हैं – ये असल inputs हैं । 

२.इस एक नयूरोन का सिर्फ एक ही output है ।

३.हर इनपुट को कितना महत्व (वजन, weight ) दिया जाएगा – नयूरोन हर उदाहरण से सीखता है ।

४.यह सीखना अब तक के अनुभव की आधार पर होता है – यह वजन अनुभव के साथ बदलता है ।

५.जो इनपुट इस neuron के output के साथ में सकारात्मक रूप से काम करें – उन inputs का इस neuron में + महत्व बढ़ता जाता है, (+१ तक) , और जो इस output के साथ न हों / विरुद्ध हों, उनका घटता जाता है या – में बढ़ता है ( – १ तक)।

६.ये सारी चीज़ें (असर) जोड़ी जाती हैं ।

७.activation function का काम है इस जोड़ को (जो एक से अधिक हो सकता है – +-१ तक लिमिट करना। (अर्थात हाँ या ना में उत्तर बनाना )


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अब चलते हैं सीखने की प्रक्रिया की ओर – कि हर प्रविष्टि का वजन कैसे निर्धारित होता है और हर बार bias के वजन पर क्या असर होता है |

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एक रोज़मर्रा का उदहारण लेते हैं : सोचिये की यह न्यूरोन एक नन्हा १० ११ माह का बच्चा है जो घुटने चलता है । उसे कई तरह के अनुभव होते हैं – और अलग अलग स्थितयों के अनुसार सोचिये की उसे “हाँ” या “न” में चुनाव करना सीखना है ।

 

 

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इनमे से हर एक इनपुट को एक के बाद एक लेते और समझते हैं । हम में से अधिकतर लोगों को ये experience हुए ही हैं – तो समझना आसान होगा

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१.

किचन में गर्म कुकर है – जिसे छूने बच्चे बार बार आगे जाते हैं । माँ मना करती है – बेटा मत छू – हाथ जलेगा। माँ सामने हो तो बच्चे अक्सर मान भी जाते हैं, परन्तु उनमे वह उत्सुकता बनी रहती है – कि छूना है । फिर किसी दिन माँ की नज़र न हो – तो छूते ही हैं – और हाथ में जलन के दर्द का अनुभव उन्हें तुरंत हाथ खींचने पर मजबूर करता है – रोने पर भी । कुछ देर बाद – हाथ धुलने से / दवा देने से राहत हो जाती है । कुछ दिन बच्चे को वह दर्द याद रहता है – और वह कुकर नहीं छूता । फिर यह repeat होता है – शायद अबकी बार किसी गर्म कढाई / गर्म दूध की भगोनी आदि के साथ । तो अनुभव पक्का होता जाता है, याददाश्त प्रगाढ़ होती जाती है ।

 

अब बच्चे ने दो तरह की बात सीखी –

         (क) एक यह की किचन में गर्म चीज़ें जो प्लेटफोर्म पर / चूल्हे पर रखी हैं – उन्हें छूना दर्द देता है – तो उन्हें  नहीं छूना है । तो उस input के लिए वजन negative बन गया ।

         (ख) माँ जो कह रही थी – वह मेरे लिए सही था – तो माँ की बात मानने में भलाई है – नकारात्मकता (माँ ने मना किया था ) और नकारात्मकता (दर्द हुआ ) के गुणा होने से सकारात्मक परिणाम  (bias या माँ की बात का वजन बढ़ गया)

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(२)

दूसरा इनपुट एक बजता हुआ खिलौना है – माँ बच्चे को हंस हंस कर उससे खेलने को दे रही है । बच्चा उसे लेता है – खेलता है – और एन्जॉय करता है – फिर से दो बातें हिया हैं ।

       (क) खिलौने (input ) का वजन positive हो गया ।

       (ख) माँ की बात (bias ) का वजन भी बढ़ा – इस बार सकारात्मक (माँ ने खेलने दिया था) और सकारात्मक (मजा आया खेलने में )  के गुणा होने से + result आया है ।

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(३)

पिता की थाली में चटनी / अचार है – जबकि बच्चे को सिर्फ मीठी / फीकी /  हलकी नमकीन चीज़ें ही मिली हैं । बच्चे के ललचाने पर माँ कहती है – थोडा बड़ा हो जा – फिर मिलेगा । अभी मुह जलेगा । परन्तु बच्चा जिद करता है । फिर थोडा सा अचार चटाना ही पड़ा माता पिता को । उसे मिर्च लगी । अगली बार वह नहीं खाना चाहेगा (कुछ दिन तक ) । फिर से दो बातें हुईं

         (क) तीखा अचार मुंह में जलन देता है – तो नहीं खाना है – neagtive वजन ।

         (ख) माँ की बात मान लेता तो तकलीफ न होती – bias का वजन फिर बढ़ा ।

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अब – इनमे से हर एक इनपुट – हर experience (अनुभव ) के बाद अपने ही वजन को प्रभावित कर रहा है – उसे + या – दिशा में बढ़ा रहा है । किस दिशा में – यह इस पर निर्भर है की अनुभव सुखदायी था या दुखदायी ।

 

इसके अलावा – इनमे से हर एक इनपुट के लिए माँ (bias ) ने जो कहा – यदि अनुभव उसके अनुरूप रहा – तो  bias का वजन बढ़ता चला जायेगा । यदि माँ ने न कहा था – और अनुभव कटु हुआ – तो बच्चा सीखेगा की माँ की बात न मानने में मेरा नुकसान है (नकरात्मक और नकरात्मक = सकारात्मक )। इसके ठीक उलट – यदि माँ ने हाँ कहा था और अनुभव मीठा रहा – तो बच्चे यह सीखते हैं की अरे वाह – माँ की बात मानने में बड़ा फायदा है (सकारात्मक और सकारात्मक = सकारात्मक )। इन दोनों ही रूप में bias का वजन + की दिशा में बढ़ता है ।

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इस सीखे हुए अनुभव का उपयोग कैसे होगा? एक समय में अक्सर एक ही इनपुट होगा, या तो गर्म कुकर है, या फिर बजने वाला बाजा । तो एक input =+१ है, बाकी के इनपुट शून्य हैं । तो जोड़ जो बनेगा – वह उस एक ही इनपुट के असर से बनेगा । और उसी के हिसाब से परिणाम या तो +१ आएगा (अर्थात हाँ ) या फिर -१ आएगा (अर्थात ना )।

 

अगले भाग में हम यह देखने का प्रयास करेंगे की यह bias या इनपुट के वजन जो हमने इंसानी दिमाग में देखे समझे – ये artificial neuron में कैसे घटाए और बढाए जाते हैं ।

 

जारी ……..

पूर्वाग्रह २ : पहचान और निर्णय

पूर्वाग्रह भाग  देखें 


पिछले भाग में मैंने (लेख और टिप्पणियों के discussion में) कहने की कोशिश की – कि 


१. शब्द जो छवि बनाते हैं हमारे मन मस्तिष्क में – उसमे से कुछ भाषाज्ञान है, और कुछ पूर्वाग्रह | 


२, आम – फल है | किन्तु – कैसा है ? यह हर वह व्यक्ति बता सकता है – जिसने आम खाया है (समझाना तो मेरे बस का नहीं है) यह भाषाज्ञान है |


३.  मैंने यह भी कहा ( पोस्ट में भी और टिप्पणियों में भी ) कि यह पोस्ट मैं सिर्फ हमारी (मनुष्यों की) मानसिक प्रक्रियाओं पर concentrate कर के नहीं लिख रही हूँ, बल्कि ये मानसिक प्रक्रियाएं सिर्फ एक background हैं – आगे मैं natural neurons , artificial neurons और artificial neural networks पर बात करने वाली हूँ | 

अब – आगे ….

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पहली बात तो यह कि आम पीला है – यह हमारी सोच प्रक्रिया में बना हुआ एक पूर्वाग्रह है | कृपया यह न सोचें कि मैं पूर्वाग्रह की निंदा कर रही हूँ – नहीं तो आगे जो बातें होनी हैं – वे इस निंदा की image की ही वजह से निरर्थक हो जायेंगी | इस पोस्ट के सन्दर्भों में पूर्वाग्रह निंदनीय नहीं है – यह अक्सर सहायक है सही पहचान के लिए | यदि यह अड़चन बनने लगता है – तो धीरे धीरे यह ( हमारी मानसिक प्रक्रियाओं के द्वारा ) बदल भी जाता है | हर आम तो पीला नहीं होता ( दसहरी , लंगड़ा हरे आम हैं ) – फिर भी यह बात तो है ही कि आम सुन कर पीला फल ही मन में उभरता है | इससे उलट – यदि गर्मियों के मौसम में दूर से फल का ठेला दिखे – तो यदि उस पर पीले फल दिख रहे हों – तो आम ही लगते हैं |  


यह ऊपर – दो अलग बातें है – 


(अ) आम पीले होते हैं – यह छवि – “cognition ” कहलाती है हमारी इलेक्ट्रोनिक की इमेज प्रोसेसिंग की भाषा में | 


(ब) ठेले पर जब दूर से पीले फल दिख रहे हों – तो वह आम का ठेला है – यह “recognition “ कहलाता है | 


जब cognition होता है – तब हम मशीन को सिखाते हैं कि किस वस्तु (label) के साथ क्या properties associate की जाएँ | इसी तरह – छोटे बच्चे को हम सिखाते हैं – अ- अनार का ; आ – आम का – और उस पुस्तक में अनार और आम की छवि होती है | लेकिन न हम उसे अनार सिखा रहे थे, न आम, हम तो उसे सिखा रहे थे कि यह जो अक्षर लिखा है किताब में – इसे बोला किस तरह से जाता है | इसके उलट – यह जो हम बोल रहे हैं “अ”, “आ” इसे लिखा कैसे जाए |


अब समझें – दो प्रकार के factors हैं, जो हमारे निर्णय को प्रभावित करते हैं (उदाहरण के लिए – यह चीज़ / व्यक्ति मुझे पसंद आएगा / नापसंद / या न्यूट्रल ? ) अब जैसे – किसी को आम पसंद है / किसी को नहीं | तो उसी एक फल को देख कर कोई पहचानेगा की यह आम है, कोई नहीं पहचानेगा | इसके आगे – किसी के मन में पसंद की भावना होगी – किसी के मन में नापसंदगी की | 


अ) एक – तत्काल अभी उस से क्या input आ रहा है ? (जो सामने फल है – यह आम है या नहीं इसे पहचानने के लिए उसका रंग, रूप. आदि )

बी) और दूसरा – लॉन्ग टर्म में मैंने उसके बारे में क्या जाना है | ( मीठा ? खट्टा ? रसीला ? नर्म ? सख्त ? )


तत्काल अभी आए inputs को weigh कर के जो असर होता है – वह एक sum बनाता है | इसमें पहले के अनुभव से आये bias को जोड़ा जात है | तब – इस मिले जोड़ के आधार पर – निश्चय लिया जाता है |


अब आगे बढ़ते हैं – neuron की ओर – कि वह कैसे decision लेता है कि किस वस्तु को किस category में रखा जाए | हमारे शरीर में एक nervous system है , जिसके हिस्से हैं nerves , spinal chord और brain | ये सब नयूरोंस पर बने हैं | ये नन्हे नयूरोंस करोड़ों की संख्या में हैं – और इनकी कई शाखाएं एक दुसरे से जुडी हैं | ये जुडी हुई शाखाएं एक से दुसरे को chemicals के exchange द्वारा सन्देश देती हैं | 


शरीर का एक प्राकृतिक neuron हमारे engineers द्वार बनाए artificial neuron से बहुत अधिक advanced है – किन्तु उसी को समझ कर और उसकी working को कॉपी कर के ही हम artificial neron और neural network बनाते हैं | इन नयूरोंस पर बात होगी अगले अंक में – कि  कैसे बनते और कार्य करते हैं | 


पूर्वाग्रह 1 – पूर्वाग्रह क्या होता है ?

 

पूर्वाग्रह ?

इस शब्द को सुन कर पहले पहल क्या भाव आता है मन में ?


यह जो भी भावना आपके मन में आई , इस शब्द से जो भी अच्छी या बुरी छवि मन में उभरी – वह आपके मन का पूर्वाग्रह है – इस शब्द की परिभाषा को लेकर | यदि आपके मन में यह आया कि “पूर्वाग्रह का शाब्दिक अर्थ है – पूर्व + आग्रह = किसी चीज़ को देखे / समझे / तौले / जाने बिना उसके बारे में पहले ही से कोई धारणा (अच्छी या बुरी) कायम कर लेना “ तो आप “पूर्वाग्रह” से रहित होकर इस शब्द को परिभाषित कर रहे हैं | 🙂


कुछ प्रचलित सर्व ज्ञात हिंदी शब्द :


१. आम ?? …………..= फल, मीठा, पीला, रसीला …..


२. सूर्य ??……….. = रौशनी, गर्मी, दिन, जीवनस्त्रोत, ….


३. चोट लगना ?? ……….. = दर्द, तकलीफ, एक्सीडेंट, …..


४. दोस्त ??……… = ख़ुशी, बांटना , साथ, अपनापन, …..


आदि कई उदहारण हैं, जहां एक शब्द पढ़ / सुन कर हमारे मन में  कोई छवि उभर आती है | क्या यह सब छवियाँ पूर्वाग्रह हैं ? शायद हाँ, शायद नहीं | 


आम – यदि हमने देखा है, खाया है, और हम हिंदी जानते हैं ( कि आम किसे कहते हैं ) | यदि हमने इसे देखा / खाया न हो, या हम सिर्फ फ्रेंच भाषा जानते हों – तो ? क्या तब भी यह शब्द यही छवि बनाएगा ? नहीं | इसका अर्थ यह लगता है की यह जो पूर्वाग्रह (?) है हमारा कि आम एक रसीला, मीठा, पीला फल है – पहली बात तो हर बार, हर आम के लिए सही नहीं है. दूसरे, यह पूर्वाग्रह भी कोई पूर्वाग्रह नहीं है, बल्कि हमारे पुराने अनुभव के आधार पर ही बना है | लेकिन हर आम तो पीला नहीं होता न ? (लंगड़ा आम? दसहरी आम? ) न ही हर आम मीठा / रसीला ही होता है | फिर भी इस शब्द से यह छवि क्यों उभरती है पहले पहल ? यह परिभाषा कैसे बनी ? यह कैसे बदल सकती है ?


एक और उदाहरण लेती हूँ – हिंदी फिल्मों से | ५० या ६० के दशक की फिल्मों में “माँ ” शब्द क्या छवि बनाता था ? शायद एक पुरानी साडी में लिपटी हुई प्रेम की मूर्ती की ? जो अपनी सारी निजी ज़रूरतों और भावनाओं को परे कर सिर्फ बेटों (बेटियों जानते बूझते नहीं लिखा है ) के लिए जीती थी | फिर आज की फिल्मों की माँ ? वह इतनी त्यागिनी नहीं दिखाई जाते | दिखाई भी जाये -तो शायद एक्सेप्ट भी न हो | न ही उसे हमेशा साडी में दिखाया जाता है | टीवी के एडवरटाइज्मेंट्स / सीरिअल्स में भी देखें, तो २० साल पहले की माँ और अज के माँ में ज़मीन आसमान का फर्क है | यही फर्क बहू में भी है, नायक और नायिका में भी | 


तो क्या हम इस माँ, बहु, नायक, नायिका को एक्सेप्ट नहीं करते ? या उस समय वालों को ? एक जनरेशन के लिए जो नेचरल है, दूसरी के लिए नाटकीय क्यों है ? क्या यह सब पूर्वाग्रह का खेल है ? 


 

यही  बात बाकी के उदाहरणों पर भी लागू होती है – न हर शब्द का अर्थ हर बार, हर सन्दर्भ में वह होता है जो हम आमतौर पर स्वीकार करते हैं, न हर बार उससे विपरीत | इसी पूर्वाग्रह पर मैं इस शृंखला में चर्चा करूंगी | 


 

क्या अप मेरे साथ होंगे इस पूर्वाग्रह के बनने और बदलने की study में? इसके आगे फिर हमारे मानसिक पूर्वाग्रहों से आगे बात करेंगे की इलेक्ट्रोनिक्स में bias के क्या अर्थ हैं, fixed और varying bias क्या होते हैं | और neural networks में किस तरह से हमारे मानसिक पूर्वाग्रहों और decision Making के आधारों को प्रयुक्त कर के artificial intellegence बनाई जाती है – कैसे मशीन को सिखाया जाता है की वह भी हमारी ही तरह अलग अलग inputs के आधार पर निर्णय ले पाए कि किस स्थिति में क्या किया जाये | यह भी कि “पूर्वाग्रह” करना कैसे सीखती है मशीन |


आशा है इस शृंखला में आप मेरे साथ होंगे | 


matter antimatter4

इस भाग में हम प्रोटोन संख्या, आयसोटोप और आयसोबार पर बात करेंगे | यह पोस्ट यहाँ भी है 


पिछले भागों में हमने देखा कि (आप चाहें तो यह नीले रंग वाला भाग छोड़ कर आगे चले जाएँ और आज के भाग को पढ़ें )
१) हमारे आस पास की हर वस्तु पदार्थ (matter ) से बनी हैं | 
२) इनमे से अधिकतर पदार्थ “मिश्रण” (mixtures ) हैं (जैसे – समुद्र के पानी में पानी और अनेक अम्ल हैं )
३) भौतिक प्रक्रियाओं द्वारा इन मिश्रणों से “सत्व ” (pure substance )  अलग किये जा सकते हैं (जैसे पानी, नमक, शक्कर आदि) |
३) यह सत्व शुद्ध तत्त्व (elements जैसे हायड्रोजन – H ) या उनके रासायनिक जोड़ से बने संयोजन (compounds जैसे पानी – H2O ) हो सकते हैं | 
४) संयोजनों को रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा अपने मूल तत्वों में अलग किया जा सकता है, किन्तु प्राकृतिक रूप में ये अधिकतर संयोजित रूप में ही पाए जाते हैं |
५)मूल तत्वों को परमाणुओं तक और संयोजनों को अणुओं तक विभाजित किया जा सकता है | यहाँ तक उस पदार्थ के सभी गुण नज़र आयेंगे |
६) परमाणुओं को इससे भी आगे प्रोटोंस, न्यूट्रोंस , और इलेक्ट्रोंस में तोडा जा सकता है | किन्तु ये कण अब मूल तत्त्व के गुणों को नहीं दिखायेंगे | एक इलेक्ट्रोन चाहे कार्बन से आया हो, अल्युमिनियम से आया हो या किसी और परमाणु से – उसका उस पर कोई प्रभाव नहीं होगा | यह नहीं पहचाना जा सकेगा कि यह इलेक्ट्रोन किस मूल तत्त्व से आया है | 


पिछले भाग में हमने देखा कि परमाणु की संरचना में इलेक्ट्रोन किस तरह अपनी कक्षाओं में घूमते हैं, किस कक्षा में कितने इलेक्ट्रोन होते हैं, कैसे एक परमाणु दुसरे को इलेक्ट्रोन दे सकता है, या ले सकता है या फिर share कर सकता है – जिसकी वजह से electrovalent या covalent bond बनते हैं और रासायनिक संयोजन बनते हैं | कैसे कुछ पदार्थ संयोजन करते (Na + Cl = NaCl ) या नहीं करते (He ) हैं |

इस भाग में हम प्रोटोन संख्या, आयसोटोप और आयसोबार पर बात करेंगे |


हर एक मूल तत्व के परमाणु में प्रोटोन और इलेक्ट्रोन की संख्या बराबर होती है | ये दोनों उलटे आवेशों वाले है – प्रोटोन + आवेश लिए हैं और इलेक्ट्रोन – आवेश …. तो जब तक दोनों की संख्या बराबर होती है – ये दोनों आवेश एक दूसरे को बैलेंस करते हैं | इसलिए परमाणु न्यूट्रल होता है (अर्थात कोई आवेश नहीं दिखाता ) | किन्तु जो प्रोटोन होते हैं, वे इलेक्ट्रोन  की अपेक्षा हज़ारों गुना अधिक द्रव्यमान लिए होते हैं | तो भारी होने की वजह से ये “आलसी” हैं 🙂 अर्थात ये घूम नहीं रहे, बलिक नाभिक (nucleus ) में बैठे सिर्फ आराम कर रहे हैं 🙂 | और परमाणु को भार दे रहे हैं | इनके साथ ही भारी न्यूट्रोन भी हैं , जिन पर न + आवेश है न ही – आवेश …. ये भी प्रोटोन जितने ही द्रव्यमान वाले हैं … और यह भी नाभिक में बसे हैं , घूम नहीं रहे | इसके विपरीत इलेक्ट्रोन का आवेश – है और साथ ही ये बहुत ही हलके हैं – और ये नाभिक के आस पास अपनी कक्षाओं में घूमते रहते हैं |


यदि इलेक्ट्रोन अपने परमाणु को छोड़ जाए तो + आवेश जीतने लगेगा और + आयन बन जाएगा, इसके विपरीत बाहर से इलेक्ट्रोन आ जुड़े तो – आयन बनेगा | 


नाभिक के भीतर प्रोटोन की संख्या fixed होती है | इसे atomic number (आणविक संख्या कहते हैं ) एक प्रोटोन का वजन और एक न्यूट्रोन का वजन करीब करीब बराबर होता है – और यह होता है करीब 1 U या 1 AMU |


पिछले भाग में दी सारिणी को देखिये | एक हायड्रोजन के परमाणु में एक प्रोटोन होता है (आणविक संख्या = १) तो उसका भार कितना होगा ?


अ) यदि कोई न्यूट्रोन नहीं हो – तो १ amu 
ब) यदि १ न्यूट्रोन हो तो १+१=२ amu 
स) यदि २ न्यूट्रोन हों – तो १+२=३ amu 


अर्थात – प्रोटोन संख्या १ होने से परमाणु होगा तो हायड्रोजन ही का, गुण भी हायड्रोजन के होंगे, किन्तु आणविक संख्या एक होते हुए भी न्यूट्रोन संख्या में फर्क की वजह से आणविक भार अलग अलग हो सकते हैं | ऐसे परमाणु isotopes कहलाते हैं |


इसी तरह से यह भी हो सकता है कि आणविक संख्या अलग हो, किन्तु भार एक ही हो | जैसे 


एक पदार्थ में १० प्रोटोन और ११ न्यूट्रोन हैं – तो उसकी आणविक संख्या है १० और भार है १०+११=२१ | एक और पदार्थ में ११ प्रोटोन और १० न्यूट्रोन हैं – तो उसकी आणविक संख्या है ११ और भार है ११ +१० = २१ | तो दोनों की संख्या अलग है – तो पदार्थ तो अलग हैं, किन्तु आणविक भार एक ही बराबर है | इन्हें isobars कहा जाता है |


जारी …. 

matter antimatter 3

अनुवाद आभार – आदरणीय गिरिजेश राव जी |


[
अब तक हमने देखा –> 
{चाहें तो यह भाग जो नीले रंग में है, इसे छोड़ कर नीचे नए भाग को देखें }
*1* पदार्थ के मिश्रणों को भौतिक प्रक्रियाओं द्वारा पहले तो सत्वों (substances) में अलग अलग किया जा सकता है | [ जो या तो मूल तत्व (ELEMENTS ) या उनके संयोजन / यौगिक (COMPOUNDS )} हो सकते हैं ] 
*2* इसके बाद और फिर रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा मूल तत्त्व अलग किये जा सकते हैं | मूल तत्त्व [elements ] प्रकृति में करीब करीब ११० हैं, जिनके कई तरह के संयोजन और मिश्रणों से बने पदार्थों से वह हर चीज़ बनी हुई है जो हम अपने आस पास देखते हैं | 
*3* [जैसे समुद्र का पानी एक मिश्रण (mixture ) है, जिसमे सत्व (substances ) हैं – शुद्ध पानी, नमक रेत आदि | इन सब को भौतिक प्रक्रियाओं द्वारा  अलग अलग किया जा सकता है  | 
*4* अब जो शुद्ध पानी हमें मिलेगा – वह एक यौगिक संयोजन (compound ) है – जिसमे मूल तत्त्व (elements ) हैं हाईड्रोजन और ओक्सिजन ]
*5* संयोजन अणुओं से बने हुए हैं [compounds are made up of molecules] ….. और तत्त्व परमाणुओं से बने हुएहैं | ( elements are made up of atoms) 

जिस अनुपात (ratio ) में संयोजन अपने घटक (component ) तत्त्वों के जोड़ हैं, ठीक इसी रूप में उन संयोजनों के मूल “अणु” उन्ही परमाणुओं के उस ही अनुपात में जोड़ हैं | उदाहरण के लिए, पानी (water ) एक संयोजन है जिसमे गिनती के अनुपात में देखा जाए तो एक भाग  पानी में दो भाग हाईड्रोजन और एक भाग ओक्सिजन है तो ——- पानी के एक अणु में भी दो हाईड्रोजन के परमाणु और एक ओक्सिजन का परमाणु है | परन्तु इसे भौतिक प्रक्रियाओं द्वारा नहीं तोडा जा सकता, हाँ रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा ज़रूर तोड़ा जा सकता है और हाईड्रोजन और ओक्सिजन को अलग किया जा सकता है | कौनसे परमाणु किस अनुपात में जुड़ेंगे यह उनकी संयोजकता पर निर्भर है, जो हम यहाँ (नीचे) देखेंगे |
]
अब आगे …

यहाँ तक तो हमने यह देखा कि – हर मूल तत्त्व को उसके घटक अणुओं तक  तोडा जा सकता है | इनमे से हर एक अणु में वह सारे गुण देखे जा सकते हैं, जो उस मूल तत्त्व के गुण हैं |  यहाँ इसके बारे में अक्सर लोगो को भ्रान्ति है कि अणु के नीचे हम पदार्थ को तोड़ नहीं सकते | यह गलत जानकारी है | तथ्य यह है कि अणु को तोडा तो जा सकता है, परन्तु अब जो घटक मिलेंगे, वे घटक युनिवर्सल हैं | [ यह कुछ कुछ भारतीय दर्शन में जो कहा गया है कि हर वास्तु पञ्च-महाभूतों से बनी है – वैसा ही है | ] अर्थात, उन घटकों में मूल तत्त्व के गुण नहीं दीखते | ये घटक हैं, इलेक्ट्रोन, प्रोटोन, और न्यूट्रोन | ये घटक चाहे हाइड्रोजन के परमाणु से आये हों या फिर ओक्सिजन से, या अल्युमिनियम से या किसी भी और मूल तत्त्व से – इनके स्त्रोत से इनके गुणों पर कोई फर्क नहीं पड़ता | हर एक मूल तत्त्व से मिला इलेक्ट्रोन एक ही तरह का होगा – इलेक्ट्रोन को पाकर यह बताया नहीं जा सकता कि यह मूलतः किस मूल तत्त्व के परमाणु में था !!!                       

एक अणु के भीतर मुख्य रूप से ३ तरह के कण हैं – इलेक्ट्रोन, प्रोटोन, और न्यूट्रोन – इन्हें एक एक कर समझते हैं – इस पोस्ट में सिर्फ इलेक्ट्रोन पर ही बात हो पाएगी |

१. इलेक्ट्रोन 
 ये कण बहुत ही हलके हैं | जिस तरह सौरमंडल में धरती, मंगल आदि ग्रह सूर्य के आसपास घूमते रहते हैं, उसी तरह ये परमाणु के नाभिक [“न्युक्लिअस”] के आस पास घूमते रहते हैं | इनमे ऋणात्मक आवेश ( निगेटिव चार्ज) है | इलेक्ट्रोन अपने अणु को छोड़ कर दूसरे अणु से भी जुड़ सकते हैं | तो वह जो अणु पहले न्यूट्रल था, अब पोजिटिव आयन (धनात्मक) हो गया, क्योंकि निगेटिव इलेक्ट्रोन उसे छोड़ कर चला गया | इसी प्रकार, जिस अणु में यह इलेक्ट्रोन जुड़ गया है अब , वह भी पहले न्यूट्रल था – लेकिन अब इस इलेक्ट्रोन के आ जाने से यह अब निगेटिव आयन (धनात्मक) हो गया | 

अब यह तो हम जानते ही है कि पोजिटिव और निगेटिव एक दूसरे को अपनी ओर खींचते हैं | तो जो पहले वाला अणु पोजिटिव हो गया है, और दूसरा जो निगेटिव हो गया है – एक दूसरे को खींचने लगते हैं, और इनकी “जोड़ी” बन जाती है | या आसानी से अलग नहीं किये जा सकते हैं अब | इस गठजोड़ को “इलेक्ट्रो वेलेंट बोंड” या विद्युत्-संयोजित बन्ध कहते हैं |

यह इलेक्ट्रोन का देना और लेना हर जगह और मनमाने तरीके से नहीं होता | हर मूल तत्त्व में एक निश्चित मात्रा में इलेक्ट्रोन हैं, जो अपनी अपनी “कक्षा” (orbit ) में नाभिक (nucleus ) के आस पास घूम रहे हैं | पिछले भाग में मैंने जो सारिणी दी थी, उसे फिर से यहाँ दिखा रही हूँ | जो तत्त्व जिस स्थान पर है, उसमे उतने ही इलेक्ट्रोन हैं (और आगे देखेंगे कि उसके नाभिक में उतने ही प्रोटोन भी हैं ) 

अब देखें कि हर कक्षा में कितने इलेक्ट्रोन हो सकते हैं?? पहली – सबसे भीतर वाली कक्षा में अधिकतम दो ,दूसरी में आठ आदि | यह कक्षा संख्या को यदि “n ” माना जाए, तो उसमे अधिकाधिक  इलेक्ट्रोन जा सकेंगे – और जिस मूल तत्त्व में जितने इलेक्ट्रोन होंगे – कक्षा में उस से अधिक ( 2 x n x n ) इलेक्ट्रोन भरे जा सकते हैं | 

कक्षा     इलेक्ट्रोन की अधिकतम संख्या    यहाँ तक योग संख्या 
१             २.१.१ = २                                   २ 
२            २.२.२ = ८                                  २+८=१०   
३            २.३.३ = १८                                १०+१८ = २८ 
आदि   


अब जिस तत्त्व में जितने इलेक्ट्रोन हैं, उस तरह से या तो कक्षा पूरी भरी रह सकती है , या कुछ खाली रह सकती है – और हर परमाणु की कोशिश रहती है कि सबसे बाहर की कक्षा या तो पूरी भरी हो ( H और He के लिए २ इलेक्ट्रोन ) या फिर बाहरी कक्षा में ८ इलेक्ट्रोन हों | इसे पूरा करने के लिए अणु को जो आसान हो – १,२,या ३ इलेक्ट्रोन लिए जा सकते है , या १,२,या ३ इलेक्ट्रोन दिए जा सकते हैं, या ४ इलेक्ट्रोन शेयर किये जा सकते हैं | (उदाहरण के लिए – यदि बाहर ७ इलेक्ट्रोन हों, तो या तो ७ दे दिए जाएँ या फिर १ ले लिया जाए – निश्चित ही एक लेना आसान है ७ देने की अपेक्षा ) ऊपर हमने देखा कि यदि एक ने दूसरे को इलेक्ट्रोन दिए, तो पहला + और दूसरा – बन जाएगा और ये दोनों विद्युत् संयोजी बन्ध द्वारा संयोजित हो जायेंगे | यदि शेयर किये, तो यह बनेगा सह-संयोजित बन्ध | इस बार भी दोनों अणुओं को साथ रहना पड़ेगा क्योंकि अब यह शेयर्ड इलेक्ट्रोन दोनों के नाभिकों का चक्कर लगाने लगे हैं |

तत्त्व    इलेक्ट्रोन   कितनी       इलेक्ट्रोन       बाहरी कक्षा       ८ की गिनती पूरी      संयोजकता 
           संख्या        कक्षाएं?      का वितरण   में इलेक्ट्रोन       करने को कितने       / वेलेंसी 
                                                                                           इलेक्ट्रोन  देने हैं 

H          1                 १                      १              १               १ दे या ले सकता है    +१  या – १ 

He        2                 १                      २              २               पूर्ण है – तो शून्य |     संयोजन 
                                                                                         न देगा ना लेगा |        नहीं करेगा          

Li         3                 २                    २+१           १                     १ देगा                            +१   

Be        4                 २                   २+२            २                   २ देगा                            +२   



B          5                 २                    २+ ३         ३                    ३ देगा                            +३ 



यहाँ तक + संयोजकता हुई, अब सह संयोजकता और अब- संयोजकता
तत्त्व    इलेक्ट्रोन   कितनी       इलेक्ट्रोन       बाहरी कक्षा       ८ की गिनती पूरी      संयोजकता 

           संख्या        कक्षाएं?      का वितरण   में इलेक्ट्रोन       करने को कितने       / वेलेंसी 
                                                                                           इलेक्ट्रोन लेने हैं 


C          6                 २                    २+४          ४                 शेयर करेगा               सह-संयोजन   



N          7                 २                    २+५         ५                  ३ लेगा                             -३  


O          8                 २                    २+६          ६                    २ लेगा                           -२   


F           9                २                    २+७          ७                   १ लेगा                            -१     


Ne       10               २                     २+८          ८               पूर्ण है – तो शून्य |        संयोजन 

                                                                                         न देगा ना लेगा |          नहीं करेगा 

यह चित्र देखें, किस तरह की व्यवस्था बद्ध संरचना होती है |

जिस तत्त्व की संयोजकता + हो, वह – संयोजकता वाले तत्त्व से उस अनुपात में जोड़ कर सकता है जिससे दोनों की संयोजकता संतुष्ट हो | जैसे 

Na {+१} और Cl {-१} का जोड़ है NaCl [खाने का नमक ]

H {+१} और O {-२} का जोड़ है (२H +१ ओ = H2O ) [पीने का पानी ]

अगले अंक में प्रोटोंस, न्युट्रोंस और आइसोटोप्स की बात होगी |
जारी …

e i pi

यह पोस्ट अभिषेक ओझा जी की पोस्ट “एक ख़ूबसूरत समीकरण” के सन्दर्भ में लिख रही हूँ – यह पोस्ट देखने के लिए यह लिंक क्लिक करें | 


यह इ, आई पाई आखिर है क्या बला ? यहाँ साधारण भाषा में समझाने की कोशिश करती हूँ | पहले पाई की बात करूंगी, फिर आई की, फिर इ की ; फिर घात (पावर) की और आखिर में इन सब के आपसी सम्बन्ध की |


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( I )तो पहले पाई समझते हैं — सोचिये की एक घडी है और एक छड़ी को धुरी से ३ बजे की और रखिये – यह कोण है ० डिग्री (साथ में दी हुई फिगर देखें –>| अब यह छड़ी घडी से उलटी दिशा में घूमेगी (अर्थात ३ से २, १, १२ …. फिर ९ फिर ६ और पूरा चक्र घूम कर फिर ३ बजे पर) और कोण बढ़ता जाएगा (यदि घडी की ही दिशा में घूमे तो कोण निगेटिव होगा – इसमें कोई राज़ की बात नहीं है – जब हम जोमेट्री पढ़ते हैं तो सीढ़ी रेखा के ऊपर के कोण + और नीचे के कोण – मानते हैं , इतना ही कारण है ) पूरा घूम आने के बाद का कोण फिर से ० डिग्री है – और ३६० डिग्री भी |




जिस तरह हम तापमान को डिग्री सेंटीग्रेड में भी पढ़ते हैं (जैसे – पानी १०० डिग्री सेंटीग्रेड पर उबलता है ) और फेरान्हाईट में भी (उसे १०० डिग्री फेरान्हाईट बुखार है ) उसी तरह कोण को डिग्री में भी नापा जाता है और रेडियन में भी | पूरा गोला घूम कर कोण ३६० डिग्री या २ पाई रेडियन होता है | अलग अलग कोणों के लिए यह फिगर देखें –>


पाई (रेडियन में नापा जाने वाला कोण) होता है, गोले की परिधि और व्यास का अनुपात ( pi = circumference / diameter) , और इसका गणितीय मूल्य है करीब करीब २२/७ = ३.१४ 

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( II )यह तो हुई बात पाई की – अब आते है आई पर – आई क्या है ? 


अब थोडा सा बुनियादी गणित याद कर लेते हैं – संख्याएं होती हैं कई प्रकार की –
*** नेचरल नम्बर्स (१,२,३,४ …) ;;
*******होल नम्बर्स ( ०,१,२,३,४,….)
***इन्टीजर्स (० से + की तरफ भी १,२,३,४ …. और – की तरफ भे -१,-२,-३,-४ ….) ;;
******* रैशनल नम्बर्स ( =  p/q जहां p और q दोनों इन्टीजर्स हों और q शून्य न हो) ;;
***इर्रेशनल नम्बर्स ( जो इस तरह न दिखाए जा सकें जैसे की ५ का वर्गमूल );;
******* रियल नम्बर्स (रैशनल और इर्रेशनल दोनों के समूह मिला कर रियल का समूह बनता है) |



अब आते हैं इमेजिनरी नम्बर्स पर – जो आई (i) के रूप में होते हैं | 
          याद करें की जब एक संख्या को खुद से गुणा किया जाए तो उसका वर्ग ( square ) बनता है | जैसे २ का वर्ग है दो दुनी चार , ३ का वर्ग है तीन तिया नौ ; ४ का वर्ग है चार चौक सोलह आदि | इसका उल्टा होता है वर्गमूल ( squareroot ) जैसे चार का वर्गमूल है दो ; पच्चीस का वर्गमूल पांच है |


सोचिये की आप दो को दो से गुणा करें – तो क्या मिलेगा ? चार मिलेगा न? और यदि (-२) को (-२) से गुणा करें तो ? मज़े की बात यह है की अब भी चार ही मिलेगा, क्योंकि जब हम वर्ग करते हैं तो – चिन्ह खो जाता है |

इसका अर्थ यह हुआ की ४ का वर्गमूल २ भी है और -२ भी है | अर्थात हम सिर्फ + संख्याओं के वर्गमूल निकाल रहे हैं | 
और – चिन्ह वाली संख्याओं का क्या ? इसके लिए माना गया कि कोई ऐसी संख्या है जिसका वर्ग -१ है | अब क्योंकि हम जानते हैं की किसी असल संख्या का वर्ग तो -१  हो ही नहीं सकता , इसका अर्थ तो यह हुआ न की हमने जिस संख्या का वर्ग -१ को माना वह एक असल संख्या नहीं है, वह एक कल्पित संख्या है | और कल्पना को इंग्लिश में imagination कहते हैं | तो इस कल्पित संख्या का नाम हुआ – इमेजिनरी अर्थात imaginary जिसके पहली अक्षर i को हमने प्रयुक्त किया -१ के वर्गमूल के लिए | बस इतनी ही होती है i “ और कुछ नहीं | 


तो हमें यदि १०० का वर्गमूल चाहिए तो तो कोई समस्या नहीं है ; १० x १० = १०० तो सौ का वर्गमूल तो दस है ही | लेकिन यदि हमें [-१००] का वर्गमूल चाहिए तो हम लिखेंगे 


[-१००] = [-१ x १००] जिसका वर्गमूल होगा [ i x १० ] = १० i |इतना ही राज है i का |


तो आई है [-१ का वर्गमूल] –> एक कल्पित (इमेजिनरी संख्या – i FOR FIRST LETTER OF IMAGINARY ) 

{और जब रियल संख्या और इमाजिनरी संख्या का जोड़ हो, तो काम्प्लेक्स संख्या बनती है जैसे २+३i  }


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( III )अब बढ़ते हैं e ( इ ) की ओर | यह अक्षर है एक्सपोनेंशियल (exponential ) का पहला अक्षर| यह शब्द आपने सुना होगा रेडियो धर्मिता के सन्दर्भ में | जब युरेनियम या रेडियम जैसे रेडियो धर्मी पदार्थ किसी भी मात्रा में रखे जाते हैं (नेचरल कंडीशंस में) तो वे खुद ही क्षय (decay ) होते हैं | जितनी भी मात्रा हो, एक निश्चित अवधि के बाद उसकी आधी रह जाती है – इस अवधि को “हाफ लाइफ” कहते हैं| उदाहरण के लिए यदि एक घंटे में पदार्थ २०० से १०० किलो हुआ; तो फिर एक घंटे में वह १०० से ५०; अगले घंटे में ५० से २५ आदि होगा | यह एक घंटे का समय उस पदार्थ की हाफ लाइफ है | इस तरह के क्षय को एक्सपोनेंशियल डीके ( exponential decay ) कहते हैं |

इस exponential  पहला अक्षर e इस्तेमाल होता है इस तरह के क्षय को दर्शाने के लिए और गणितीय मूल्य है २.७१८ |{   एक्सपोनेंशियल |}
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( IV ) अब बात करें घात की  घात को मैं ^ द्वारा लिखूंगी | जब हम किसी संख्या को खुद से गुणा करें तो हमें उसका वर्ग मिलता है | इसी तरह यदि हम किसी संख्या को अपने आप से (किसी और संख्या जितनी बार) गुणा करते हैं तो कहते हैं की पहली संख्या को दूसरी संख्या की “घात ” लग रही है – जैसे यदि दो को पांच की घात है अर्थात 2x2x2x2x2 = ३२ (= २ पावर ५ = २^५ ) ; और दो को दस की घात लगे तो होता है १०२४ (= २ पावर १० = २^१० )


सोचिये की e को घात लग रही है १ की तो मिलेगा २.७१८ ; इ को दो की घात अर्थात = २.७१८ x २.७१८ = [=e ^ 2 = ७.३८७] | यदि घात निगेटिव अर्थात ऋणात्मक हो, तो यह गुणा विभाजक में होगा जैसे यदि e को {-२} की घात है तो मिलेगा [e पावर -२ = e^(-२)= [१/ {e^२}] = [१/{२.७१८ x २.७१८} = ०.१३५ |


तो यदि इ (e) को + घात हो तो हमें १ से बड़ी संख्या मिलती है (क्योंकि २.७ के पावर का गुणा हो रहा है), और – घात हो तो १ से छोटी संख्या मिलती है (क्योंकि २.७ के पावर से विभाजन हो रहा है)


घात ( पावर ) के गणीतिकीय  सिद्धांत हैं :-


(१) m ^ n = m x m x m x ….x m (self multiplication n times)

     जैसे ३^४  = ३.३.३.३ = ८१
     
(२) m ^ २ अर्थात m का वर्ग … उदाहरण के लिए –> ३^२ = ३ x ३ = ९  
     और
     m ^ १/२ का अर्थ है m का वर्गमूल | उदाहरण के लिए –> ९ ^(१/२) = ३  
(३) a ^ (b +c) = (a^b) x (a^c) 
         अर्थात एक संख्या को (दो संख्याओं के जोड़ की घात) लगने का अर्थ है उसे उन दोनों की घात अलग से लगा कर दोनों उत्तरों को आपस में गुणा कर देना |  उदाहरण के लिए –> ३ ^ (२+२) = (३^२) x (३^२) = 9x ९ = ८१ 
(४)  a ^ (b -c) = (a^b) / (a^c) 
         अर्थात एक संख्या को (दो संख्याओं के अंतर की घात) लगने का अर्थ है उसे उन दोनों की घात अलग से लगा कर दोनों उत्तरों का आपस में विभाजन कर देना |  उदाहरण के लिए –> ३ ^(४-१) = ८१/३ = २७      
(५) a ^ (-b) = 1 / [a ^ b) 
       इसका मतलब है ऋणात्मक घात अर्थात विभाजक में धनात्मक घात | (रेसिप्रोकल) उदाहरण के लिए –> ४ ^(-२) = १/(४^२) = १/१६ 
(६) [ { a ^ b } ^c ] = a ^ ( b x c) 
       अर्थात यदि एक संख्या को एक घात लगाने के बाद फिर दूसरी घात लगे जाए – तो यह ऐसे ही है जैसे की उसे उन दोनों के गुणा की घात लगी हो | उदाहरण के लिए –> (२^३)^४ = २^(३ x ४) = २^१२ = ४०९६

(७) m ^ 0 = १ अर्थात किसी भी संख्या को शून्य ( इन्टीजर) की घात होता है = १ |    

यदि इमेजिनरी घात लगे तो क्या होगा???? 

तब एक्सपोनेंशियल बदलाव तो होगा , किन्तु घात अब किसी रियल नंबर के बजाय इमेजिनरी कोण की है | तो इ अपने आप से गुणा होने के बजाये अब कोण में घूम रहा है – कितने कोण घूमेगा? जितनी कि इमेजिनरी घात लगी हो, उतना ही कोण घूमेगा |
आगे देखते हैं |



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( V ) अब सब साथ में – इ,आई, पाई, घात 

अब तक हमंने देखा अलग अलग से पाई, आई, इ, और घात को |


अब हम जानते हैं कि (+1) x(+1) = (+1), aur (-1)x(-1) bhi = +1 एक बार फिर से ऊपर की फिगर के हिस्से देखें अब –>



इन सभी में (A, B, C, D में )  में गणितिकीय फोर्मुले नहीं हैं – ठीक नीचे फिर से गणितीकीय फोर्मुलों के साथ रिपीट किया है | आप चाहे तो पहली बार साधारण हिंदी में पढ़ें, और फिर से नीचे फोर्मुलों के साथ दोबारा पढ़ें 


(A ) हमने देखा की जब काँटा बिलकुल नहीं घूमा है तब कोण है ० डिग्री या ० रेडियन – और तीर की इस शुरूआती स्थति को नंबर लाइन पर {+१} माना जाता है | 


(+1) x  (+1) = (+1) का अर्थ हुआ कि जब तीर या तो {बिलकुल न घूमे} या फिर {पूरे गोले को दो बार घूम कर लौट आये} – तो फिर से +१ पर ही खड़ा होगा | 


इसे गणित की भाषा में कहते हैं कि एक्सपोनेंशियल बदलाव तो हो रहा है, किन्तु घात अब किसी रियल नंबर के बजाय इमेजिनरी कोण की है | तो इ अपने आप से गुणा होने के बजाये अब उतने कोण में घूम रहा है – जितने कोण की घात लगी हो |तो पहली फिगर ऐसी बनती है –> यहाँ या तो बिलकुल घूमा ही नहीं है तीर , या पूरा घूम कर लौट आया है (या तो शून्य या फिर 2pi रेडियन)

(B ) अब सोचिये कि रेखा आधा गोला घूम चुकी है – अर्थात कोण है = १८० डिग्री या = (१ पाई) रेडियन्स
तो तीर अब ९ बजे की ओर होगा | यहाँ भी एक्सपोनेंशियल बदलाव तो हो रहा है, किन्तु घात अब किसी रियल नंबर के बजाय इमेजिनरी कोण {पाई रेडियन} की है | तो दूसरी फिगर ऐसी बनती है –>  (रेखा आधा ही गोला घूमे – तो यदि पिछली बार धुरी से पूर्वकी ओर नोक थी तो अब उलटी अर्थात पश्चिम की ओर होगी)

यदि दो बार (आधा गोला) घूमा जाए तो एक पूरा गोला होगा – अर्थात (-१)X (-१)=+१


(C ) तो हमने देखा कि एक गोले का वर्गमूल आधा गोला है (कोण की दृष्टी से, मैं क्षेत्र फल नहीं कोण की बात कर रही हूँ) 
इसी तरह आधे गोले का वर्ग मूल है + {एक चौथाई गोला} अर्थात (रेखा एक चौथाई ही गोला घूमे – तो यदि पिछली बार धुरी से पूर्वकी ओर नोक थी तो अब उत्तर की ओर होगी)

यदि दो बार (चौथाई गोला) घूमा जाए तो आधा गोला होगा – अर्थात (i)^२ = {(i )^२}= {-१}

या फिर {-१}^१/२ या -१ का वर्गमूल “i ” है 



(D ) इसी तरह यदि  तीन चौथाई गोला घूमा जाए तो यह फिगर बनेगी | यह कोण है ३ पाई / २ या फिर – पाई |


यदि यह कोण (३ pi /२ ) दो बार घूमा जाए तो भी हम डेढ़ गोला घूम कर -१ पर ही पहुँच जायेंगे अर्थात (-i )^२ = -१ 






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इस तरह से – जब e को (i x रेडियन्स में कोई कोण) की घात लगती है – तो वह गुणा नहीं होता अपने आप से – वह उतने कोण से घूम जाता है | 

***********e पर २ पाई रेडियन की घात –> पूरा गोला = +१

*** १ पाई रेडियन की घात –> आधा गोला = -१ (अर्थात पिछली बार की आधी घात – जो वर्गमूल दर्शाती है – तो +१ का वर्गमूल -१ भी है )

***********+ पाई/२ रेडियन –> एक चौथाई गोला = + i (फिर से पिछली बार से आधी घात – जो फिर से वर्गमूल दर्शाती है – तो -१ का वर्ग मूल i है)

***और – पाई/२ रेडियन या ३पाइ / २ रेडियन अर्थात तीन चौथाई गोला = -i ;

यही है पाई, आई, इ और उनका सम्बन्ध |



अब यह सब फिर एक बार देखें, गणित की भाषा में –>

(A ) जब काँटा बिलकुल नहीं घूमा है तब कोण है ० डिग्री या ० रेडियन – और तीर की इस शुरूआती स्थति को नंबर लाइन पर {+१} माना जाता है | 

(+1)x(+1) = (+1) का अर्थ हुआ कि जब तीर या तो {बिलकुल न घूमे} या फिर {पूरे गोले को दो बार घूम कर लौट आये} – तो फिर से +१ पर ही खड़ा होगा | 

इसे गणित की भाषा में कहते हैं कि एक्सपोनेंशियल बदलाव तो हो रहा है, किन्तु घात अब किसी रियल नंबर के बजाय इमेजिनरी कोण की है | तो इ अपने आप से गुणा होने के बजाये अब कोण में घूम रहा है – कितने कोण घूमेगा? जितनी कि इमेजिनरी घात लगी हो |तो पहली फिगर ऐसी बनती है –> 

इसे गणित की भाषा में कहेंगे

   [e ^ 0 pi] = e ^ 0 = 1(रेखा बिल्कुल ना घूमे )

;; [e ^ 2 pi] = 1 (रेखा एक पूर्ण गोल घूम कर लौट आये )
;; [e ^ 4 pi] = {e ^ 2 pi} ^2 = 1 (रेखा दो पूर्ण गोले घूम कर लौट आये )
;; [e ^ 6 pi] = {e ^ 2 pi} ^ 3 = 1 (रेखातीन पूर्ण गोले घूम कर लौट आये )आदि ;

इन सभी स्थितियों में तीर +१ पर ही रहेगा
(B ) अब सोचिये कि रेखा आधा गोला घूम चुकी है – अर्थात कोण है = १८० डिग्री या =पाई रेडियन्स
तो तीर अब ९ बजे की ओर होगा | इसे गणित की भाषा में कहेंगे कि एक्सपोनेंशियल बदलाव तो हो रहा है, किन्तु घात अब किसी रियल नंबर के बजाय इमेजिनरी कोण {पाई रेडियन} की है | तो दूसरी फिगर ऐसी बनती है –>  (रेखा आधा ही गोला घूमे – तो यदि पिछली बार धुरी से पूर्वकी ओर नोक थी तो अब उलटी अर्थात पश्चिम की ओर होगी)
यदि दो बार (आधा गोला) घूमा जाए तो एक पूरा गोला होगा – अर्थात (-१)X (-१)=+१ या फिर

गणित की भाषा में

 (हम पहले देख चुके हैं की १/२ की घात वर्गमूल दिखाती है , और e ^ ( २ pi i ) = +१ होता है )


-१ = वर्गमूल (१) 
   = {e ^ 2 pi} ^ 1/२
   = e ^ (२ pi i x 1/२ ) 
   = e^ (1pi i) 
     = -1
इसका अर्थ है कि कोण यदि 2pi था तो पूरा गोला घूम कर हम +१ पर पहुंचे थे , अब कोण 1pi है तो हम आधा ही गोला घूम कर -१ पर आये हैं, घात आधी हो गयी है – तो पिछले उत्तर का वर्गमूल मिल गया है |

[e^ (1pi i)] x [e^ (1pi i)] = [e^ (2pi i)] = +1
अर्थात ( कोण आधा गोला ) का वर्ग पूरे गोले का कोण और पूरे गोले का वर्गमूल आधा गोला हुआ |
(C ) तो हमने देखा कि एक गोले का वर्गमूल आधा गोला है (कोण की दृष्टी से, मैं क्षेत्र फल नहीं कोण की बात कर रही हूँ 2pi x १/२ = pi ) 
इसी तरह आधे गोले का वर्ग मूल है + एक चौथाई गोला अर्थात (रेखा एक चौथाई ही गोला घूमे – तो यदि पिछली बार धुरी से पूर्वकी ओर नोक थी तो अब उत्तर की ओर होगी)
यदि दो बार (चौथाई गोला) घूमा जाए तो आधा गोला होगा – अर्थात  (-i)^२ = {(-i )^२}= {-१}

तो गणित में हम लिखेंगे

[e^ (1pi i)] x [e^ (1pi i)] = [e^ (2pi i)] = +१


इसी तरह
e ^ ((1 pi I ) x 1/2 ) = e^ (1pi i/2)

                                            = e ^ (1 pi i x 1/2 )
                                            = वर्गमूल (-१)
                                            = + i

(D ) इसी तरह यदि  तीन चौथाई गोला घूमा जाए तो यह फिगर बनेगी | यह कोण है ३ पाई / २ या फिर – पाई |

यदि यह कोण (३ pi /२ ) दो बार घूमा जाए तो भी हम डेढ़ गोला घूम कर -१ पर ही पहुँच जायेंगे अर्थात (-i )^२  भी = -१  होता है  

या फिर (-१) का वर्ग मूल – i भी होता है |




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इस तरह से – जब e को (i x रेडियन्स में कोई कोण) की घात लगती है – तो वह गुणा नहीं होता अपने आप से – वह उतने कोण से घूम जाता है | 

***********e पर (२ पाई रेडियन) की घात –> पूरा गोला = +१

*** e पर (१ पाई रेडियन) की घात –> आधा गोला = -१ (अर्थात पिछली बार की आधी घात – और आधी घात वर्गमूल को दर्शाती है – तो +१ का वर्गमूल -१ भी है )

*********** e पर (+ पाई/२ रेडियन ) की घात –> एक चौथाई गोला = + i (फिर से पिछली बार से आधी घात – जो फिर से वर्गमूल दर्शाती है – तो -१ का वर्ग मूल i है)

***और e पर (- पाई/२ रेडियन) या (३पाइ / २ रेडियन) की घात अर्थात तीन चौथाई गोला = -i ;

यही है पाई, आई, इ और उनका सम्बन्ध |

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यदि आपको यह कोशिश पसंद आई हो , और आप इस “गूढ़ मेथेमेटिक्स” को समझ पाए हों, आगे ट्रिग्नोमेट्री  के sin cos आदि और युलर फोर्मुलाए जानना चाहें, तो बताएं, फिर आगे भी बात कर सकते हैं हम इस बारे में |